Water

1980 से एक करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र पर बढ़ी बाढ़, 40 साल से धूल फांकती रह गईं आरबीए की सिफारिशें

केंद्रीय जल आयोग ने कहा कि राष्ट्रीय बाढ़ आयोग की 1980 में दी गई पहली सिफारिश के बारे में कोई जानकारी नहीं थी इसलिए उस पर अमल नहीं हुआ।

 
By Vivek Mishra
Last Updated: Saturday 10 August 2019
Photo: Agnimirh Basu
Photo: Agnimirh Basu Photo: Agnimirh Basu

“...आने वाले वर्षों में हम यह आशा नहीं कर सकते कि हम बाढ़ के खतरों से पूर्णतया सुरक्षित होकर भाग्यशाली स्थिति में आ जाएंगे। हमें एक सीमा तक बाढ़ों के साथ जीवन निर्वाह करना सीखना होगा…”

यह व्यक्तव्य का वो हिस्सा है जिसे 27 जुलाई, 1956 को तत्कालीन केंद्रीय योजना और सिंचाई मंत्री गुलजारी लाल नंदा ने लोकसभा में पढ़ा था (स्रोत- बंदिनी महानंदा)। यह भी गौर करने लायक है कि 3 सितंबर, 1954 को आजाद देश की पहली राष्ट्रीय बाढ़ नीति के ऐलान के ठीक दो वर्ष बाद ही तत्कालीन केंद्रीय मंत्री ने यह बयान दिया था।

क्या बाढ़ के साथ अब भी जीवन निर्वाह हो रहा है? क्या 4 दशक पूर्व की नीतियां इस दिशा में कुछ कर पाईं? बीते वर्ष (19, मार्च 2018) को राज्यसभा में दिए गए एक लिखित जवाब में केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) के हवाले से कहा गया है कि 1953 से 2017 तक कुल 64 वर्षों में बारिश और बाढ़ के कारण 107,487 लोगों की मृत्यु हुई है। वहीं, विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 2019 में अब तक बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के कारण मरने वालों की संख्या 50 पार कर गई है जबकि, बीते वर्ष 2018 में कुल 2,045 लोगों की मृत्यु हुई थी।

1954 की बाढ़ नीति तीन (तात्कालिक, अल्पावधिक और दीर्घकालिक) चरणों में बंटी थी। 14 से 15 वर्षों में बाढ़ पर काबू करने का दावा था। फिर 1976 में राष्ट्रीय बाढ़ आयोग (आरबीए) बना। वर्ष भर बीते होंगे और 1977-78 में भीषण बाढ़ ने देश को अपनी चपेट में ले लिया। यह बाढ़ कितनी भीषण थी?

इंटरनेशनल कांफ्रेंस ऑन फ्लड डिजास्टर्स (3-5 दिसंबर, 1981) में प्रोफेसर हुसैन मोहम्मद सलाहुद्दीन का शोधपत्र पढ़ा गया था। इसके मुताबिक गुजरात में कुछ ही वर्ष पूर्व मूर्वी बांध टूटने के कारण पूरा मूर्वी गांव बह गया और करीब 10,000 लोग मारे गए। 1977 में तमिलनाडु के तिरुचि में पांच लाख आबादी में करीब एक लाख आबादी महज चार घंटे के जलभराव में ही डूब गई। 19 नवंबर, 1977 को आंध्र प्रदेश के चिराला तट पर जलस्तर 5.5 मीटर बढ़ गया, 25 किलोमीटर दूर पूरी तालुका साफ हो गई। कुछ घंटों और एक दिन में वहां 200 करोड़ रुपये का नुकसान हो गया। डिजास्टर मैनेजमेंट में सिस्टम एप्रोच की बात करने वाले इस शोध पत्र में कहा गया कि राहत कार्यों में सबसे बड़ी परेशानी समन्वय की है। यह समन्वय की परेशानी 2019 में भी बरकरार है। केंद्रीय जल आयोग जो बाढ़ के पूर्वानुमान और चेतावनियों को जारी करने की प्रमुख एजेंसी है वह हाल ही के वर्षों में आई बड़ी बाढ़ों (उत्तराखंड, श्रीनगर, चेन्नई, केरल, राजस्थान, महाराष्ट्र) के दौरान इस काम में पूरी तरह विफल रही है।

20 मार्च 1980 में राष्ट्रीय बाढ़ आयोग ने भी बाढ़ के साथ जीवन निर्वाह करने की बात को तरजीह देते हुए बाढ़ क्षति कम करने के लिए 207 सिफारिशें दीं थी। इन सिफारिशों को गाइडलाइन के तौर पर 1981 में देश के सभी राज्यों और संघ शासित प्रदेशों को भेज दिया गया था। लेकिन फिर क्या हुआ?

