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तीन मिनट, एक मौत: जहरीली हवा से नौनिहालों का सांस लेना हुआ मुश्किल 

जयपुर का तीन साल का अनस लगभग हर माह फेफड़ों के संक्रमण के कारण अस्पताल भर्ती होता है, उसके चिकित्सक मानते हैं कि उसकी बीमारी का एक वजह जहरीली हवा भी है 

By Anil Ashwani Sharma, Vivek Mishra

On: Saturday 30 November 2019
जयपुर के जेके लोन अस्पताल में भर्ती तीन साल का मोहम्मद अनस। फोटो: विवेक मिश्रा

जितनी देर में आप एक बार सांस लेते हैं, उतने समय में बच्चे कई बार सांस लेते हैं, इसका मतलब है कि प्रदूषित हवा बच्चों में कई गुणा अधिक प्रवेश करती है और वे जल्द बीमार पड़ जाते हैं। आंकड़े बताते हैं कि वायु प्रदूषण से होने वाली प्रमुख 10 बीमारियों में से एक की वजह से भारत में हर तीन मिनट में एक बच्चे की मौत हो रही है। ये बेहद चिंताजनक स्थिति है। डाउन टू अर्थ ने इसकी व्यापक पड़ताल की है। जिसे एक श्रृंखला के रूप प्रकाशित किया जा रहा है। पढ़ें, इस श्रृंखला की पहली कड़ी- 

अगर आप सांस नहीं ले सकते तो फिर आपके लिए कोई भी चीज मायने नहीं रखती। यह बात फेफड़ों के संक्रमण की मार झेल रहे मासूम मोहम्मद अनस पर पूरी तरह लागू होती है। मोहम्मद अनस महज तीन वर्ष का है। या यूं कहें कि उसने अपनी जिंदगी के अभी तक 1,095 दिन इस पृथ्वी पर गुजारे हैं। उसकी दुनिया बहुत ही छोटी है लेकिन उसे यह लगता है कि किसी भी तरह की परेशानी का सामना करने के लिए उसके माता-पिता ही एकमात्र सहारा हैं। अपनी बहुत सी छोटी सी उम्र में ही उसे हर हफ्ते अस्पताल जाना पड़ा है। इंसान के जीवन का पहला संकेत उसकी चलती हुई सांसे ही हैं। अनस को इन्हीं सांसों के प्रवाह में दिक्कत है, इसकी वजह से अक्सर उसे अस्पताल पहुंचना पड़ता है। संभव है कि वह इस बात से अचरज में हो कि इस परेशानी में उसके माता-पिता भी उसके लिए किसी तरह उपयोगी साबित नहीं हो सकते हैं। 

मोहम्मद अनस का परिवार राजस्थान में जयपुर स्थित शास्त्री नगर में मदीना मस्जिद के पास एक मंजिला मकान में रहता है। सांस की तकलीफ बढ़ जाने के बाद 12  अक्तूबर को जयपुर में ही देश के सबसे बड़े बच्चों के सरकारी जेके लोन अस्पताल  में भर्ती कराया गया। इस बार पर्चे में अनस के लक्षणों की पड़ताल कर उसे ब्रोंकाइटिस न्यूमोनिया यानी निचले फेफड़ों में संक्रमण और वायु मार्ग में परेशानी की बात बताई गई है। करीब एक हफ्ते के बाद अनस को अस्पताल से दवा और नसीहत के बाद छुट्टी दे दी गई है। 

बच्चे की बीमारी के बारे में ज्यादा पूछताछ पर अनस के पिता मोहम्मद उस्मान सहम  जाते हैं। वह बताते हैं कि अनस की पैदाइश जयपुर में ही झालना स्थित एक सरकारी जनाना अस्पताल में हुई थी और जन्म के 10 दिन बाद ही उसे सांस की परेशानी शुरु हो गई थी। डॉक्टर ने कहा था कि बच्चे को एलर्जी है और पांच साल की उम्र तक उसका विशेष ख्याल रखना पड़ेगा। श्वसन संबंधी एलर्जी का मतलब ऊपरी श्वसन तंत्र में परेशानी है। नाक और गले के हिस्से तक तकलीफ बनी रहती है। अनस को जन्म के समय ऊपरी श्वसन तंत्र में परेशानी की पहचान हुई थी, हालांकि अब वह बार बार होने वाले निचले फेफड़े के संक्रमण से जूझ रहा है। राजधानी में ही घर और अस्पताल होने का यह फायदा मासूम अनस को मिलता है कि जब सांस की तकलीफ बढ़ती है उसे कुछ किलोमीटर के दायरे में ही जल्दी चिकित्सा मिल जाती है। 

मोहम्मद अनस फेफड़ों की समस्या से क्यों ग्रसित हुआ? क्या अनस की जिदंगी खराब करने में वायु प्रदूषण कारक है? इस सवाल के जवाब में अनस की देख-रेख करने वाले जेके लोन के चिकित्सक तेजपाल ने डाउन टू अर्थ को बताया कि इसे खारिज नहीं किया जा सकता है कि अनस की बीमारी को बढ़ाने में वायु प्रदूषण एक प्रमुख कारक है।

मोहम्मद अनस का एक्सरे। फोटो: विवेक मिश्रा

जेके लोन के चिकित्सक बताते हैं कि अनस बार-बार होने वाले निचले फेफड़ों की तकलीफ और श्वसन परेशानी ब्रोकांइटिस न्यूमोनिया का शिकार है। चिकित्सक अनस का एक्सरे दिखाते हैं। इस एक्सरे में दायीं ओर अनस के निचले फेफड़ों में वायु मार्ग (ब्रोंकी) के पास कुछ धुंधला सा जमा है। एक्सरे में सफेद धब्बे जैसा दिखने वाला यह क्या चीज है? यह दायीं तरफ इस तरह से कुछ सफेद दागनुमा दिखाई देना या जमा होना यह बताता है कि श्वसन नली में रुकावट है। लक्षणों और एक्सरे की तफ्तीश के बाद चिकित्सक ने पता लगा लिया है कि यह ब्रोंकाइटिस न्यूमोनिया की स्पष्ट पहचान है।

हालांकि, चिकित्सक कहते हैं कि यह बैक्टरीया से जनित है या फिर वायरल संक्रमण से ग्रसित इसे स्पष्ट तौर पर और दावे से प्राथमिक तौर पर कहना मुश्किल हो सकता है। यह बैक्टीरिया और वायरस के अलावा कोई और एजेंट भी हो सकता है। क्या यह एजेंट वायु प्रदूषण के वो खतरनाक महीन कण हैं जो निचले फेफड़े और उससे भी नीचे रक्त तक पहुंच जाते हैं और इलाज न मिलने पर कमजोर व पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु का कारण बन जाते हैं। चिकित्सक इस बात को खारिज नहीं करते हैं।

आगे पढ़ें -  तीन मिनट, एक मौत: वायु प्रदूषण से राजस्थान में हो रही हैं सबसे ज्यादा बच्चों की मौत