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पहली बार भारत में जलाए जाएंगे ग्रीन पटाखे, फॉर्मूला तैयार है!

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा है कि वह 15 मई तक फॉर्मूले को मंजूरी दे दे, ताकि देश में ग्रीन पटाखे बनाने की प्रक्रिया शुरू हो सके।

 
By Raju Sajwan
Last Updated: Friday 12 April 2019

अगर सब कुछ ठीक रहा तो 15 मई 2019 तक देश को पता चल जाएगा कि प्रदूषण न फैलाने वाले ग्रीन पटाखे कैसे होते हैं? गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि पेट्रोलियम एवं विस्फोटक सुरक्षा संगठन (पेसो) 30 अप्रैल तक ग्रीन पटाखे का फॉर्मूला (केमिकल कंपोजिशन) केंद्र सरकार के पास भेज देगा। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा है कि वह 15 मई तक इस फॉर्मूले को मंजूरी दे दे, ताकि देश में ग्रीन पटाखे बनाने की प्रक्रिया शुरू हो सके।

यह मामला पिछले साल दिवाली से पहले का है। दिवाली पर पटाखों के प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि त्यौहारों में कम प्रदूषण वाले ग्रीन पटाखे ही जलाए और बेचे जाने चाहिए। लेकिन ये ग्रीन पटाखे कैसे होंगे, इन्हें कौन बनाएगा, इसको लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं थी।

तब सरकार ने आश्वासन दिया था कि वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) ने यह फॉर्मूला तैयार किया है, जिसमें बताया गया है कि ग्रीन पटाखे बनाने के लिए किन तत्वों का इस्तेमाल किया जाएगा, जिससे कम से कम प्रदूषण होगा। उस समय विज्ञान एवं तकनीकी मंत्री हर्ष वर्धन ने बताया कि परंपरागत पटाखों के मुकाबले ग्रीन पटाखों से 30 प्रतिशत तक प्रदूषण कम होगा। 

हर्ष वर्धन ने बताया कि सीएसआईआर के अधीन काम कर रही संस्था नीरी ने चार तरह के फॉर्मूले तैयार किए हैं। पहले फार्मूले से तैयार पटाखों की खास बात यह होगी कि ये पटाखे जलने के बाद पानी के कण पैदा करेंगे, जिसमें सल्फर और नाइट्रोजन के कण घुल जाएंगे। नीरी ने इन्हें सेफ वाटर रिलीजर नाम दिया है। पानी प्रदूषण को कम करने का बेहतर तरीका माना जाता है।

दूसरे फॉर्मूले को स्टार क्रैकर नाम दिया गया है। यानी सेफ थर्माइट क्रैकर, इसमें ऑक्सीडाइजिंग एजेंट का उपयोग होगा, जिसके जलने के बाद सल्फर और नाइट्रोजन कम मात्रा में पैदा होते हैं। इसके लिए खास तरह का केमिकल का इस्तेमाल किया जाएगा।

तीसरे तरह के फॉर्मूले से तैयार ग्रीन पटाखों में कम एल्यूमीनियम का इस्तेमाल किया जाएगा। पटाखों में सामान्य पटाखों की तुलना में 50 से 60 फीसदी तक कम एल्यूमीनियम का इस्तेमाल होता है। इसे संस्थान ने सेफ मिनिमन एल्यूमीनियम यानी सफल का नाम दिया गया है।

चौथा, ऐसे पटाखों को जलाने से न सिर्फ हानिकारक गैस कम पैदा होंगी, बल्कि ये बेहतर खुशबू भी देंगे।

दिलचस्प बात यह है कि अब तक दुनिया में कहीं भी ग्रीन पटाखे नहीं जलाए जाते हैं। भारत में पहली बार नीरी ने इस तरह के पटाखों का कम्पोजीशन तैयार किया है। अभी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इन पटाखों की कीमत क्या होगी और क्या पूरे देश में परम्परागत पटाखे बनाने का काम बंद हो जाएगा? 

2016 में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) ने नई दिल्ली के आरके पुरम और छतरपुर इलाके में 30 अक्टूबर दिवाली की रात लगभग तीन घंटे तक मॉनिटरिंग की थी। इसमें पाया गया कि इस इलाके के लोगों को सांस लेने में मुश्किल हो रही थी। पटाखों की वजह से दिल्ली की हवा बुरी तरह प्रभावित हुई थी। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नियम के मुताबिक सामान्य तौर पर पीएम2.5 एक दिन में 60 प्रति क्यूबिक मीटर होना चाहिए और पीएम10 की मात्रा 100 प्रति क्यूबिक मीटर होनी चाहिए। घनी आबादी वाले छत्तरपुर में उस रात पीएम2.5 की मात्रा 872 थी, जो अधिकतम 1270 क्यूबिक मीटर तक पहुंच गई। इसी तरह पीएम10 की मात्रा 1400 असा 2060 क्यूबिक मीटर रिकॉर्ड की गई। यह अध्ययन बताता है कि दिवाली में सीपीसीबी के तय मानकों के मुकाबले छतरपुर लगभग 15 गुणा और आरकेपुरम में 4 गुणा हवा की मात्रा खराब थी।

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