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तीन मिनट, एक मौत: वायु प्रदूषण से कोशिकाओं में कैंसर का खतरा

18 वर्ष की उम्र तक श्वेत बच्चों की तुलना में भारतीय बच्चों के फेफड़े का आकार 20 फीसदी छोटा होता है, जो वायु प्रदूषण की स्थिति में बीमारियों का कारण बनते हैं

On: Saturday 30 November 2019
Photo: Vikas Choudhary

तीन मिनट, एक मौत से आशय है कि देश में वायु प्रदूषण की वजह से भारत में औसतन तीन मिनट में एक बच्चे की मौत हो जाती है। डाउन टू अर्थ ने इसकी व्यापक पड़ताल की है। इसे एक सीरीज के तौर पर प्रकाशित किया जा रहा है। अब तक आप पढ़ चुके हैं कि वायु प्रदूषण से बच्चों की मौत के मामले सबसे अधिक राजस्थान में हुए हैं। इसके बाद जहरीली हवा की वजह से बच्चों की सांस लेना हुआ मुश्किल में हमने बताया कि अनस जैसे कई बच्चे लगभग हर माह अस्पताल में भर्ती होना पड़ रहा है। तीसरी कड़ी में    बताया गया कि तीन दशक के आंकड़ों के मुताबिक बच्चों की मौत की दूसरी बड़ी वजह निचले फेफड़े के संक्रमण होना रहा है। चौथी कड़ी में बताया गया कि वायु प्रदूषण के कारण बच्चे अस्थमा का शिकार हो रहे हैं। पांचवी कड़ी में अपना पढ़ा कि बच्चे कैसे घर के भीतर हो रहे प्रदूषण का शिकार हो रहे हैं। छठी कड़ी में आपने पढ़ा, वायु प्रदूषण से फेफड़े ही नहीं, दूसरे अंगों पर भी हो रहा असर । इससे अगली कड़ी में हमने बताया कि राज्य कोई भी हो, लेकिन ठंड का मौसम होने के बाद बच्चों की दिक्कतें बढ़ जाती हैं। इसके बाद सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट की कार्यकारी निदेशक अनुमिता रॉय चौधरी के लेख में वायु प्रदूषण को टाइम बम जैसी स्थिति बताया गया। इसके बाद  आपने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले में ग्लोबल एनवायरमेंटल हेल्थ व स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के प्रोफेसर व नई दिल्ली स्थित कोलैबोरेटिव क्लीन एअर पॉलिसी सेंटर में निदेशक किर्क आर स्मिथ का लेख पढ़ा। आज आप पढ़ेंगे नई दिल्ली स्थित प्राइमस सुपरस्पेशिएलिटी अस्पताल में पल्मनरी, स्लीप व क्रिटिकल केयर मेडिसिन के विभागाध्यक्ष एसके छाबड़ा का लेख-

Dr. Chhabra

वायु प्रदूषण की स्थानिक समस्या सर्दियों के वक्त चरम पर होती है। यह समूची आबादी के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती है। हालांकि, आबादी में अतिसंवेदनशील खासकर बच्चों में इसका असर अधिक ही है। बच्चों पर वायु प्रदूषण के प्रतिकूल असर पड़ने के कई कारण हैं। जन्म के बाद लगातार फेफड़े का बढ़ते जाना, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकसित होना और ज्यादा सक्रिय जीवनशैली इन कारणों में प्रमुख हैं। बच्चे ज्यादा वक्त घरों से बाहर रहते हैं और इस दौरान वे ज्यादा सक्रिय होते हैं। लिहाजा वयस्कों की तुलना में बच्चे ज्यादा प्रदूषित हवा सांस के माध्यम से अंदर खींचते हैं।

बच्चों को बाहरी वातावरण के साथ ही घर के भीतर मौजूद वायु प्रदूषण की मार भी झेलनी पड़ती है। बच्चे जब स्कूल जाने लायक नहीं होते, तो ज्यादा वक्त घरों में बिताते हैं और इस दौरान घरों के भीतर मौजूद प्रदूषित हवा उन्हें काफी नुकसान पहुंचाती है। खासतौर से जो घर हवादार (वेंटिलेटेड) नहीं होते और जहां बायोमास ईंधन का इस्तेमाल ऊर्जा जरूरतों के लिए प्रमुखता से किया जाता है, वहां बच्चों को श्वसन संबंधी जटिल रोगों का सामना करना पड़ता है। इसमें सबसे ज्यादा असर फेफड़ों पर पड़ता है।

