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स्पेशल रिपोर्ट: मॉनसून ने खोली देश के बांधों की पोल, बाढ़ की बने वजह

भारत के बांध संचालक कभी इस नियम का पालन नहीं करते। नतीजतन हाल ही में देश भर में बांधों से अचानक पानी छोड़े जाने के कारण बाढ़ की घटनाओं का सामना करना पड़ा

By Shagun Kapil

On: Saturday 05 October 2019
 
बाढ़ बढ़ाते बांध
महाराष्ट्र के नासिक में 4 अगस्त 2019 को गोदावरी नदी उफान पर थी। बाढ़ के पानी में मंदिर और घर डूब गए। पुल पर खड़ा होकर स्थिति का जायजा लेता एक पुलिसकर्मी  (रॉयटर्स) महाराष्ट्र के नासिक में 4 अगस्त 2019 को गोदावरी नदी उफान पर थी। बाढ़ के पानी में मंदिर और घर डूब गए। पुल पर खड़ा होकर स्थिति का जायजा लेता एक पुलिसकर्मी (रॉयटर्स)

यह विडंबना ही है कि कर्नाटक के एक अर्ध शुष्क, सूखा प्रभावित जिले में इस साल बाढ़ के कारण 71 इंसानों की जान चली गई। भौगोलिक रूप से कर्नाटक का बेलागवी एक सूखा जिला है, लेकिन इस साल यहां 1 से 7 अगस्त के बीच सामान्य से 652 प्रतिशत अधिक बरसात दर्ज की गई, जो पूरे राज्य में सबसे अधिक है। कर्नाटक में भी इस बार सामान्य से 128 फीसदी अधिक बारिश दर्ज की गई। 5 अगस्त तक जिले के सभी बांध लबालब भर गए। इसके बावजूद हिडकल बांध के ऑपरेटर घाटप्रभा नदी में 68.8 घन मीटर प्रति सेकंड (क्यूमेक्स) की दर से ही पानी छोड़ रहे थे। 6 अगस्त को बारिश और तेज हो गई, जिसके बाद बांध के पानी ने उफान मारना शुरू कर दिया। ऐसे में ऑपरेटरों ने अचानक 833.3 क्यूमेक्स पानी छोड़ना शुरू कर दिया। 9 अगस्त को इसे बढ़ाकर 2,858 क्यूमेक्स कर दिया गया। इस समय जलाशय में जितना पानी आ रहा था, उससे कहीं अधिक छोड़ा जा रहा था।

बेलागवी जिले में ही स्थित मालप्रभा बांध में भी यही हालात थे। इस बांध से 7 अगस्त को ऑपरेटर जहां 446 क्यूमेक्स पानी ही छोड़ रहे थे, वहीं 8 अगस्त को अचानक 2,295 क्यूमेक्स पानी छोड़ा जाने लगा।

लबालब भरा हुआ बांध आमतौर पर धान की रोपाई करने वाले किसानों के चेहरों पर खुशियां बिखेर देता है, क्योंकि उन्हें नहरों के जरिए खेतों के लिए पर्याप्त पानी मिल जाता है। लेकिन, भारी बरसात के बीच अचानक भारी मात्रा में आए पानी की वजह से पूरा जिला बाढ़ की चपेट में आ गया। जिला इसके लिए तैयार नहीं था। नतीजतन, बेलागवी बुरी तरह से इस आपदा की चपेट में आ गया। 331 प्रभावित गांवों में कम से कम 11 घर ढह गए और 5,000 से अधिक घर आंशिक तौर पर क्षतिग्रस्त हो गए। करीब 51,000 लोगों को यहां से बाहर निकालना पड़ा। पूरे राज्य के हालात भी इससे अलग नहीं थे। कर्नाटक में करीब 40,000 घर क्षतिग्रस्त हो गए और लगभग 30 हजार लोगों को निचले इलाकों से बाहर निकालना पड़ा। मुख्यमंत्री कार्यालय ने बताया कि बाढ़ और भूस्खलन के कारण 136 महत्वपूर्ण सड़कें क्षतिग्रस्त हो गईं। मुख्यमंत्री बीएस येदुयुरप्पा ने कहा, “अगर हम सभी जिलों का अनुमान लगाएं तो कुल 40,000-50,000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है।” इसी दौरान महाराष्ट्र में भी ऐसी ही कहानी दोहराई जा रही थी। मॉनसून की शुरुआत में ही अपर कृष्णा बेसिन के तीन बड़े बांधों कोयना, वार्ना और राधानगरी में भंडारण क्षमता से अधिक पानी जमा हो चुका था।

भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के अनुसार सतारा, सांगली और कोल्हापुर जिलों, जहां ये बांध स्थित हैं, में 1 से 8 अगस्त के बीच सामान्य से 400 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई। हालांकि, यह बरसात आठ दिनों की अवधि के दौरान हुई और इसके लिए मौसम विभाग पहले ही चेतावनी जारी कर चुका था। जाहिर है, बांधों से पानी छोड़ते समय बेहतर प्रबंधन अपनाया गया होता तो इस बाढ़ को रोका जा सकता था। मध्य प्रदेश के एक गैर-लाभकारी संगठन मंथन अध्ययन केंद्र के श्रीपद धर्माधिकारी कहते हैं कि बांध के अधिकारियों और घाटी के लोगों के बीच किसी तरह का कोई समन्वय नहीं है। वह आगे बताते हैं, “बांध के ऑपरेटर भारतीय मौसम विभाग के साथ भी काम नहीं करते हैं, ताकि बारिश के पैटर्न को समझ सकें। कम बारिश के डर के चलते उनका सारा ध्यान सिर्फ अधिक से अधिक पानी का भंडारण करने पर होता है।” बेहतर मौसम निगरानी उपायों की सिफारिश करने और एक उन्नत बांध प्रबंधन तंत्र स्थापित करने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने 10-सदस्यीय पैनल बनाने का फैसला किया है।

इस साल कर्नाटक और महाराष्ट्र में आई बाढ़ को लेकर साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल (एसएएनडीआरपी) की ओर से किए गए आकलन के अनुसार, अगर 25 जुलाई से बांधों से पानी छोड़ना शुरू कर दिया गया होता और 40-45 फीसदी हिस्सा खाली कर दिया जाता, तो भारी बारिश ने ऐसा कहर नहीं बरपाया होता। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ऑपरेटरों ने पहले से पानी छोड़ना क्यों नहीं शुरू किया?

गर्मियों के अंत तक बांध पूरी तरह से सूख चुका होता है। इसलिए मॉनसून आते ही इन्हें भरना शुरू कर दिया जाता है। धर्माधिकारी कहते हैं, “इसी वजह से जब तेज बारिश का दूसरा दौर शुरू होता है, तो उन्हें अचानक भारी मात्रा में पानी छोड़ना पड़ता है और फिर इस तरह की परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।”

ऐसा नहीं है कि बांध के पानी के प्रबंधन के लिए कोई नियम नहीं है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बांध संचालन कार्यक्रम के लिए “वक्र नियम” (रूल कर्व) का इस्तेमाल किया जाता है। इसके जरिए निर्धारित किया जाता है कि कब और कैसे एक बांध को भरना व खाली करना चाहिए। साथ ही इस नियम के जरिए यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि मॉनसून के अंत तक बांध अपनी क्षमता के मुताबिक पूरा भर गया हो। अत्यधिक बारिश के दौरान बांध पर अधिक दबाव नहीं पड़ता, जिसके चलते नीचे बहाव वाले क्षेत्रों में बाढ़ की आशंकाओं पर भी अंकुश लगता है। लेकिन, भारत के बांध संचालक कभी इस नियम का पालन नहीं करते। नतीजतन हाल ही में देश भर में बांधों से अचानक पानी छोड़े जाने के कारण बाढ़ की घटनाओं का सामना करना पड़ा (देखें, कुप्रबंधन की बाढ़,)।

