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10 हजार में से 8 बच्चों की मौत का कारण बन रहा है वायु प्रदूषण: रिपोर्ट

डाउन टू अर्थ मैगजीन और सेंटर फॉर साइंस एंड इनवॉयरमेंट द्वारा द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर जारी स्टेट ऑफ इंडियाज इनवॉयरमेंट 2019 रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है।

By Vivek Mishra, Raju Sajwan

On: Tuesday 04 June 2019
 

सिर्फ बड़े और मेट्रो शहर ही नहीं बल्कि छोटे शहर-कस्बों और छोटी उम्र के बच्चों पर वायु प्रदूषण का सर्वाधिक खतरा मंडरा रहा है। भारत में सालाना करीब 12.5 लाख मौतों का कारण वायु प्रदूषण बन चुका है। प्रत्येक 10 हजार में 8 से ज्यादा बच्चे ऐसे अभागे हैं जो वायु प्रदूषण के कारण पांच वर्ष की उम्र पूरा करने से पहले ही काल के गाल में समा जा रहे हैं।

डाउन टू अर्थ मैगजीन और सेंटर फॉर साइंस एंड इनवॉयरमेंट द्वारा द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर जारी स्टेट ऑफ इंडियाज इनवॉयरमेंट 2019 रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है। रिपोर्ट बताती है कि भले ही सबल और धनवान राज्यों में वायु प्रदूषण से लड़ने की क्षमता ज्यादा हो, लेकिन नुकसान वहां भी जारी है। यह चिंताजनक है कि ऐसे राज्य जहां गरीबी ज्यादा है वहां के लोगों पर वायु प्रदूषण की दोहरी मार पड़ रही है। वायु प्रदूषण हमारी जीवन गुणवत्ता और जीवन प्रत्याशा को भी घटा रहा है। एक अध्ययन के मुताबिक यदि वायु प्रदूषण की रोकथाम के गंभीर प्रयास किए जाएं और हवा स्वच्छ हो तो जीवन प्रत्याशा में 1.7 वर्ष की वृद्धि हो सकती है।

दिल्ली-एनसीआर में हवा की आपातकाल स्थितियों के दौरान खराब मंशा का प्रदर्शन होता रहता है। ऐसे में सरकार और आला अधिकारियों को स्वच्छ हवा के लिए तैयार नीति या मौजूदा कानूनों को धरातल पर लागू करने की अपनी मंशा को स्वच्छ बनाना होगा। क्रियान्वयन (इंम्पलीमेंटेशन) ऐसा शब्द बन चुका है जो सर्वोच्च अदालत से लेकर आम आदमी की जुबान पर है। सभी इसे अपने परिवेश में आस-पास नहीं पाते हैं। खराब और दूषित हवा के लिए कानूनों का सख्ती से पालन करने के साथ ही उनके क्रियान्वयन पर भी पूरा जोर देना होगा। सभी वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिए क्रियान्वयन चाहते हैं। क्रियान्वयन खासतौर से गांव, कस्बों और छोटे शहरों के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है।

देश-विदेश की संस्थाएं लगातार इस बात की ओर इशारा कर रही हैं कि यदि स्वच्छ हवा के लिए गंभीर प्रयास न हुए तो इसका खामियाजा आने वाली नस्लों को झेलना होगा। वायु प्रदूषण के कारण श्वास और दिल की बीमारी के साथ ही मधुमेह जैसी गंभीर बीमारियां भी लोगों को अपना शिकार बना रही हैं। वायु प्रदूषण और बीमारियों के बीच का रिश्ता भी स्पष्ट हो चुका है (देखें: 2016 में वायु प्रदूषण की वजह से बच्चों की मौत, पृष्ठ- 33)। बावजूद इसके हमारे राजनेता दुष्परिणामों से भी मुंह फेर लेते हैं। आंकड़े सिर्फ डराने के लिए नहीं होते हैं। विषय की गंभीरता बताने के लिए भी होते हैं। वायु प्रदूषण के कारण होने वाली समयपूर्व मौत के आंकड़े दुष्परिणामों की गंभीरता को बताते हैं। समयपूर्व हो रही मौतों का सबसे ज्यादा दुष्परिणाम पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों को और गरीब व बूढ़ों को झेलना पड़ रहा है। हमारे घर और शहरों से निकलता कचरा धुंआ बन रहा है। यह धुंआ हमारे वातावरण मंे जहर घोलता है।

यह जरूरी है कि कचरे की स्रोत पर ही न सिर्फ छंटाई की जाए बल्कि लैंडफिल साइट तक पहुंचाने के क्रम में यह ख्याल रखा जाए कि इसका वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण कैसे किया जाएगा। इसके लिए राजनीतिक इरादे भी जरूरी हैं। ऐसे में, यदि अभी से प्रयास नहीं हुए तो फिर आगे कुछ न करने का पश्चाताप ही हमारे पास होगा।