भारत व अन्य देशों में हुए तमाम शोधों में ये प्रमाणित हुआ है कि प्रदूषित क्षेत्रों में पलने-बढ़नेवाले बच्चों में ऊपरी और निचली श्वास संबंधी संक्रमण का खतरा ज्यादा होता है। उन्हें एलर्जी व दमा होने की ज्यादा संभावना रहती है। दमा के पूर्ववर्ती कमजोरियों के कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने की जरूरत भी पड़ सकती है। सच तो ये है कि वायु प्रदूषण का नकारात्मक असर जन्म से पहले ही दिखने लगता है।

हाल के वर्षों में ये सामने आया है कि जो गर्भवती महिलाएं प्रदूषित हवा के अधिक संपर्क में रहती हैं, उनमें गर्भपात, समय से पहले बच्चे का जन्म, नवजात के वजन में कमी व नवजात का मृतजन्म आदि का खतरा बना रहता है। अधिक प्रदूषित क्षेत्रों में बढ़ रहे बच्चों के फेफड़ों का स्वास्थ्य खराब होता है और इसकी वजह से अधिक स्वास्थ्य सेवाएं लेनी पड़ती है। यह आर्थिक बोझ बढ़ाता है और इससे शैक्षणिक प्रदर्शन भी प्रभावित होता है। दिल्ली में हमने बच्चों के फेफड़ों के विकास पर एक शोध किया। नवजात बच्चों के फेफड़े जन्म के बाद आठ वर्ष तक बढ़ते रहते हैं। तब तक फेफड़ों में वायु के आदान-प्रदान की सभी इकाइयां विकसित नहीं हो पातीं। जब बच्चों की लम्बाई बढ़ती है, तो फेफड़े भी बढ़ते हैं।

हमारे शोध के परिणामों से पता चला कि आठ वर्ष की उम्र तक श्वेत नस्ल के बच्चों और भारतीय बच्चों का विकास कमोबेश एक-सा होता है, जिसका मतलब है कि दोनों के फेफड़ों का विकास भी एक समान होता है। हालांकि, इसके बाद भारतीय बच्चों में फेफड़ों की वृद्धि दर बेहद धीमी होती है और 18 वर्ष की उम्र तक फेफड़ों का आकार 15 से 20 फीसदी छोटा ही रह जाता है। इस फर्क के पीछे आनुवंशिक, पौष्टिक आहार और वायु प्रदूषण समेत अन्य पर्यावरणीय कारण हो सकते हैं। अमेरिका में हुए एक शोध ने भी हमारे शोध परिणामों पर मुहर लगाई है। जिन बच्चों का पालन-पोषण ज्यादा प्रदूषित इलाकों में होता है, उन बच्चों में फेफड़ों के विकास की रफ्तार धीमी होने का खतरा होता है।

एक अन्य शोध में पता चला है कि जो अस्थमा से पीड़ित लड़कियां व लड़के ओजोन के उच्च-स्तर वाले क्षेत्रों में ज्यादा वक्त बिताते हैं, उनके फेफड़े कम काम करते हैं। फेफड़ों का छोटा आकार शारीरिक क्रिया-कलापों को भी प्रभावित करता है जिससे बच्चे खेलकूद के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाते हैं क्योंकि खेलकूद के लिए मजबूती और धैर्य की जरूरत पड़ती है। इसके साथ ही छोटे फेफड़ों के साथ वयस्क होने के नुकसान भी हैं। इससे फेफड़े के कुछ रोगों जैसे फेफड़ों में हवा की आवाजाही में रुकावट के खतरे बढ़ जाते हैं। वायु प्रदूषण से बच्चों की कोशिकाओं में कैंसर होने की आशंका रहती है, जिससे कैंसर रोगों का खतरा बढ़ जाता है।

ये सबूत भी है कि वायु प्रदूषण कम करने से बच्चों के स्वास्थ्य की सुरक्षा करने में मदद मिल सकती है। ये भी दिखा है कि प्रदूषण नियंत्रण उपायों के बाद बच्चों का पालन-पोषण अगर साफ आबोहवा में किया जाए, तो उनके फेफड़े बेहतर ढंग से काम करते हैं। शोध में पता चला है कि वायु की गुणवत्ता में सुधार होने से बच्चों में दमा के लक्षण कम दिखे, चाहे उन्हें दमा हो या न हो। जिन समुदायों में वायु की गुणवत्ता में सबसे ज्यादा सुधार आया, उन समुदायों के बच्चों में न्यनतम लक्षण मिले। अन्य शोधों में पता चला है कि जिन वर्षों में प्रदूषण कम हुए उन वर्षों में बच्चों में दीर्घकालिक कफ, कंठ में सूजन, जुकाम और नेत्र शोथ के लक्षण कम दिखे। अतः वायु प्रदूषण को नियंत्रित करना बाल स्वास्थ्य के संदर्भ में समाज और राष्ट्र के लिए वास्तविक लाभ का वादा करता है।