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मक्के की फसल पड़ रही पीली, बाढ़ बढ़ाएगी और मुश्किलें

गुजरात में थोड़े क्षेत्रफल को प्रभावित करने वाली बाढ़ ने 81 जिंदगियां तबाह कर दी, जो यूपी-बिहार जैसे पांरपरिक बाढ़ क्षेत्रों की तबाही से ज्यादा है

By Vivek Mishra

On: Thursday 23 July 2020
 
बाढ़ के बाद पीने के पानी की समस्या खड़ी हो गई है, इसलिए लोग उस हैंडपंप का पानी पीने को मजबूर हैं, जिसका पानी निषेध घोषित किया जा चुका है। फोटो: विवेक मिश्रा
बाढ़ के बाद पीने के पानी की समस्या खड़ी हो गई है, इसलिए लोग उस हैंडपंप का पानी पीने को मजबूर हैं, जिसका पानी निषेध घोषित किया जा चुका है। फोटो: विवेक मिश्रा बाढ़ के बाद पीने के पानी की समस्या खड़ी हो गई है, इसलिए लोग उस हैंडपंप का पानी पीने को मजबूर हैं, जिसका पानी निषेध घोषित किया जा चुका है। फोटो: विवेक मिश्रा

मेरे पास कुल डेढ़ बीघा खेत है। खेतों में मक्का लगाया था लेकिन इतनी बारिश हुई है कि पत्ते पीले पड़ गए हैं। शायद ही खेत से कुछ मिल पाए। मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में पेंट और पॉलिश का काम करते थे, जबसे लौटे हैं तबसे बस चरवाही का काम कर रहे हैं। दो मवेशी हैं उन्हीं के साथ दिन बीत जाता है। कोरोना के डर की वजह से लोग मिलने-जुलने से भी कतराते हैं, मैं भी चरवाही में अकेले जुटा रहता हैं। इस साल बाढ़ भी धीरे-धीरे गांव की तरफ चढ़ रही है। पता नहीं क्या-क्या होना बाकी है? 
 
करीब 38 बरस के संगम यादव गोरखपुर जिले के कतरारी ग्रामसभा के रहने वाले हैं। उन्होंने डाउन टू अर्थ से बताया कि बाढ़ के कारण धान की जगह मक्का और कुछ तिलहन यहां लगाते हैं लेकिन इस बार ज्यादा बारिश ने फसलों की स्थिति बिगाड़ दी है।  नजदीक की ही ग्राम सभा आईमा के निवासी विशाल निषाद ने बताया कि वे भी लाचार हैं, काम है नहीं और गांव में किसी तरह दिन कट रहे हैं।उन्होंने बताया कि लॉकडाउन न होता तो किसी और शहर में कमाई हो रही होती। कोरोना के डर से अभी तो गांव के बाहर नहीं जा रहे हैं। 
 
करजही में चारो तरफ भले ही बाढ है लेकिन साफ पानी पीने को नहीं है। महिलाएं जिन नलों से पानी का निषेध है उसी का इस्तेमाल कर रही हैं।कविता पासवान ने बताया कि वे लाल निशान वाले नल का ही पानी घर में इस्तेमाल कर रहीहैं। किसी तरह की राहत आपदा उनके गांव में नहीं पहुंची है और न ही कोई उनके गांव फुरसा हाल लेने आया है।  राप्ती में वेग बढ़ रहा है और धीरे-धीरे वह गांव के मुहाने को काट रही है। इससे ग्रामीणों की चिताएं बढ़ गई हैं। करजही निवासी रमेश शुक्ला ने बताया कि 2017 में घर के बाहर नाव तक चलानी पड़ी थी। वहीं एक व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने के समय ही उसकी नाव पर ही मौत हो गई थी। 
 
अस्पताल और आपात सुविधाओं के लिए गांव से कभी-कभी 30 किलोमीटर तक बाहर जाना पड़ता है।  संगम यादव बताते हैं कि उनका राशन कार्ड बना है महीने में दो यूनिट करीब 15 किलो अनाज मिल जाता है। पांच लोगों का परिवार है। राशन बराबर मिल रहा है और स्कूल से मिड डे मील के बदले अब पर्ची मिली है जो कोटेदार को देने पर तय मिड डे मील का राशन उन्हें मिल जाएगा। उन्होंने बताया कि यह सब जीवन जीने की जुगत है। जब बैतूल में काम कर रहे थे तो महीने में 10 से 12 हजार रुपये तक कमा लेते थे, तो जीवनगाड़ी बेहतर चल रही थी। संगम यादव लॉकडाउन लगते ही अप्रैल में पैदल चलकर गोरखपुर पहुंचे थे, उन्हें कोई 300 से ज्यादा किलोमीटर की पैदल यात्रा करनी पड़ी थी। हिमालय की तराई हो या गंगा और उसकी सहायक नदियों का बेसिन सब इन दिनों लबा-लब है। बाढ़ की सालाना तय तिथियां हैं और इनका पड़ाव दर पड़ाव रुकना जारी रहता है। तटबंधों और नदियों के मार्ग को संकरा करने वाले पुल और बैराज खतरे के निशान का वाहक बने हुए हैं। एक दर्जन से ज्यादा नदियों के जलस्तर में उतार-चढ़ाव जारी है। 
 
