Water

मालवा की मानव निर्मित मौत  

मालवा क्षेत्र में पर्याप्त मात्रा में वन होने, मिट्टी में जैविक पदार्थों की पर्याप्त मात्रा के होने से इस क्षेत्र की भूमि में आर्द्रता का स्तर अच्छा था 

 
Last Updated: Tuesday 23 July 2019
Photo: Getty Image
Photo: Getty Image Photo: Getty Image

डॉ. आरके गुप्ता 

पश्चिमी मध्यप्रदेश के 8 जिलों- धार, इंदौर, देवास, शाजापुर, उज्जैन, रतलाम, मंदसौर और नीमच को प्राय: मालवा कहा जाता है। आजादी के समय क्षेत्र की प्रमुख नदी, चंबल या उसकी प्रमुख सहायक नदियों गंभीर, क्षिप्रा, छोटी कालसिंध, शिवना आदि में ही नहीं, छोटे नालों में भी वर्ष भर पानी बहता था।

क्षेत्र में राजाओं द्वारा जंगली जानवरों के शिकार हेतु वनों की रक्षा की जाती थी। क्षेत्र की प्रमुख रियासत होल्कर एस्टेट के 1930 के गजेटियर में लिखा है कि होल्कर एस्टेट में 30 प्रतिशत क्षेत्र में वन थे। पश्चिमी मानसून से औसतन 36 इंच वर्षा होती थी। क्षेत्र की काली मिट्टी कपास की खेती के लिए उपयुक्त थी और कपास के अच्छे उत्पादन के फलस्वरूप यहां 6-7 कपड़ा मिल थीं। वर्षा के जल को सिंचाई और पेयजल हेतु संग्रहित करने के लिए कितने तालाब थे, इस बारे में कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन 1954-60 के मध्य चंबल घाटी विकास परियोजना के अंतर्गत बने प्रथम गांधीसागर बांध के जलाशय में 95 तालाब डूब में आए थे। जलाशय का क्षेत्र 560 वर्ग किमी था। 5.89 वर्ग किमी में एक तालाब था। इस हिसाब से गांधीसागर के जलग्रहण क्षेत्र में 3800 के आसपास तालाब रहे होंगे।

मालवा क्षेत्र में पर्याप्त मात्रा में वन होने, मिट्टी में जैविक पदार्थों की पर्याप्त मात्रा के होने से इस क्षेत्र की भूमि में आर्द्रता का स्तर अच्छा था और असिंचित क्षेत्र में भी अच्छी खेती होती थी। असिंचित क्षेत्र में पैदा होने वाले कठिया गेहूं की मांग अच्छी थी। अच्छी वर्षा, नदियों-नालों में वर्ष भर पानी बहने, अच्छे स्तर के कृषि उत्पादन को देखते हुए किसी जनकवि ने मालवा की विशेषताओं को इन पंक्तियों में प्रस्तुत किया है-“मालवा धरती धीर-गंभीर, पग-पग रोटी, डग-डग नीर” मालवा की उपजाऊ धरती और प्रचुर जल संसाधनों की स्थिति पर ग्रहण उस समय लगा जब आजादी के बाद बने बांधों की लंबी श्रृंखला में गांधीसागर बांध शामिल हुआ। यह चंबल घाटी विकास योजना के अंतर्गत बनने वाले तीन बांधों में प्रथम और प्रमुख था। संपूर्ण परियोजना द्वारा दोहन किए जल में गांधीसागर का योगदान 83 प्रतिशत था और 17 प्रतिशत पानी राजस्थान के राणास्थान के राणाप्रताप सागर का था। पानी में प्रमुख योगदान मध्यप्रदेश का ही था जो मालवा की जीवन रेखा कही जाने वाली चंबल नदी से आता है। बांधों में पानी की मात्रा कम न हो, इस हेतु जल ग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के संग्रहण हेतु किसी नई संरचना के निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है। 

