Mining

मध्यप्रदेश की नई रेत खनन नीति में एनजीटी के आदेशों की अनदेखी

मध्यप्रदेश की नई रेत खनन नीति में पर्यावरण की क्षति के मूल्यांकन के नियम, परिवहन वाहनों में जीपीएस और रेत खदानों की जियो टैगिंग का उल्लेख नहीं है।

 
By Manish Chandra Mishra
Last Updated: Wednesday 29 May 2019
Photo: Manish Chand Mishra
Photo: Manish Chand Mishra Photo: Manish Chand Mishra

मध्यप्रदेश में कांग्रेस की नई सरकार एक नई रेत खनन नीति के साथ हाजिर है। अब मध्यप्रदेश में पंचायतों की जगह राज्य का खनिज निगम रेत खदानों की निलामी करेगा। निलामी की प्रक्रिया ऑनलाइन होगी। ग्राम पंचायतों से ठेका जारी करने की शक्ति वापस लेने की घोषणा की है, लेकिन  पंचायतों को ठेके पर मिलने वाले लाभ का हिस्सा दिया जाएगा। राज्य सरकार का दावा है कि नई नीति के लागू होने से सरकार को लगभग चार गुणा अधिक यानी 900 करोड़ आमदनी होने की उम्मीद है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या रेत खनन का ठेका निजी हाथों में सौंपने से अवैध खनन की घटनाएं नहीं बढ़ेंगी?

रेत खनन और नर्मदा नदी पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता विनायक परिहार मानते हैं कि सरकार अपनी नई नीति में राष्ट्रीय हरित न्यायालय (एनजीटी) के आदेश को अनदेखा कर रही है। एनजीटी ने अगस्त 2017 में विनायक परिहार के एक मामले की सुनवाई के दौरान अपने आदेश में अवैध खनन पर अंकुश लगाने के लिए सरकार को कुछ महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे। लेकिन  इनमें से कई आदेश जैसे पर्यावरण की क्षति का मूल्यांकन के नियम, परिवहन वाहनों में जीपीएस और रेत खदानों की जियो टैगिंग का काम हुआ ही नहीं। ना ही, नई नीति में इनका उल्लेख है। हालांकि नर्मदा में रेत खनन के लिए मशीन का इस्तेमाल न करना अच्छा फैसला है, लेकिन इस फैसले को लागू करना उतना ही मुश्किल है।

एनजीटी ने तीन अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए एक साथ 19 पृष्ठों का आदेश जारी किया था। जिसमें कहा गया था कि कोर्ट ने देखा है कि राज्य सरकार वाहन और खनिज की जब्ती में ढिलाई बरतती है और कई मामलों में सख्त कानून के बावजूद कार्रवाई नहीं हो पाती। ऐसे मामलों में राजस्व की हानि से अधिक ध्यान पर्यावरणीय क्षति की तरफ देना चाहिए। इस आदेश के मुताबिक, अवैध खनन पकड़े जाने पर सरकार को राजस्व की क्षति होती है, लेकिन पर्यावरण को हुए नुकसान पर कोई बात नहीं होती। एनजीटी ने पर्यावरण विभाग और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को दिए थे कि अवैध खनन के कारण नदी को हुए पर्यावरणीय क्षति की गणना कर उसके पुनर्वास पर होने वाला खर्च खननकर्ता से लिया जाए। 

अवैध खनन पर तकनीकी रूप से निगरानी के लिए एनजीटी ने कहा था कि बिना जीपीएस लगे वाहनों से रेत की ढुलाई की अनुमति नहीं होनी चाहिए। सभी रेत के खदानों का जियो टैगिंग किया जाना चाहिए और रात के समय निगरानी के लिए फ्लड लाइट और बोट का उपयोग भी किया जाना चाहिए। रेत ढुलाई के रास्तों में वाहनों का वजन मापने की व्यवस्था भी हो ताकि अवैध ढुलाई पर काबू पाया जा सके। इस आदेश में जुर्माने की राशि पर भी कई सुझाव सरकार को दिए गए हैं। इसके मुताबिक जुर्माने की राशि का एक अलग हिसाब होना चाहिए और उसका उपयोग नदी को अवैध खनन से हुए नुकसान की भारपाई के लिए हो।

