Water

बूंद भर प्रदूषण की मनाही बावजूद घूंट भर पीने लायक नहीं गंगा  

एनजीटी ने कहा अब हमारे पास कठोर उपायों के सिवा कोई रास्ता नहीं। गंगा की स्वच्छता को धन उगाही या व्यावसायिक व औद्योगिक धंधे के भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता है।

 
By Vivek Mishra
Last Updated: Tuesday 21 May 2019
Photo : Meeta Ahlawat
Photo : Meeta Ahlawat Photo : Meeta Ahlawat

जब देश में ज्यादातर लोग सियासी हार-जीत के आंकड़ों में उलझे हैं उसी वक्त देश की राष्ट्रीय नदी गंगा इस सोच में है कि मेरा अस्तित्व बचेगा या नहीं। पीएम नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी और कुंभ नगरी इलाहाबाद में भी गंगा का पानी पीने लायक नहीं है। हालत यह हो चुकी है कि समूचे उत्तर प्रदेश में कहीं भी गंगा का पानी सीधे नहीं पिया जा सकता। यह खुलासा हाल ही में सूचना के अधिकार से मिले जवाब में हुआ है। वहीं, केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से गंगा की सफाई और प्रदूषण रोकने के लिए किए गए प्रयासों पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने अंसतुष्टि और नाराजगी जाहिर करते हुए कहा है कि अब उनके पास कठोर उपायों के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा है।

एनजीटी में जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने 14 मई को उत्तराखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड व पश्चिम बंगाल को आदेश देने के साथ ही अपनी सख्त टिप्पणी में कहा है कि यह गौर करने लायक है कि ‘गंगा देश की राष्ट्रीय नदी है और इसका समूचे देश के लिए एक विशेष महत्व है। यहां तक कि गंगा की एक बूंद भी गंभीरता का विषय है। गंगा में प्रदूषण रोकने के लिए सभी प्राधिकरणों का रवैया कठोर और जीरो टालरेंस वाला होना चाहिए। साथ ही प्रदूषण को रोकने के लिए बचाव के सिद्धांत का भी पूर्ण पालन होना चाहिए।’

पीठ ने कहा कि ‘गंगा की स्वच्छता को धन उगाही और व्यावसायिक व औद्योगिक धंधे के भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता है। यहां तक कि कोई व्यक्ति भी यदि गंगा को प्रदूषित करता है तो उसे कानून के अधीन दंडित किया जाना चाहिए। यही मॉडल देश की समूची नदियों के लिए लागू होना चाहिए। यह बेहद दुखद है कि देश की नदियों के 351 हिस्से प्रदूषित हैं। एनजीटी ने कहा कि उनके जरिए गंगा सफाई को लेकर 10 दिसंबर, 2015 को दिए गए विस्तृत आदेशों का पालन गंभीरता से होना चाहिए।’

डूब क्षेत्र वन विभाग को सौंपना उचित होगा

एनजीटी ने उत्तराखंड, यूपी, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिवों को आदेश दिया है कि वह अपने-अपने राज्यों में गंगा की गुणवत्ता से संबंधित रिपोर्ट और आंकड़े अपने वेबसाइट पर हर महीने प्रकाशित करें। वहीं, सीपीसीबी इन आंकड़ों को गंगा की स्वच्छता प्रदर्शित करने वाले वेबसाइट पर दिखाए। इसके अलावा डूब क्षेत्र का सीमांकन भी किया जाए। अतिक्रमण हटाया जाए और प्रतिबंधित किया जाए। बायोडायवर्सिटी पार्क विकसित करने और वानिकी के लिए कदम बढाए जाएं। सीपीसीबी और केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय इसके लिए गाइडलाइन जारी करें। इसके अलावा यह उचित होगा कि डूब क्षेत्रों को केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय और संबंधित राज्य जांचकर वन विभाग को वानिकी और बायोडायवर्सिटी पार्क के लिए सौंपे।

एनजीटी ने कहा है कि हम उम्मीद करते हैं कि देश के सभी संबंधित राज्य, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन और केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय गंगा सफाई के आदेशों पर अमल करेंगे और अपनी गंभीरता दिखाएंगे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर एनजीटी ही गंगा के मामलों पर चरणबद्ध तरीके से सुनवाई कर रही है।

सूचना के अधिकार से मिली जानकारी

वहीं, हाल ही में याची व पर्यावरणविद विक्रांत तोंगड़ को सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी में उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) ने कहा है कि समूचे उत्तर प्रदेश में कहीं भी गंगा का पानी पीने लायक नहीं है। 

यूपीपीसीबी की ओर से 10 मई को आरटीआई के जवाब में बताया गया कि यूपी में गंगा का कोई ऐसा स्ट्रेच नहीं है जहां नदी का पानी सीधे पिया जा सकता है। नेशनल वाटर क्वालिटी मानीटिरिंग प्रोग्राम के जरिए 31 स्थानों पर सैंपल लिए गए जबकि यूपीपीसबी ने 2 जगह के सैंपल एकत्र किए हैं। यह नमूने 2014 से 2018 के बीच बिजनौर, मुजफ्फरनगर, हापुड़, बुलंदशहर, बंदायूं, फर्रुखाबाद, कन्नौज, कानपुर, रायबरेली, प्रतापगढ़, कौशांबी, इलाहाबाद, मिर्जापुर, वाराणसी और गाजीपुर से लिए गए।

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