स्रोत : यह आंकड़े साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रीवर्स एंड पीपल (एसएएनडीआरपी) की रिपोर्ट से संकलित किए गए हैं

एक समस्या यह भी है कि वक्र नियम का निर्माण 1950 के दशक में उस समय की बारिश के पैटर्न के हिसाब से किया गया था। बाद के वर्षों में बरसात की अनिश्चितता बांध संचालकों के लिए परेशानी का सबब बनने लगी। पुणे स्थित सोसायटी फॉर प्रमोटिंग पार्टीसिपेटिव ईकोसिस्टम मैनेजमेंट के वरिष्ठ सदस्य केजे जॉय कहते हैं, “हमें जलवायु परिवर्तन का ध्यान रखते हुए नियम की समीक्षा करनी चाहिए। इसे और गतिशील व लचीला बनाया जाना चाहिए।” वह बताते हैं कि नई बांध परियोजनाओं को तैयार करते समय जलवायु परिवर्तन का ध्यान जरूर रखना चाहिए। पानी के संभावित अंतर्वाह और बहिर्वाह का आकलन जरूरी है। परियोजना की योजना बनाते समय अधिकतम वर्षा का अनुमान लगाना अत्यधिक आवश्यक है। इस संबंध में एक गहन विश्लेषण जरूरी है, क्योंकि यहीं से समस्या का जन्म होता है।

प्रभावी बांध प्रबंधन के लिए पुणे स्थित भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने इसी साल अगस्त से 101 नदी घाटियों में पानी की अपेक्षित मात्रा के बारे में पूर्वानुमान जारी करना शुरू कर दिया है। संस्थान के वैज्ञानिक पुलक गुहाठाकुरता कहते हैं, “आईएमडी को उम्मीद है कि इससे बांध संचालाकों को यह जानने में मदद मिलेगी कि आने वाले दिनों में कैसे हालात होंगे।” एसएएनडीआरपी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी), राज्य जल संसाधन विभाग या बांध प्रबंधक सूचनाओं का उपयोग कैसे करेंगे, इस संबंध में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।

जॉय मानते हैं कि बाढ़ प्रबंधन के लिए बांध अब पुराना और समस्या को बढ़ाने वाला तरीका बन चुका है। यह सुरक्षा की झूठी भावना को जन्म देते हैं और पीछे विनाश के लंबे निशान छोड़ जाते हैं। पंजाब में अमरिंदर सिंह सरकार ने बाढ़ के स्थायी समाधान के लिए राज्य की सभी नदियों के नहरीकरण की घोषणा की है। यमुना जिये अभियान के मनोज मिश्रा कहते हैं, “यह इंजीनियरों वाली मानसिकता है। नदियां नहर नहीं हैं, उन्हें पर्याप्त जगह की जरूरत है। सतलुज नदी में बाढ़ आने की वजह भाखड़ा बांध का खराब प्रबंधन है। सरकार के लिए नदी महज पानी लाने वाला एक माध्यम भर है। हकीकत में यह एक पारिस्थितिकी तंत्र है। इसके लिए इसकी प्रणाली में दखल देने, उसे बाधित करने से बाढ़ की तीव्रता और बढ़ जाएगी। बिहार में कोसी नदी के साथ भी यही हुआ है।”

बांध पुराने और कमजोर होते जा रहे हैं, इसलिए खतरा भी बढ़ता जा रहा है। महाराष्ट्र स्थित रत्नागिरी जिले के तिवरे बांध के टूटने जैसे मामले अब बढ़ गए हैं। 2 जुलाई को हुए इस हादसे में 19 लोगों की मौत हो गई थी। लोकसभा में बहस के दौरान जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने बताया कि देशभर में 5,745 बांध हैं, जिनमें से 293 बांध 100 साल से ज्यादा पुराने हैं। 25 फीसदी बांधों की उम्र 50 से 100 साल के बीच है। 2025 तक हालात भयावह हो चुके होंगे, क्योंकि उस समय तक 301 बांध 75 साल पुराने हो चुके होंगे। इकोनॉमिक एंड पॉलिटकली वीकली (ईपीडब्ल्यू) के इसी साल जून में आए संस्करण के एक लेख के मुताबिक, 2025 तक 496 बड़े बांध 50 साल से अधिक पुराने हो चुके होंगे।

