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वायु प्रदूषण ने 2019 में 17 लाख भारतीयों को उतारा मौत के घाट

बीते दो दशकों में बाहरी वातावरण के वायु प्रदूषण के कारण मृत्यु दर में 115 फीसदी तक बढ़ोत्तरी हुई है। 

By Vivek Mishra

On: Tuesday 22 December 2020
 
Air pollution and smog is showing new pattern

एक तरफ सरकारें लगातार वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों को नकार रही हैं तो दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संबंधी रिपोर्ट में वायु प्रदूषण को मृत्यु का एक बड़ा कारक बताया जा रहा है। 

लैंसेट प्लेटनरी हेल्थ रिपोर्ट ने दावा किया है कि वर्ष 2019 में वायु प्रदूषण के कारण 17 लाख लोगों की मृत्यु हुई है। "द इंडिया स्टेट लेवल डिजीज बर्डन इनिशिएटिव" नाम की ताजी लैंसेट रिपोर्ट में भीतरी (इनडोर) और बाहरी (आउटडोर) स्रोतों से होने वाले वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य और आर्थिक प्रभावों का आकलन किया गया है।   

21 दिसंबर, 2020 को जारी नवीनतम रिपोर्ट में कहा गया है, "वर्ष 2019 में भारत में 17 लाख मौतें वायु प्रदूषण के कारण हुईं, जो देश में होने वाली कुल मौतों का 18 फीसदी थी।"

इस रिपोर्ट में भारत के लिए अच्छी और बुरी दोनों खबरें हैं। अच्छी खबर यह है कि घर से होने वाला या भीतरी वायु प्रदूषण कम लोगों को मार रहा है। यदि पिछले दो दशकों (1990-2019) की रिपोर्ट से मिलान करें तो घरों में वायु प्रदूषण के कारण मृत्यु दर में 64 प्रतिशत की कमी आई है।

बुरी खबर यह है कि बाहरी वायु प्रदूषण या परिवेशीय वायु प्रदूषण न केवल बढ़ रहा है, बल्कि अधिक भारतीयों को भी मार रहा है। अध्ययन के अनुसार, "बाहरी परिवेश में वायु प्रदूषण से मृत्यु दर इस अवधि में 115 फीसदी बढ़ गई है।"

वाशिंगटन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ मेडिसिन में स्वास्थ्य मेट्रिक्स और मूल्यांकन संस्थान के निदेशक और रिपोर्ट के सह-लेखक क्रिस्टोफर मरे ने कहा, "यह आवश्यक है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए नीति निर्माता स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर इस गंभीर खतरे को दूर करने के लिए निर्णायक कदम उठाएं।"

वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों और रुग्णता के कारण भारत ने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 1.4 प्रतिशत खो दिया है। यह रुपये के बराबर है। मौद्रिक अवधि में 260,000 करोड़, या 2020-21 के लिए केंद्रीय बजट में स्वास्थ्य सेवा के लिए आवंटन का चार गुना से अधिक। वायु प्रदूषण के कारण होने वाली फेफड़ों की बीमारियों में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी - 36.6 फीसदी - कुल आर्थिक नुकसान में हुई।

मौद्रिक रूप में यह 260,000 करोड़ रुपए के बराबर है या यूं कहें कि 2020-21 के लिए केंद्रीय बजट में स्वास्थ्य सेवा के लिए आवंटन के चार गुना से अधिक है।

कुल आर्थिक नुकसान में वायु प्रदूषण के कारण होने वाली फेफड़ों की बीमारियों में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी 36.6 फीसदी रही।

अध्ययन के मुताबिक, "वायु प्रदूषण के कारण उत्तरी और मध्य भारत के राज्यों में सर्वाधिक आर्थिक नुकसान हुआ। यदि जीडीपी के फीसदी के रूप में देखें तो इनमें उत्तर प्रदेश में उच्चतम (जीडीपी का 2.2%) और बिहार (जीडीपी का 2%) आर्थिक नुकसान रहा।" 

अध्ययन में कहा गया है, "वायु प्रदूषण के कारण प्रति व्यक्ति आर्थिक नुकसान के आधार पर 2019 में दिल्ली में सर्वाधिक प्रति व्यक्ति आर्थिक नुकसान हुआ है।"

परिवेशी पार्टिकुलेट मैटर प्रदूषण के कारण होने वाली रुग्णता और समय पूर्व होने वाली मौतों के कारण आउटपुट की क्षति से आर्थिक नुकसान की रेंज जहां सबसे छोटा राज्य पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश (9.5 मिलियन डॉलर आर्थिक क्षति) है वहीं उत्तरभारत में सर्वाधिक उत्तर प्रदेश (3188.4 डॉलर) है।  

इनडोर वायु प्रदूषण के कारण होने वाले आर्थिक नुकसान की अवधि में, गोवा में 7 · 6 मिलियन डॉलर का कम से कम नुकसान हुआ था। उत्तर प्रदेश में 1829 · 6 मिलियन डॉलर का नुकसान हुआ, जो देश में सबसे अधिक है।

अध्ययन में कहा गया है, "ओजोन प्रदूषण के कारण समय से पहले होने वाली मौतों के कारण वजह से जो आर्थिक नुकसान हुआ है उसकी रेंज उत्तर-पूर्व के छोटे से पूर्वोत्तर राज्य नागालैंड में  4 मिलियन से डॉलर लेकर सर्वाधिक 286·2 मिलियन डॉलर तक है।"

भारत सरकार के सचिव, स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) के महानिदेशक बलराम भार्गव कहते हैं, “विभिन्न सरकारी योजनाएँ जैसे प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना और उन्नत चूल्हा अभियान ने भारत में घरेलू वायु प्रदूषण को कम करने में सहायता की है, जिसके लाभ इस मृत्यु दर को कम करने का सुझाव में है जैसा कि इस पत्र में है। ”