Governance

वनवासियों को बेदखली का डर, मंत्रालय ने कहा अस्वीकृतियों के आंकड़े अंतिम नहीं

आदिवासी शिक्षित नहीं हैं और न ही इनकी आर्थिक स्थिति ठीक है। जानकारी के अभाव में ग्राम सभा स्तर पर ही उनके बहुत से दावे खारिज हो जाते हैं

 
By Ishan Kukreti
Last Updated: Monday 25 February 2019
Credit: Agnimirh Basu
Credit: Agnimirh Basu Credit: Agnimirh Basu

अपील प्रक्रिया में वनवासियों के 19 लाख दावों को खारिज कर दिया गया है। इन आंकड़ों को देखते हुए वनवासी अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं को डर है कि इससे बड़े पैमाने पर वनवासियों की बेदखली हो सकती है। यह भी कहा जा रहा है कि इन आंकड़ों से सच्ची तस्वीर सामने नहीं आ रही है।

दरअसल, सर्वोच्च न्यायालय ने 13 फरवरी 2019 को राज्य सरकारों से शपथ पत्र दाखिल वन भूमि पर किए गए अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई की जानकारी मांगी है। 20 फरवरी को लिखित आदेश में न्यायालय ने अतिक्रमण करने वालों पर कार्रवाई करने को भी कहा है। ये दोनों काम 27 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई से पहले करने हैं। न्यायालय वन्यजीव संगठनों और सेवानिवृत अधिकारी की याचिका पर सुनवाई कर रहा है। यह याचिका अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) कानून 2006 अथवा वनाधिकार (एफआरए) के खिलाफ है।

वाइल्डलाइफ फर्स्ट संगठन ने 21 फरवरी 2019 को लिखित प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि तय कानून के तहत द्वि स्तरीय अपील हुई जिसमें 30 सितंबर 2018 तक 19,34,345 दावे खारिज हो गए जिसमें व्यक्तिगत दावे 18,88,066 थे।

याचिकाकर्ताओं में शामिल वन्यजीव कंजरवेशन ऑर्गनाइजेशन का कहना है कि 14,77,793 दावे ग्रामसभा स्तर पर खारिज कर दिए गए।

जनजातीय मामलों के मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार, 19,34,345 खारिज दावे अद्यतन नहीं है। यह आंकड़े मंत्रालय की अक्टूबर 2018 की एफआरए क्रियान्वयन रिपोर्ट के अनुसार हैं। ये आंकड़े नवंबर 2018 की रिपोर्ट में बढ़कर 19,39,231 हो गए। 

आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि ये आंकड़े तय अपील प्रक्रिया के बाद खारिज किए गए दावों को नहीं दर्शाते।  

वनाधिकार वनवासी समुदायों के वनों पर अधिकार को मान्यता प्रदान करता है, जिसकी जमीन पर वे परंपरागत रूप से निर्भर रहे हैं। इस कानून के तहत वनवासी हक का दावा कर सकते हैं।

सूत्रों का कहना है कि मंत्रालय की वेबसाइट के आंकड़े राज्यों द्वारा दिए गए आंकड़ों के आधार पर बदलते रहते हैं। राज्य ग्राम सभा, सब डिवीजनल लेवल कमिटी (एसडीएलसी) अथवा जिला स्तरीय समिति (डीएलसी) में खारिज मामलों की जानकारी देते हैं।

वाइल्डलाइफ फर्स्ट के मुताबिक, अधिकांश अस्वीकृतियां पहले चरण यानी ग्रामसभा स्तर पर हुई हैं। वनाधिकार कानून के तहत दावे ग्राम सभा स्तर की समिति से एसएलडीसी और अंतत: डीएलसी तक पहुंचते हैं। स्वीकृतियां तीन में से किसी भी स्तर पर खारिज हो सकती हैं लेकिन दावेदार अगली समिति में अपील कर सकता है। वनाधिकार के तहत डीएलसी में होने वाली अस्वीकृतियों को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। सूत्रों के अनुसार, अस्वीकृत दावों के ज्यादातर मामलों में दावेदार न्यायालय नहीं पहुंचे।

एक अधिकारी ने डाउन टू अर्थ को बताया कि आदिवासी शिक्षित नहीं हैं और न ही इनकी आर्थिक स्थिति ठीक है। बहुत बार तो उन्हें यही नहीं पता होता कि अपना दावा पेश करने के लिए किन प्रमाणों की आवश्यकता है। इस कारण ग्राम सभा स्तर पर ही बहुत से दावे खारिज हो जाते हैं जो आम है। 

जनजातीय मामलों का मंत्रालय तीनों समितियों के स्तर पर खारिज हुए दावों का आंकड़ा नहीं एकत्र करता। हालांकि इसकी वेबसाइट में ओडिशा का 30 अप्रैल 2017 तक का आंकड़ा है। इसके अनुसार, 34 प्रतिशत अस्वीकृतियां प्रमाणों के अभाव और 17 प्रतिशत अस्वीकृतियां गैर वन भूमि में दावे के कारण हुईं।

भुवनेश्वर स्थित गैर लाभकारी संगठन वसुंधरा के गिरि राव के मुताबिक, अस्वीकृति और निस्तारण की अंतिम प्रक्रिया को पूरा होने में करीब 240 दिन लगते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों को शपथपत्र दाखिल करने के लिए 150 दिन का समय दिया है।  

वाइल्डलाइफ फर्स्ट के प्रवीण भार्गव सवाल उठाते हैं कि जब संख्या में गड़बड़ी को इंगित कर दिया गया था तो मंत्रालय ने प्रक्रिया में पारदर्शिता क्यों नहीं अपनाई?

उनका कहना है कि वनाधिकार पहले से मौजूद अधिकार को मान्यता देता है, नए अतिक्रमण को नहीं। दावों के खारिज होने के बाद भी भूमि पर अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए?   

Subscribe to Weekly Newsletter :

India Environment Portal Resources :

Comments are moderated and will be published only after the site moderator’s approval. Please use a genuine email ID and provide your name. Selected comments may also be used in the ‘Letters’ section of the Down To Earth print edition.