राजस्थान में सूखे जैसे हालात, पाली में फिर से चलेगी पानी से भरी ट्रेन!

पश्चिमी राजस्थान के पाली जिले में सामान्य से 37 फीसदी कम बारिश हुई है और पूरे जिले को पानी की आपूर्ति करने वाले बांध में भी एक माह का पानी शेष है

By Anil Ashwani Sharma

On: Wednesday 25 August 2021
 
राजस्थान के पाली जिले में बारिश न होने के कारण सूखे जैसे हालात बन गए हैं।
राजस्थान के पाली जिले में बारिश न होने के कारण सूखे जैसे हालात बन गए हैं। राजस्थान के पाली जिले में बारिश न होने के कारण सूखे जैसे हालात बन गए हैं।

 

पश्चिमी राजस्थान के पाली जिले में जल संकट और गहरा गया है। कारण कि पिछले एक हफ्ते से पूरे जिले में 72 घंटे में केवल डेढ़ घंटे पानी की सप्लाई की जा रही थी। यह सिलसिला पिछले एक माह से चल रहा था लेकिन अब जल संकट और गहरा गया है।

ऐसे में पानी की और कमी के चलते जिले में पानी की सप्लाई के घंटे को 72 से बढ़ाकर 96 घंटे कर दिया गया है। यानी, एक परिवार को चार दिन में केवल एक बार पानी मिलेगा, वह भी महज डेढ़ घंटे। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि आने वाले समय में जिले में जल संकट की स्थिति और भयावह होने जा रही है। 

इस संबंध में पाली जिला अदालत में पर्यावरणीय मुद्दों को लेकर जनहित याचिकाएं दर्ज करने वाले कार्यकर्ता प्रेम सिंह ने डाउन टू अर्थ को बताया कि एक बार फिर से जिला प्रशासन पाली में ट्रेन से पानी की सप्लाई पर विचार कर रहा है।

हालांकि जिला प्रशासन के जलदाय विभाग के अधीक्षण अभियंता जगदीश शर्मा का कहना है कि हम कल 25 अगस्त को संभागआयुक्त के साथ मीटिंग कर रहे हैं और सर्वप्रथम हम अपने जिले के स्थानीय जल स्त्रोतों को ही ठीक कर पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने की कोशिश करेंगे। इसके बाद ही हम नवंबर में पानी लाने के लिए रेल का विकल्प रखेंगें।  

 सिंह ने बताया कि इसके पहले जुलाई, 2019 में यहां पानी की सप्लाई ट्रेन के माध्यम से हुई थी। सिंह ने बताया कि पाली में पहली बार रेल से पानी 2002 में पहुंचाया गया था। इसके बाद 2005, 2009 में भी रेल के माध्यम से  पानी पहुंचाया गया था। इसके बाद 2016 में तैयारी की गई थी लेकिन अचानक बारिश हो जाने के कारण जिले में पानी रेल के माध्यम से नहीं पहुंचाया गया।

पश्चिमी राजस्थान में पाली एक प्रमुख जिला है। यहां पानी संकट हमेशा से एक बड़ी समस्या रही है। हालांकि यह वह जिला है, जहां 2017 के जुलाई-अगस्त में भारी बारिश के चलते बाढ़ की स्थिति पैदा हो गई थी। लेकिन उसके तीन साल बाद एक बार फिर से जिले में जल संकट पैदा हो गया है। इसका कारण बताते हुए स्थानीय स्तर पर पानी पर काम करने वाले कार्यकर्ता राजेद्र सिंह कहते हैं कि यह जिला पानी के लिए पिछले 12 सालों से केवल जवई बांध पर निर्भर है। लेकिन बारिश नहीं होने के कारण बांध में पानी घट गया है। ऐसे में जिले में पानी संकट गहरा गया है।

वह बताते हैं कि जवई बांध से जिले के 10 कस्बों और 583 गांवों में पानी की सपालाई होती है। यह सप्लाई आमतौर पर सालभर 48 घंटे में एक बार की जाती है। यानी एक दिन के अंतर से डेढ़ घंटे पानी। लेकिन इस बार जिले में बारिश औसत से 37 प्रतिशत कम हुई है। 25 अगस्त 2021 तक जिले में 223.6 मिलीमीटर (एमएम) बारिश हुई है, जबकि इस समय तक सामान्यता 355.9 एमएम बारिश होती है। 

सिंह ने बताया कि इसी का नतीजा है कि वर्तमान में जवई बांध में पानी केवल एक माह का बचा हुआ है यानी जवई बांध में 250 एमसीएफडी (मिलियन क्यूबिक फुट प्रतिदिन) है, जबकि बांध की क्षमता 7327 एमसीएफटी है।

पाली में ऐसा नहीं है कि पानी की समस्या के लिए सरकार ने कुछ नहीं किया। सरकार ने किया लेकिन उसके काम आधे-अधूरे होने के कारण पानी जिलेवासियों तक पहुंच ही नहीं पाता है। प्रेम सिंह बताते हैं कि  जिला प्रशासन ने जोधपुर से 2003 में पाली तक पाइप लाइन बिछाने का काम शुरू किया था लेकिन यह अब तक रोहट कस्बे तक ही पाइप लाइन बिछ पाई है।  यानी अब तक यह पाइप लाइन पाली तक नहीं पहुंच पाई है।

ध्यान रहे कि पाली और जोधपुर के बीच 75 किलोमीटर की दूरी है। वर्तमान में जोधपुर से रोहट कस्बे तक यानी 40 किलोमीटर लंबी पाइप लाइन बिछी हुई है। केवल 35 किलोमीटर बची हुई लेकिन अब तक उस पर राज्य सरकार ने ध्यान नहीं दिया है।

जहां तक रेल से जिले को पानी की सप्लाई करने की बात है, यह पानी जोधपुर से सप्लाई किया जाता है। और यदि जिला प्रशासन द्वारा बनाया गया प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जाता है तो जोधपुर में यहां पानी पहुंचाने के लिए इंदिरा केनाल से पानी लिया जाता है। यह रेल दिन में दो से तीन बार चक्कर लगाती है और एक बार में 15 लाख लीटर पानी 30 वैगन में भरकर जोधपुर से पाली पहुंचाती और यहां की हौदियों में पानी स्टोर किया जाता है। ध्यान रहे कि 2009 तक जवई बांध का पानी जोधुपर नहर के माध्यम से ही जाता था। लेकिन जब वहां इंदिरा केनाल के आने से जवई का पानी पाली को दिया जाने लगा। इसके पहले यह जिला पूरी तरह से स्थानीय जल स्त्रोतों पर निर्भर था।  

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