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भारतीय वैज्ञानिकों की खोज, उपग्रहों से पहले मिलेगी उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की सटीक चेतावनी

इस नई तकनीक की मदद से उत्तरी हिंद महासागर क्षेत्र में बनने वाले चक्रवाती तूफानों का पता कम से कम चार दिन पहले ही लगाया जा सकता है

By Lalit Maurya

On: Thursday 10 June 2021
 

भारतीय वैज्ञानिकों ने एक ऐसी नई तकनीक खोजी है जो उपग्रहों द्वारा सूचना दिए जाने से पहले ही उत्तर हिन्द महासागर क्षेत्र में बनने वाले उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की सटीक जानकारी दे देगी। यही नहीं वैज्ञानिकों के अनुसार इस नई तकनीक की मदद से उत्तरी हिंद महासागर क्षेत्र में बनने वाले चक्रवाती तूफानों का पता कम से कम चार दिन पहले ही लगाया जा सकता है।

इस तकनीक की खोज आईआईटी खड़कपुर के वैज्ञानिकों ने की है, जिनमें जिया अल्बर्ट, बिष्णुप्रिया साहू और प्रसाद के. भास्करन जैसे वैज्ञानिक शामिल थे| यह तकनीक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सहयोग से जलवायु परिवर्तन कार्यक्रम (सीसीपी) के तहत ईजाद की गई है। इससे जुड़ा शोध भी एटमॉसफेरिक रिसर्च नामक जर्नल में प्रकाशित हुआ है|

इन उष्णकटिबंधीय चक्रवातों का पता लगाने के लिए अब तक रिमोट सेंसिंग तकनीक का उपयोग किया जाता है| हालांकि इस तकनीक से तूफान के बारे में तभी जानकारी मिलती है जब जब समुद्र के पानी की ऊपरी सतह गर्म हो और वहां कम दबाव का क्षेत्र बन रहा हो। इससे पता लगाने और चक्रवात के वजूद में आने के बीच काफी लंबा अंतराल होता है, जिससे तैयारी करने का वक्त मिल जाता है।

यदि चक्रवाती तूफानों के उत्पन्न होने की बात की जाए तो यह कोरियॉलिस इफेक्ट की वजह से पैदा होते हैं, जिसका संबंध पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूमने से है। भूमध्य रेखा के नजदीक जहां समुद्र का पानी गर्म होकर 26 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक हो जाता है। इससे वातावरण में अस्थिरता आने लगती है, एक बार जब हवा गर्म होकर ऊपर उठती है, तो वहां वायुमंडल में  कम दबाव का क्षेत्र बन जाता है। इस खाली जगह को भरने के लिए हवाएं काफी तेज गति से आती हैं, और गोल घूमकर बवंडर को जन्म देती हैं जो कई बार चक्रवात में तब्दील हो जाते हैं। आमतौर पर इन्हीं गतिविधियों के आधार पर चक्रवात के आने का पता लगाया जाता है|

कैसे काम करती है यह तकनीक 

वैज्ञानिकों ने जो तकनीक विकसित की है वो तूफान आने से पहले ही  बंवडर और घूमती हुए भंवरदार हवा का पता लगा लेने पर आधारित है| वैज्ञानिक इसकी पहचान और बवंडर का विश्लेषण करने के लिये दो चीजों के बीच की न्यूनतम दूरी को आधार बनाते हैं। इसका पैमाना 27 और नौ किलोमीटर का है। जिससे बनने वाली तस्वीर का मूल्यांकन करके पता लगाया जाता है कि तूफान की भावी दशा और दिशा क्या हो सकती है।

इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने मानसून के बाद आये चार विनाशकारी तूफानों फाइलिन (2013), वरदाह (2013), गाजा (2018), मादी (2013) और मानसून से पहले आए दो तूफानों मोरा (2017) तथा आयला (2009) का विश्लेषण किया है| गौरतलब है कि यह तूफान उत्तरी हिंद महासगार के ऊपर बने थे।

वैज्ञानिकों के अनुसार इस तकनीक की मदद से करीब चार दिन (लगभग 90 घंटा) पहले तूफान के आने का पता लगाया जा सकता है और यह जाना जा सकता है कि चक्रवात कब बनेगा। शोध में मानसून से पहले और बाद में दोनों समय आने वाले तूफानों का अध्ययन किया हैं। उष्णकटिबंधीय चक्रवात वातावरण की ऊपरी सतह पर बनते हैं और जो चक्रवात मानसून से पहले बनते है वो बड़ी जल्दी पकड़ में आ जाते हैं, जबकि मानसून के बाद बनने वाले तूफानों को इतनी तेजी से नहीं पकड़ा जा सकता।

इस अध्ययन में बवंडर और भंवरदार हवा की गहन पड़ताल की गई है| साथ ही उनके व्यवहार को जांचा-परखा गया और आम दिनों के वातावरण के साथ नतीजों की तुलना की गई है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस तकनीक की मदद से समुद्र की सतह पर होने वाली हलचल को उपग्रहों से भी जल्दी पकड़ा जा सकता है|

पहले से कहीं ज्यादा शक्तिशाली होते जा रहे हैं चक्रवाती तूफान

यदि इन उष्णकटिबंधीय चक्रवातों का सटीक तरीके से पहले ही पता लगा लिए जाए तो इससे होने वाली जान-माल की हानि को काफी हद तक टाला जा सकता है| यदि वर्तमान में देखें तो उष्णकटिबंधीय चक्रवात बड़े पैमाने पर भारत और बांग्लादेश को नुकसान पहुंचा रहे हैं|

2020 में आए ऐसे ही एक चक्रवाती तूफान अम्फान से करीब 95,640 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था। यह बंगाल की खाड़ी में आए सबसे शक्तिशाली तूफानों में से एक था। जिसे दुनिया की 10 सबसे महंगी आपदाओं की सूची में भी शामिल किया गया था| इससे न केवल भारत बल्कि श्रीलंका, भूटान और बांग्लादेश पर भी असर पड़ा था। इसके कारण करीब 128 लोगों की जान गई थी, वहीं 49 लाख लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा था। ऐसा नहीं है कि यह कोई एकलौता ऐसा तूफान है जिसने भारतीय तटों पर तबाही मचाई है| फानी, निसर्ग, यास जैसे चक्रवाती तूफानों ने भारत को काफी नुकसान पहुंचाया है|

हाल ही में अंतराष्ट्रीय जर्नल साइंस में प्रकाशित एक शोध से पता चला है कि उष्णकटिबंधीय चक्रवात 3 किलोमीटर प्रति वर्ष की दर से तटों के करीब आते जा रहे हैं। साथ ही जलवायु में आ रहे बदलावों के चलते इनकी गंभीरता और संख्या में भी वृद्धि हो रही है| ऐसे में यह नई तकनीक काफी मददगार हो सकती है|