बाढ़ मुक्ति अभियान के संयोजक और लेखक दिनेश मिश्रा ने डाउन टू अर्थ को बताया कि 1995 में इन 207 सिफारिशों में करीब 95 को मंजूर किया गया और स्थिति यह हुई कि इनमें से एक भी सिफारिश को लागू नहीं किया गया। इसी मुद्दे पर कैग ने राष्ट्रीय बाढ़ आयोग (आरबीए) की सिफारिशों के अमल को लेकर 2017 में अपनी ऑडिट रिपोर्ट में कहा कि आयोग की ज्यादातर और अहम सिफारिशों पर करीब 40 वर्ष बीतने के बाद भी अमल नहीं किया गया।

राष्ट्रीय बाढ़ आयोग की सिफारिशों में कहा गया था कि आयोग के जरिए बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की जो पहचान की गई है उसे सभी राज्य या संघ को दौरा करके वैज्ञानिक विधि से प्रमाणित करना चाहिए। आंकड़े के साथ बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के नक्शे भी बनाने चाहिए। साथ ही किसी भी समय यदि कहीं बाढ़ की स्थिति है तो उसके आंकड़ों को भी दर्ज करें। राज्यों को बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के यह जांचे हुए आंकड़े नक्शों के साथ केंद्रीय जल आयोग (सीडडब्ल्यूसी) या गंगा बाढ़ नियंत्रण आयोग (जीएफसीसी) के पास मार्च, 1982 से पहले भेजना था। साथ ही इसके सत्यापन की भी पुष्टि करनी थी। राष्ट्रीय बाढ़ आयोग की सिफारिशों में केंद्रीय जल आयोग या जीएफसीसी को भी नक्शे के मुताबिक औचक निरीक्षण की बात कही गई थी। इसके अलावा इन आंकड़ों को हर पांच वर्ष पर दुरुस्त करने व बाढ़ प्रभावित क्षेत्र को परिभाषित करने के लिए भी कहा गया था।

करीब 20 वर्षों बाद 2001 में केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने अपने जारी बयान में यह स्वीकार किया कि राष्ट्रीय बाढ़ आयोग की सिफारिशों पर अभी तक अमल नहीं किया जा सका है। राष्ट्रीय बाढ़ आयोग की सिफारिशों पर समीक्षा जारी है। आखिरकार 2003 में केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय की गठित एक्सपर्ट कमेटी (मार्च 2003) ने आरबीए की सिफारिशों की समीक्षा रिपोर्ट जारी की।

कैग ने 2017 की ऑडिट रिपोर्ट में राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के सिफारिशों पर आधारित समीक्षा रिपोर्ट के हवाले से कहा कि कुल 17 राज्यों और संघ शासित प्रदेशों ने ही बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के आंकड़े उपलब्ध कराए हैं। साथ ही सम और उत्तर प्रदेश को छोड़कर किसी ने आरबीए के जरिए बाढ़ प्रभावित क्षेत्र के अनुमानित आंकडो़ं को सत्यापित नहीं किया है। सिर्फ उत्तर प्रदेश और असम ने ही केंद्रीय जल आयोग और जीएफसीसी को आंकड़ों के साथ बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के नक्शे उपलब्ध कराए हैं। ऐसे में 15 राज्यों ने इसे सत्यापित नहीं किया गया।

कैग ने ऑडिट रिपोर्ट में कहा कि  केंद्रीय जल आयोग को बाढ़ प्रभावित क्षेत्र संबंधी आरबीए की इन सिफारिशों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। इसलिए देश में बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की पहचान का काम पूरा नहीं हुआ। न ही राज्यों ने नदी बेसिन के विस्तृत नक्शे के साथ बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के आंकड़े उपलब्ध कराए हैं। और न ही सीडब्ल्यूसी या जीएफसीसी ने नक्शों के आधार पर बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की पहचान के लिए कोई दौरा किया गया है। वहीं, इस मसले पर 2016 में केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने कहा कि राष्ट्रीय बाढ़ आयोग की जो भी जरूरी सिफारिशे थीं उस पर काम किया गया है। हालांकि, इस बिंदु पर काम नहीं किया गया है। जब बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के बारे में जानकारी ही नहीं है तो नदियों के डूब क्षेत्रों का संरक्षण कैसे होगा?