इस तरह एक ओर तो मालवा क्षेत्र में वर्षा के जल संग्रहण हेतु किसी नई संरचना पर तो प्रतिबंध लगा ही, साथ ही पूर्व में बनाए गए करीब 3800 तालाबों में से अधिकांश कृषि भूमि की बढ़ती मांग के शिकार हो गए। मालवा के ग्रामीण क्षेत्र के आसपास की कृषि भूमि का अवलोकन करें तो कई स्थानों की कृषि भूमि के कभी तालाब की भूमि होने के अनेक प्रमाण मिल जाएंगे। तालाबों के नष्ट होने से इस क्षेत्र में भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। 

चंबल के जल ग्रहण क्षेत्र के वनों को किस तरह नष्ट किया गया, इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि जल ग्रहण के लिए शाजापुर और उज्जैन जिलों में इस समय एक प्रतिशत से भी कम भूमि पर वन है। वनों के विनाश का सीधा परिणाम यह हुआ कि वर्षा का पानी सीधे नदियों और नालों में आने लगा। गांधीसागर में चम्बल में आने वाले पानी का अधिकांश भाग बाढ़ों के माध्यम से आने लगा। 1961 से 1980 की बीस वर्षीय अवधि में चंबल में आने वाली बाढ़ों की संख्या का औसत 3.05 प्रति वर्ष था जो 1981 से 2000 की अवधि में बढ़कर 4.35 प्रति वर्ष हो गया है। बाढ़ों की बढ़ती संख्या बांध की सुरक्षा पर भी प्रश्न चिन्ह लगा रही है। 

चंबल के जल ग्रहण क्षेत्र में वर्षा जल संग्रहण हेतु किसी संरचना के निर्माण पर प्रतिबंध से प्रारंभ में क्षेत्र में पर्याप्त भूजल भंडार होने से कुओं आदि के जल स्तर पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। बाद में उन्नत बीज, रासायनिक खाद और सिंचाई पर आधारित हरित क्रांति तकनीक के प्रसार के साथ-साथ सिंचाई की मांग भी तेजी से बढ़ी। 

भूजल विभाग के एक अनुमान के अनुसार, मालवा के भूजल भंडारों का स्तर पिछले 50 वर्षों में लगभग 4 मीटर नीचे चला गया। 

मध्य प्रदेश के जल संसाधन विभाग की भूजल शाखा की 2009 की रिपोर्ट के अनुसार, 2008 में भूजल के दोहन का स्तर देवास में 80.1 प्रतिशत, धार में 82.80 प्रतिशत, इंदौर में 125.43 प्रतिशत, मंदसौर में 97.35 प्रतिशत, नीमच में 80.93 प्रतिशत, रतलाम में 125.67 प्रतिशत शाजापुर में 96.40 प्रतिशत व उज्जैन में 98.61 प्रतिशत था।  

अब चंबल के जल ग्रहण क्षेत्र में वर्षा के जल दोहन पर लगे प्रतिबंध से सिंचित क्षेत्र में सतही स्रोत का योगदान पूर्व में कुल के 7.1 के प्रतिशत से गिरकर 5.3 प्रतिशत ही रह गया है। अब किसानों के समक्ष यह प्रश्न है कि वे अपनी सिंचाई की बढ़ती मांग को कैसे पूरा करें? किसानों ने सिंचाई सुविधाओें की तलाश में जहां पास में कोई नदी या नाला था, वहां पानी को सीधे पानी पंप लगाकर अपने खेतों की सिंचाई करना शुरू कर दिया।

भूजल स्तर के नीचे जाने के कारण नदियों और भूजल भंडारों के मध्य प्रकृति ने जो संबंध निर्धारित किया था, वह भी भंग हो गया। पूर्व में जब नदियों में बाढ़ आती थी और उनका जलस्तर काफी ऊंचा हो जाता था, उस समय वे आसपास के भूजल भंडारों को समृद्ध करती थीं और बाद में ग्रीष्मकाल में जब उनका जलस्तर काफी नीचे चला जाता था तो भूजल भंडारों के अपेक्षाकृत ऊंचे जल स्तर से उनमें पानी आता रहता और ग्रीष्मकाल में भी वे बहती रहती थीं। अब भूजल भंडारों का स्तर नीचे चले जाने से यह प्रक्रिया बाधित हो गई। अब पग-पग रोटी, डग-डग नीर वाले मालवा में फरवरी-मार्च के पहले ही छोटी-छोटी नदियां ही नहीं, चंबल जैसी बड़ी नदी में पानी का बहाव समाप्त हो जाता है और उनमें यत्र-तत्र डबरे ही भरे रह जाते हैं। 