विनायक परिहार बताते हैं कि अब तक सरकार ने नई रेत नीति के बारे में जो भी जानकारियां साझा की है उसमें पर्यावरण की क्षति जानने,  जुर्माने की व्यवस्था बदलने पर कोई बात सामने नहीं आई है। अवैध रेत खनन के दोषी पर अभी जो जुर्माने की व्यवस्था है उससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता और न ही पर्यावरणीय क्षति की भारपाई इस जुर्माने की राशि से की जा सकती है।

सरकार को करोड़ों का घाटा 

फरवरी 2019 में विधानसभा में प्रस्तुत एक रिपोर्ट में सरकार ने माना कि पिछले पांच साल में खनन से जुड़ी 200 से अधिक शिकायतें दर्ज कराई गई हैं, लेकिन उनमें कार्रवाई के नाम पर वाहन जब्ती ही हो पाई है। इस दस्तावेज से खुलासा हुआ है कि जुर्माना लगाने के बाद भी किसी भी मामले में उस राशि की वसूली नहीं हो पाई है। आंकड़ों के मुताबिक 2.5 करोड़ रुपए जुर्माना राशि की वसूली अभी होनी है। वर्ष 2009 से 2015 तक 42,152 खनन से जुड़े मामले दर्ज कराए गए हैं, लेकिन कठोर कार्रवाई का कोई उदाहरण अबतक नहीं देखने को मिला।

जनवरी में जारी सीएजी की रेत खनन और उसके पर्यावरण पर होने वाले प्रभावों पर आधारित ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया कि ई-निलामी का अभाव, वसूली की कारगर व्यवस्था का न होने की वजह से सरकार का काफी नुकसान हो रहा है। यह नुकसान केवल राजस्व का न होकर पर्यावरण पर भी है। चेक पोस्ट और रेत के परिवहन की निगरानी का कोई कारगर तरीका न होने की वजह से यह नुकसान बढ़ता जा रहा है। सभी कारणों को मिलाकर सरकार को एक वर्ष में 164.85 करोड़ रुपए की राजस्व हानि हुई है।

हिंसा का इतिहास

अवैध रेत खनन से अपराध और हिंसा का एक लंबा इतिहास जुड़ा हुआ है। फरवरी 2018 में रेत माफिया ने एक भारतीय वन सेवा के अधिकारी अभिषेक तोमर की हत्या की कोशिष की। अभिषेक उस समय छतरपुर जिले में पदस्थ थे। इसी साल छतरपुर में एक तहसिलदार संजय गर्ग की हत्या की कोशिश भी हुई। वे अवैध खनन की सूचना मिलने पर मौके पर छापामार कार्रवाई करने गए थे। वर्ष 2017 में राज्य के मुरैना जिले में हवलदार धमेंद्र चौहान (40) की रेत माफिया ने डंपर से कुचल कर हत्या कर दी थी। 8 मार्च 1012 को मुरैना में अवैध उत्खनन रोकने पहुंचे आइपीएस अधिकारी नरेंद्र कुमार की ट्रैक्टर से कुचल कर हत्या कर दी गई थी। वहीं, 18 जून 2017 को आइएएस सोनिया मीणा को छतरपुर के खनिज माफिया से धमकी मिली। उन्हें छतरपुर में बयान के लिए जाने को सुरक्षा मांगनी पड़ी। 31 मार्च 2014 को देवरी घडि़याल केंद्र के सामने रेत उत्खनन रोकने पर एसएएफ हवलदार विश्वनाथ की गोली मारकर हत्या कर दी थी।

राज्य सरकार ने राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में फरवरी 2018 में स्वीकारा था कि वर्ष 2015 और 2016 में पत्रकारों के खिलाफ रेत माफिया के द्वारा क्रमशः 19 और 24 जानलेवा हमले हुए। दिसंबर 2017 में 6 पत्रकारों पर छतरपुर जिले में हमले किए गए। मार्च 2018 में भिंड जिले में दिनदहाड़े पत्रकार संदीप शर्मा की हत्या कर दी गई। वे रेत खनन से जुड़े मामलों की पड़ताल कर रहे थे।  

Subscribe to Weekly Newsletter :

Comments are moderated and will be published only after the site moderator’s approval. Please use a genuine email ID and provide your name. Selected comments may also be used in the ‘Letters’ section of the Down To Earth print edition.