नदियों के रोजाना रिकॉर्ड किए जा रहे जलस्तर की सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक  पश्चिम बंगाल के कोचिबिहार जिले में जलढ़ाका का पानीस्थिर है तो मुर्शिदाबाद में फरक्का बैराज पर गंगा के स्तर में गिरावट है। जबकि उत्तर प्रदेश के बलिया, गोरखपुर, महाराजगंज जिले में रोहिन, घाघरा और राप्ती का जलस्तर बढ़ रहा है।  बिहार के पश्चिमी चंपारण में चनपतिया में बूढ़ी गंडक,सीतामढ़ी जिले में बागमती, गोपालगंज में गंडक, खगड़िया जिले में कोसी, कटिहार जिलेमें महानंदा, पटना में पुनपुन, समस्तीपुर, पूर्बा में बूढ़ी गंडक, दरभंगा जिले मेंअधवारा नदी का जलस्तर बढ़ा बना हुआ है।  वहीं,असम में कोपिली, ब्रह्मपुत्र, बेकी नदी के जलस्तर में बढ़त है।
 
 भारतीय मौसम विभाग के मुताबिक अभी 27 जुलाई तक पश्चिमबंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, असम, मेघालय,महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में भारी वर्षा जारी रह सकती है। जबकि इन राज्यों में अबतक 450 से ज्यादा लोगों की जानें चली गई हैं।  
 
असम में 22 मई से 22 जुलाई के बीच 894.40 एमएम वर्षा हुई है। कुल 30 जिलों में 5,233 गांव 56,27,389 लोग प्रभावित हैं। अब तक 115 लोगों की जान गई है। इनमें 89 मौतें बाढ़ और 26 भूस्खलन के कारण हुई है। वहीं, 2,54,174.46 हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित है। 
 
गुजरात में इस मानसून सीजन में कुल 301.21 एमएम बारिश हुई है और कुल 12 गांव में 2799 लोग प्रभावित हुए हैं लेकिन 81 लोगों की जान अब तक चली गई है। 
 
केरल में एक जून से अब तक 875.7 एमएम बारिश हुई है और 13जिलों में 71 गांवों में 91 लोग प्रभावित हैं। अब तक 25 लोगों की यहां जान गई है।
 
 मध्य प्रदेश में एक अप्रैल से अब तक 331.3 एमएम बारिश हुई है और 32 जिलों में 133 गांव प्रभावित हैं। जबकि जिले में 47 की मृत्यु और 23लोग लापता हैं। 
 
महाराष्ट्र में 445.2 एमएम बारिश एक जून से अब तक हुई हैऔर करीब 48 लोगों की जान गई है।  
 
पश्चिम बंगाल में इस मानसून सीजन में 783.7 एमएम बारिशहुई है।  23 जिले में 1360 गांव और1,72,764 लोग प्रभावित हैं। वहीं, 151 लोगों की अब तक जान गई है। 
 
उत्तराखंड में 15 जून से लेकर अब तक 391.1 एमएम बारिशहुई है। 10 जिले के 4 गांव प्रभावित हैं। अब तक 30 लोगों की जान बाढ़ और भूस्खलनसे गई है, 12 जख्मी हुए हैं। 
 
 उत्तर प्रदेश में एक जून से अब तक 299.6 एमएम बारिश हुईहै। छह जिले में 157 गांव की एक लाख से ज्यादा की आबादी प्रभावित हैं। अब तक सिर्फ2 लोगों के मृत्यु को दर्ज किया गया है। करीब 222 घर टूट गए हैं। 
 
बिहार में इस मानसून सीजन में 642.6 एमएम वर्षा दर्ज हुई है। 10 जिलों के 245 गांव प्रभावित हैं। करीब 4.6 लाख आबादी प्रभावित हई है।मृत्यु का एक भी मामला अभी सरकारी रिकॉर्ड में नहीं है। यह सारे नुकसान हो रहे हैं और सरकार के मुताबिक सबसेज्यादा असम फिर बिहार और अन्य राज्यों में राहत टीमें काम कर रही हैं। हालांकि इन सरकारी आंकड़ों के इतर कई गांव इन रिकॉर्ड में समस्याओं के साथ अपनी जगह नहीं बना पा रहे हैं।  कोरोना के साथ-साथ इस वर्ष की बाढ़ और कुछ ही देर में होने वाली भारी वर्षा ने समस्याओं का कॉकटेल तैयार कर दिया है।  न तो नदी से जुड़ने वाले जलमार्गों की सफाई हुई और न ही वर्षा के जरिए नदियों में आने वाले अथाह जल को रोकने और संरक्षित करने पर कोई ठोस काम हुआ।