उनका पानी भी किसान विद्युत-डीजल पंपों के माध्यम से अपने खेतों में ले जाते देखे जा सकते हैं। आजादी के बाद के वर्षों में वनों के विनाश, चंबल घाटी विकास योजना के संदर्भ में मध्य प्रदेश और राजस्थान के मध्य समझौते में गांधीसागर के जल ग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के संचयन हेतु किसी संरचना के निर्माण पर प्रतिबंध, सिंचाई की बढ़ती मांग की पूर्ति का सारा दायित्व भूजल स्रोतों-पर आ जाने के फलस्वरूप उनका अतिदोहन हुआ। साथ ही सिंचाई की बढ़ती मांग की पूर्ति न होने से किसानों के द्वारा प्रदत्त सस्ती बिजली के माध्यम से छोटे-बड़े सभी नदी-नालों का पानी पंप कर उन्हें जनवरी-फरवरी तक सुखा देना, इन सभी प्रक्रियाओं के कारण इस क्षेत्र में स्थितियां खराब हुई हैं। मिट्टी में गिरती आर्द्रता आदि कारणों से हवा, वर्षा आदि के समय तीव्र क्षरण से मालवा की अत्यन्त उपजाऊ मिट्टी भी क्षरित हो रही है। 

पूर्व में मालवा में खरीफ फसलों में ज्वार और मक्का ही प्रमुख फसलें होती थीं। इन फसलों के साथ-साथ मूंग या उड़द भी बो दिया जाता था। ये दालें भूमि को उपजाऊ बनाती थीं। अब इनके स्थान पर सोयाबीन की खेती होने लगी है। मक्का और ज्वार के पौधों की जड़ें तो तने के आसपास फैली थीं और आसपास की कम गहरी भूमि से पोषण प्राप्त करती थीं। ऊपरी सतह की भूमि का पोषण स्तर भिंडोलों द्वारा मिट्टी को ऊपर नीचे कर पूर्व के स्तर पर बनाए रखा जाता है। सोयाबीन की जड़ें भूमि में काफी नीचे जाती हैं और गहरी भूमि के उपजाऊ तत्वों को सोख लेती हैं, गिडोले इतनी गहराई तक नहीं जाते।

परिणामस्वरूप भूमि का उपजाऊपन समय के साथ कम होता जा रहा है और इसी वजह से कृषि विज्ञानियों ने सोयाबीन की खेती का विरोध किया है। अब समय आ गया है कि गांधीसागर के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के संग्रह हेतु किसी संरचना के निर्माण पर प्रतिबंध को समाप्त करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं। उल्लेखनीय है जिस गांधीसागर में पानी सुनिश्चित करने के लिए मालवा में वर्षा के जल संचयन पर प्रतिबंध लगाया गया और जिसके कारण मालवा मरूस्थलीकरण की दिशा में अग्रसर हो गया है, वह गांधीसागर भी वर्तमान में 8-9 वर्ष में एक बार ही भरता है। जबकि बांध की क्षमता इस तरह निर्धारित की जाती है कि वह 4 में से 3 वर्ष पूरा भर सके। 

गांधीसागर बांध के कारण उत्पन्न हो रहे इन प्रभावों को देखते हुए इस परियोजना को समाप्त करने का समय आ गया है। मालवा से इस परियोजना के माध्यम से प्रतिवर्ष 2.5-3.0 एमएएफ पानी निर्यात करने के बजाय मालवा में ही प्रयुक्त किया जाए तो इस परियोजना के माध्यम से हो रहे सिंचित क्षेत्र से भी अधिक क्षेत्र सिंचित किया जा सकेगा, कृषि उत्पादन में वृद्धि हो सकेगी और मालवा की नदियां पुनः बन सकेंगी सदानीरा। 

(लेखक अर्थशास्त्र के प्राध्यापक रहे हैं)

Subscribe to Weekly Newsletter :

Comments are moderated and will be published only after the site moderator’s approval. Please use a genuine email ID and provide your name. Selected comments may also be used in the ‘Letters’ section of the Down To Earth print edition.