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गाद के प्रबंधन से थम सकता है बाढ़ का कहर

हिमालय से निकलने वाली नदियां अपने साथ गाद भी बहाकर लाती हैं। गाद का प्रबंधन करके हम संवेदनशील हिस्सों में बाढ़ का खतरा कम कर सकते हैं

By Pallavi Ghosh

On: Saturday 30 November 2019
 
गाद का प्रबंधन

हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र (एचकेएच) 3,500 किलोमीटर में फैला है और यहां से 10 प्रमुख नदियां निकलती हैं। ये नदियां भारत, पाकिस्तान, नेपाल, चीन, म्यांमार, भूटान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में बहती हैं। ये नदियां जहां एक तरफ 200 करोड़ लोगों की मददगार हैं, वहीं दूसरी तरफ इनसे होने वाली बाढ़ चिंता का कारण भी बनी रहती है। सिंधु, ब्रह्मपुत्र, गंगा और इरावती नदियों में मुख्य रूप से बाढ़ आती है।

हिमालय से निकलने वाली नदियों को समझने से पहले हमें यह जानना होगा कि नालों से पानी किस प्रकार बहता है। अब आप सोच रहे हैं कि नदियों के बीच नालों की बात कहां से आ गई। कन्फ्यूज होने की जरूरत नहीं है। मैं इसे समझाती हूं। अगर आपने नालों को गौर से देखा होगा तो काले रंग के बदबूदार कीचड़ को देखकर अपनी नाक और मुंह सिकोड़ा होगा। हो सकता है आपको गुस्सा भी आया हो। यह कीचड़ आमतौर पर बरसात से पहले देखा जाता है क्योंकि उस समय नाले में बहुत सारा कचरा आ जाता है और वह नाले के तल पर जमने लगता है। इससे नाले का तल उथला हो जाता है और मॉनसून के बाद ओवरफ्लो होने लगता है।

नदियों के साथ भी यही होता है। नदियां अपने साथ गाद, पत्थर के टुकड़े और खनिज बहाकर लाती हैं। ये पहाड़ों और नदियों के किनारों के क्षरण से उत्पन्न होते हैं। हिमालय से निकलने वाली गंगा और ब्रह्मपुत्र दुनिया भर में सबसे ज्यादा गाद बहाकर लाने वाली नदियों में शामिल हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि हिमालय पर्वत युवा है और अरावली जैसे पुरानी पहाड़ियों के मुकाबले क्षरण के कारण ज्यादा गाद पैदा करता है। हिमालय से बड़े पैमाने पर गाद बहाकर लाने वाली यमुना, गंगा और मेघना नदी के कारण ही बांग्लादेश एक डेल्टा की शक्ल ले पाया है और यह करीब 16.2 करोड़ लोगों का घर है।

गाद की मात्रा आमतौर पर नदी के जलग्रहण और डेल्टा क्षेत्र में अधिक होती है। बांध और जलाशयों के नजदीक भी यह अधिक मात्रा में पाई जाती है। दरअसल, कंक्रीट के ढांचे में नदी का प्रवाह कम हो जाता है और गाद की अधिकता भी उसकी गति को मंद कर देती है। इससे जहां नदी का तल उथला हो जाता है, वहीं बाढ़ की आशंका भी बढ़ जाती है। बारिश के अलावा लबालब भरे बांध से पानी छोड़ने पर निचले इलाके भी बाढ़ के प्रति संवेदनशील बन जाते हैं। हाल ही में महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल में आई बाढ़ इसके ताजा उदाहरण हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि हमें गाद का प्रबंधन किस तरह करना चाहिए। आइए इसका उत्तर तलाशें।

गाद प्रबंधन

गाद प्रबंधक के कई तरीके हैं। गाद को सही मात्रा में बरकरार रखने के लिए हर चरण में अलग तकनीक अपनाई जाती है। गाद निकालने के आम उपायों में प्लशिंग, स्लूशिंग, सिफनिंग, डोजिंग और ड्रेजिंग मुख्य रूप शामिल हैं।

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि इंसानी गतिविधियों जैसे, खेती, पेड़ों की कटाई और नदी के किनारों पर पशुओं को अत्यधिक चराने से भी मिट्टी का क्षरण बढ़ता है और नदियों में गाद की मात्रा बढ़ जाती है। इसलिए मिट्टी का संरक्षण करने के लिए फसलों को बदल-बदलकर उगाना, जैविक तरीकों से खेती करना और समोच्च खेती (कंटूर) करनी चाहिए। इससे गाद का प्रबंधन किया जा सकता है।

नदियों की निगरानी

अगर नदी का तल बहुत उथला है तो गाद का नियमित निपटान महत्वपूर्ण है। गाद से नदी के तट का कटाव बढ़ सकता है, भूजल स्तर गिर सकता है, नदी के किनारे चौड़े हो सकते हैं और नदी के आसपास बने ढांचे कमजोर हो सकते हैं। नदी तल उथला होने पर बाढ़ भी आती है। इसलिए यह जरूरी है कि गाद का निष्पादन सही तरीके से किया जाए। इसके अलावा मॉनसून से पहले और मॉनसून के बाद नदियों में गाद की मात्रा की निगरानी भी जरूरी है। इससे नदी का वैज्ञानिक प्रबंधन संभव होगा और सरकारी एजेंसियों को बाढ़ का खतरा कम करने में मदद मिलेगी।

स्रोत: अर्थ डे नेटवर्क & नेशनल जियोग्राफिक