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अंफान तूफान: सुंदरवन में पांच साल तक नहीं हो पाएगी खेती-बाड़ी

अंफान चक्रवात की वजह से जहां कोलकाता में 5500 से अधिक पेड़ उखड़ गए, वहीं सुंदरवन को भारी नुकसान हुआ है

By Umesh Kumar Ray

On: Tuesday 26 May 2020
 
अंफान चक्रवात की वजह से सागर द्वीप में गिरा पेड़। फोटो: उमेश कुमार राय
अंफान चक्रवात की वजह से सागर द्वीप में गिरा पेड़। फोटो: उमेश कुमार राय अंफान चक्रवात की वजह से सागर द्वीप में गिरा पेड़। फोटो: उमेश कुमार राय

20 मई को आए सुपर साइक्लोन अंफान ने न केवल पश्चिम बंगाल के उत्तर व दक्षिण 24 परगना तथा कोलकाता में जान-माल की क्षति पहुंचाई, बल्कि इससे माइक्रोक्लाइमेट और जैव विविधता को भी भारी नुकसान हुआ है।

साइक्लोन के कारण केवल कोलकाता में 5500 पेड़ धराशाई हो गए हैं। बहुत से इलाकों से अब भी पेड़ों का हटाया जाना बाकी है। जानकारों का कहना है कि किसी भी इलाके में पेड़ पौधों की प्रचूरता उस खास  इलाके के माइक्रोक्लाइमेट और जैवविविधता को प्रभावित करती है। ऐसे में 5500 पेड़ों का धराशाई हो जाने से कोलकाता पर इसका बहुत प्रभाव पड़ेगा क्योंकि यहां जनसंख्या का घनत्व अधिक है।

पर्यावरणविद मोहित रे ने कहा, "कोलकाता के अलग-अलग हिस्सों में हम देखते हैं कि अलग तरह की जलवायु होती है। इसे माइक्रोक्लाइमेट कहा जाता है। मसलन जहां पेड़ ज्यादा होते हैं वहां का तापमान कम पेड़ वाले इलाके के मुकाबले कम होता है। पेड़ गिर जाने से उन इलाकों में तापमान बढ़ेगा। इसके आलावा जैवविविधता को भी नुकसान पहुंचेगा क्योंकि पेड़ पौधे केवल चिड़ियों का ठिकाना नहीं होते हैं। पेड़ों पर अति सूक्ष्म जीव भी होते हैं, जो जैवविविधता को बरकरार रखते हैं।"

गौरतलब हो कि कोलकाता में तापमान में तेजी से इजाफा हो रहा है। वैश्विक स्तर व अखिल भारतीय स्तर पर तापमान में सलाना जो इजाफा हो रहा है, कोलकाता में उससे 20 प्रतिशत ज्यादा बढ़ोतरी हो रही है। इसका मतलब है कि आने वाले समय में कोलकाता में गर्मी बढ़ सकती है। मोहित ये ने कहा कि कोलकाता की जैवविविधता को पहले की स्थिति में आने में एक दशक लग सकता है और वह भी तब हो सकेगा, जब जहां भी पेड़ गिरे हैं, वहां जल्दी बढ़ने वाले पेड़ लगाए जाएंगे।

कोलकाता के आलावा सुंदरवन के सागरद्वीप, काकद्वीप, कुलतली, नामखाना, कैनिंग, हिंगलगंज वह अन्य जगहों पर भी पेड़ पौधों को भारी नुकसान पहुंचा है। सुंदरवन में मैन्ग्रो वनों पर काम करने वाले संगवन नेचर एनवायरमेंट एंड वाइल्डलाइफ सोसाइटी की ज्वाइंट सेक्रेटरी और प्रोग्राम डायरेक्टर अजंता दे ने कहा, "सुंदरवन के अलग-अलग हिस्सों में हमारे कार्यकर्त्ताओं से बात हुई है। चक्रवात से नदी से किनारे लगे मैन्ग्रो को कोई नुकसान नहीं हुआ है। पेड़ पौधों को जो नुकसान हुआ है, वो रिहाइशी क्षेत्रों में हुआ है। जो पेड़ पौधे बचे भी हैं, वे खारा पानी घुस जाने से झुलस गए हैं।"

उन्होंने कहा, "खारा पानी के रिहाइशी इलाके में प्रवेश कर जाने से खेती बारी बुरी तरह प्रभावित होगी।"

जादवपुर विश्वविद्यालय के स्कूल आफ ओसिनोग्राफिक स्टडीज के डायरेक्टर प्रो. तुहीन घोष ने कहा कि कम से तीन से पांच साल तक खेती-बाड़ी बुरी तरह प्रभावित होगी, क्योंकि नमकीन पानी का असर खत्म होने में वक्त लगेगा। इसके लिए मिट्टी की जांच कर जरूरत के मुताबिक मिट्टी में पोषक तत्त्व डालने होंगे।

उन्होंने कहा, "सैकड़ों पेड़ यहां के लोगों के लिए जीविका का साधन थे। लोग लकड़ियों का इस्तेमाल खाना पकाने में करते थे और फर्नीचर बनाने के काम भी आता था। इसके आलावा पेड़ पौधे विभिन्न प्रकार की चिड़ियों, मधुमक्खियों वो सूक्ष्म जीवों का आवास थे। पेड़ों के गिर जाने इन्हें भी नुकसान होगा।"

सुंदरवन के वन्यजीवों को इससे कितना नुकसान हुआ है, इसका पता नहीं चल सका है, लेकिन वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि अभी तक उन्हें किसी वन्यजीव का मृत शरीर नहीं मिला है। बताया जा रहा है कि साइक्लोन सुंदरवन टाइगर रिजर्व के ऊपर से नहीं गुजरा है इसलिए वन्यजीवों को इससे नुकसान होने की संभावना कम है।