उत्तर की गंगा से लेकर दक्षिण की गंगा (कावेरी) तक कहीं भी बाढ़ का डूब क्षेत्र सुरक्षित नहीं बचा है। न ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के आदेश के बावजूद अतिक्रमण के खिलाफ कोई ठोस कदम उठाया गया है। कैग ने 2017 की अपनी ऑडिट रिपोर्ट में राष्ट्रीय बाढ़ आयोग की सिफारिशों के आधार पर जो दूसरी सबसे बड़ी कमी की ओर इशारा किया, वह था फ्लड प्लेन जोनिंग बिल को समयबद्ध तरीके से लागू करना। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के वैज्ञानिक और डिजिटल नक्शे तैयार करना आदि। फ्लड प्लेन जोनिंग बिल को लेकर जम्मू-कश्मीर, मणिपुर, राजस्थान और उत्तराखंड ने सिर्फ कदम बढ़ाया है लेकिन इसे लागू यह राज्य भी नहीं कर सके हैं। यही हाल रिवर बेसिन प्राधिकरणों का भी है। संसद के अगले शीतकालीन सत्र में 13 रिवर बेसिन प्राधिकरणों के बिल पर विचार होगा।

बाढ़ के साथ निर्वाह की स्थिति अब खत्म हो रही है। केंद्र और राज्य सरकारों ने बाढ़ की विभीषिका की दशकों अनदेखी की है। वहीं, सरकारें अनदेखी की कमी को छुपाकर बाढ़ क्षेत्रों में आबादी के दबाव और जलवायु परिवर्तन की समस्या, अनियमित और अतिशय बारिश के कारणों को प्रमुखता से गिना रही है। राष्ट्रीय बाढ़ आयोग ने 1980 में बताया था कि देश के कुल 21 जिलों में 4 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र बाढ़ प्रभावित है हालांकि अब सरकार की ओर से 11 जुलाई 2019 को लोकसभा में दिए गए जवाब के मुताबिक देश के 39 जिलों में करीब 5 करोड़ हेक्टेयर (49.85 एमएचए) भूमि बाढ़ प्रभावित है। सरकार के आंकड़ों से ही पता चलता है कि बचाव कार्यक्रमों और दशकों पुरानी नीतियों के बावजूद एक करोड़ अधिक हेक्टेयर भूमि बाढ़ प्रभावित हो चुकी है। यह तब है जब कई राज्यों ने अपने आंकड़ों को रिवर बेसिन नक्शे के साथ सत्यापित नहीं किया है।

गंगा के मैदानी भागों वाली बेसिन में बाढ़ नियंत्रण के लिए वर्किंग ग्रुप की एकीकृत कार्रवाई योजना बनाई गई थी। इस योजना की शुरुआत में एक विभागीय पत्र है। यह 15 दिसंबर, 1978 को कृषि मंत्रालय के एडिशनल सेक्रेट्री एसपी मुखर्जी ने अपने सेक्रेट्री जीवेके रा‌व को लिखा था। इसमें कहा गया है कि देश ने 14 अगस्त, 1978 की भीषण बाढ़ को झेला है। ऐसे में बाढ़ नियंत्रण का यह कार्यक्रम डाउनस्ट्रीम में इंजीनियरिंग और मिट्टी के कटान को रोकने व संरक्षित करने वाला होगा। साथ ही अगले पांच से सात वर्षों में बाढ़ बचाव के काम इसी से किए जाएंगे। तब उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश में बाढ़ नियंत्रण कार्यक्रम के लिए कुल 1727.12 करोड़ रुपये की परियोजना केंद्र की ओर से बनी थी। राज्य भी बाढ़ नियंत्रण कार्यक्रम चलाते हैं। केंद्र जरूरी और आपात स्थितियों के लिए पैसा देती है क्योंकि बाढ़ राज्य का विषय हैं। बहरहाल 2019 में बाढ़ नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार का बजट 13238.36 करोड़ रुपये पहुंच चुका है। 522 परियोजनाएं हैं। एक दर्जन से ज्यादा बाढ़ नियंत्रण और बचाव वाली समितियां और संस्थान आदि हैं।

राष्ट्रीय बाढ़ आयोग की सिफारिशों के मुताबिक लोगों की जनभागीदारी से भी बाढ़ बचाव कार्यक्रम को अंजाम देना था। मछुआरे हों या नदियों पर आश्रित रहने वाली आबादी आज वह लगातार डूब रही है। पानी पर लोक ज्ञान की बूटी देने वाले अनुपम मिश्र के शब्दों में कहें तो यह तैरने वाला समाज डूब रहा है।

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