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क्या नेपाल में बांध बनाकर बिहार को बाढ़ की आपदा से बचाया जा सकता है?

बिहार में इस साल आयी भीषण बाढ़ के बाद राज्य के नये जल संसाधन मंत्री संजय कुमार झा ने एक बार फिर से नेपाल में बांध बनाये जाने का मुद्दा उठा दिया है

By Pushya Mitra

On: Friday 26 July 2019
 
प्रस्तावित बांध का स्थल जो नेपाल में बराह क्षेत्र से 1.6 किमी उत्तर की दिशा में स्थित है। फाइल फोटो: पुष्य मित्र
प्रस्तावित बांध का स्थल जो नेपाल में बराह क्षेत्र से 1.6 किमी उत्तर की दिशा में स्थित है। फाइल फोटो: पुष्य मित्र प्रस्तावित बांध का स्थल जो नेपाल में बराह क्षेत्र से 1.6 किमी उत्तर की दिशा में स्थित है। फाइल फोटो: पुष्य मित्र

बिहार में इस साल आयी भीषण बाढ़ के बाद राज्य के नये जल संसाधन मंत्री संजय कुमार झा ने एक बार फिर से नेपाल में बांध बनाये जाने का मुद्दा उठा दिया है। उन्होंने कहा है कि जब तक नेपाल में कोसी नदी पर प्रस्तावित उच्च बांध नहीं बन जाता, बिहार को बाढ़ से मुक्ति नहीं मिल सकती। उन्होंने यह भी कहा कि चुकि यह नेपाल और भारत सरकार के बीच का मामला है, इसलिए बिहार सरकार इस मामले में चाह कर भी कुछ कर नहीं पाती। वे कोशिश करेंगे कि भारत सरकार इस मसले पर कोई तत्काल पहल करे। यह कह कर उन्होंने बाढ़ के मसले को केंद्र के पाले में जरूर डाल दिया है, मगर क्या सचुमच नेपाल में उच्च बांध बनने से बिहार की बाढ़ से मुक्ति मिल जायेगी?

उत्तर बिहार को बाढ़ से मुक्ति दिलाने के लिए 1897 से ही भारत और नेपाल की सरकारों के बीच सप्तकोशी नदी पर बांध की बात चल रही है। इसे लेकर आजादी से पहले और बाद में दोनों देशों की सरकारों के बीच कई बार वार्ताएं हुईं और आखिरकार 1991 में दोनों देशों के बीच इसे लेकर एक समझौता भी हुआ। 2004 में इस प्रस्तावित बांध की संभावनाओं को तलाशने के लिए नेपाल के धरान में एक संयुक्त परियोजना कार्यालय भी बना है, जिसमें दोनों देशों के प्रतिनिधि बैठते हैं। मगर 122 साल से अधिक समय बीतने के बावजूद आज तक दोनों देश नेपाल के बराह क्षेत्र से 1.6 किमी उत्तर की दिशा में प्रस्तावित इस बांध के निर्माण को लेकर सहमति नहीं बन पायी है। जानकार बताते हैं कि इसकी वजह यह हैकि नेपाल इस बांध को अपने लिए फायदेमंद नहीं मानता।

इस संयुक्त दल के कार्यालय से प्राप्त परियोजना रपट के मुताबिक यह नेपाल के बराह क्षेत्र के अपस्ट्रीम में 1.6 किमी दूर यह बांध प्रस्तावित है। इसके साथ ही वहां से 7.28 किमी नीचे चतरा में एक बराज और 12 किमी नीचे सिसौली गांव में एक वैकल्पिक बराज बनना प्रस्तावित है। इसके नीचे के नेपाल और भारत के क्षेत्र में बाढ़ से सुरक्षा का लक्ष्य इस बांध का है, साथ ही 3300 मेगावाट बिजली के उत्पादन का भी लक्ष्य है। इस बांध से नेपाल के 5.46 लाख हेक्टेयर और भारत के 9.76 लाख हेक्टेयर भूमि पर सिंचाई का लक्ष्य भी है। इस परियोजना के तहत नेपाल को समुद्र से एक लिंक देने की भी बात है। चारो तरफ जमीन से घिरे नेपाल को बंगाल की खाड़ी से गंगा और कोसी होते हुए एक रास्ता देने का प्रस्ताव है, ताकि वह व्यापार के लिए समुद्री मार्ग का इस्तेमाल कर सके।