भारत में बांध महज 100 साल की उम्र के हिसाब से ही डिजाइन किए गए हैं। ईपीडब्ल्यू के लेख के मुताबिक, सभी विशाल भंडारण क्षमता वाले निर्माण समय के साथ कमजोर पड़ते जाते हैं। लहरों, गाद, रेत और बजरी के घर्षण की वजह से निर्माण में इस्तेमाल की गई कंक्रीट और स्टील जैसी सामग्री का क्षरण होने लगता है, जिसके चलते बांध कमजोर हो जाते हैं। लेख के अनुसार तापीय प्रसार (थर्मल एक्सपेंशन) और गुहिकायन (कैविटेशन) का भी बांधों पर विपरीत असर पड़ता है और वह कमजोर हो जाते हैं।

हालांकि, सीडब्ल्यूसी के अधिकारियों का कहना है कि उम्र का बांधों की सुरक्षा से कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि कई पुराने बांध संतोषजनक प्रदर्शन कर रहे हैं। जल शक्ति मंत्रालय के पुनर्वास एवं सुधार परियोजना की ओर से 2010 तक बांध संबंधी विफलताओं को लेकर कराए गए विश्लेषण से पता चलता है कि 44.44 फीसदी मामलों में विफलताएं निर्माण के पहले पांच वर्षों के दौरान घटित हुई हैं। 50 से 100 साल तक पुराने बांधों में विफलता की दर 16.67 प्रतिशत और 100 साल से ज्यादा पुराने बांधों में यह 5.56 प्रतिशत से अधिक थी।

सीडब्ल्यूसी के अनुसार, प्रत्येक बांध के निर्माण से पहले उसका खुद का संचालन मैनुअल होना चाहिए। सीडब्ल्यूसी में बांध सुरक्षा संगठन के प्रमुख अभियंता गुलशन राज बांध सुरक्षा विधेयक, 2019 को लेकर काफी उम्मीदें जताते हैं। यह बिल इसी साल 2 अगस्त को लोकसभा में पारित किया गया, लेकिन राज्यसभा में यह पास नहीं हो सका। इस विधेयक में बांधों की निगरानी, निरीक्षण, संचालन और रखरखाव के प्रावधान किए गए हैं। इसके जरिए बांधों के खराब प्रबंधन पर मालिकों को दंडित किया जा सकेगा। यह गंभीर चिंता का विषय है कि बांध संबंधी विफलताओं और इसके चलते आने वाली बाढ़ को लेकर जलाशयों के प्रभारी अधिकारियों की कोई जवाबदेही तय नहीं है। विधेयक में बांध सुरक्षा पर एक राष्ट्रीय समिति और राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण के लिए भी प्रावधान हैं। हालांकि, ये दोनों एजेंसियां सीडब्ल्यूसी के तहत आती हैं और केवल अपनी सलाह दे सकती हैं। उन सलाहों का पालन सुनिश्चित करवाने के लिए इनके पास कोई कानूनी शक्तियां नहीं हैं।

इस विधेयक की सबसे बड़ी खामी यह है कि यह न तो बांध प्रबंधन के बारे में कोई बात करता है और न ही बाढ़ नियंत्रण को लेकर इसमें कोई प्रावधान किए गए हैं। लेकिन, राज को उम्मीद है कि इस विधेयक का एक हिस्सा बांध संचालन में वक्र नियम के पालन को सुनिश्चित करेगा।