चुकि 269 मीटर ऊंचे इस प्रस्तावित बांध से नेपाल के सात जिलों के 75 हजार से अधिक लोगों के विस्थापित होने की बात है और वहां से उत्पादित बिजली का लाभ भी नेपाल को नहीं मिलने वाला है, इसलिए वहां के लोग इस परियोजना के पक्ष में नहीं हैं। स्थानीय लोगों ने कई बार परियोजना के काम को बाधित किया है। बराह क्षेत्र के पास बने परियोजना के दफ्तर में तोड़-फोड़ भी है। समुद्र से लिंक की बात भी उन्हें बहुत लुभा नहीं पा रही, वह अरब सागर से भी एक समुद्री रास्ता चाहता है। मगर क्या यह परियोजना बिहार के हित में है, क्या इस बांध के बनने से बिहार बाढ़ से मुक्ति पा सकता है।

उत्तर बिहार नदियों के विशेषज्ञ दिनेश कुमार मिश्र कहते हैं, बिहार के जलसंसाधन मंत्री के इस बयान में कोई गंभीरता नहीं है, क्योंकि यह बांध सिर्फ कोसी नदी पर बनना है, जबकि उत्तर बिहार में कोसी के अलावा गंडक, बागमती, कमला, बलान और महानंदा नदी में भी नियमित रूप से बाढ़ आती है। इस बांध के बनने से सिर्फ कोसी के इलाके में बाढ़ से सुरक्षा हो सकती है, शेष इलाकों की नहीं। जबकि कोसी का इलाका 2008 के बाद बाढ़ के प्रकोप से अमूमन बहुत कम प्रभावित हो रहा है।

दिनेश कुमार मिश्र कहते हैं, बिहार में बाढ़ आने पर नेपाल में बांध की बात कहना एक तरह से सालाना रस्म बन गयी है। ऐसा लगता है कि सरकार नेपाल में बांध बनने की बात कह कर मामले को केंद्र के पाले में डाल देना और जिम्मेदारी से मुक्त हो जाना चाहती है। यह बात बांध को लेकर हो रहे प्रयासों की गंभीरता को भी देखकर समझ में आता है।

वे कहते हैं, अगर कोसी पर बांध बन भी जाये तो यह कोसी के क्षेत्र में बाढ़ से मुक्ति का रास्ता नहीं है। क्योंकि प्रस्तावित बांध के नीचे भी कोसी का बड़ा जलग्रहण क्षेत्र है। इस क्षेत्र में कोसी में इतना पानी बरसता है कि वह एक पूरे बागमती नदी या कमला नदी के दोगुने के बराबर होता है। बांध इस पानी को रोकेगा नहीं और इस पानी के बाढ़ को झेलना ही पड़ेगा। इस इलाके में जो पानी कोसी नदी के बाहर बरसेगा वह तटबंध की वजह से नदी में जा नहीं पायेगा और वह आखिरकार तटबंध के किनारे के इलाके में जलजमाव करेगा ही। इस तरह बांध के सफलता पूर्वक काम करने पर भी समस्या लगभग जस की तस रहेगी।

वे आगे कहते हैं, अगर बांध के ऊपरी हिस्से में जोरदार बारिश हुई और पानी की अधिकता की वजह से बांध को खतरा लगा तो बांध से पानी छोड़ा जायेगा। इतनी ऊंचाई से अनियंत्रित वेग से छूटा पानी इस इलाके में किस तरह का खतरा उत्पन्न करेगा उसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

नेपाल में नदियों और पर्यावरण के मसले पर काम करने वाले चंद्रकिशोर कहते हैं, अगर यह बांध बना तो नेपाल और भारत दोनों के लिए खतरनाक हो सकता है। क्योंकि जिस जगह बांध बनने का प्रस्ताव है, वहां के पहाड़ बांध के लिए उपयुक्त नहीं हैं। वे बहुत कच्चे हैं। अगर बांध बनाकर उस पहाड़ के भरोसे पानी को रोका गया तो वह दोनों मुल्कों के लिए एक वाटर बम बनकर रह जायेगा।

बिहार के जल संसाधन विभाग के सेवा निवृत्त सचिव गजानन मिश्र एक व्यावहारिक पक्ष की ओर ध्यान आकृष्ट करते हैं। वे कहते हैं, चीन में व्हान्गहो नदी पर लगभग इसी तरह का बांध थ्री गोर्जेज प्रोजेक्ट के तहत बना है। परियोजना रिपोर्ट के निर्माण से लेकर उसको बनने तक लगभग 40 साल का समय लगा। अगर आज सप्तकोशी परियोजना पर काम शुरू हुआ तो उसे बनने में कम से कम इतना समय तो लगेगा। इस बीच के वक़्त में बाढ़ नियन्त्रण की क्या कोई योजना हमारे पास है? वे कहते हैं कि इस बांध के नीचे कोसी नदी की धार के किनारे लगभग 3 करोड़ की आबादी रहती है। अगर यह बान्ध टूटा तो इस पूरी आबादी का क्या होगा, कहना मुश्किल है।