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क्या वायु प्रदूषण की वजह से मनोभ्रंश अथवा डिमेंशिया हो सकता है

शोधकर्ताओं ने फाइन पार्टिकुलेट मैटर पीएम 2.5, 2.5 माइक्रोमीटर से कम या उसके बराबर व्यास वाले पार्टिकुलेट और मनोभ्रंश या डिमेंशिया के बीच संबंध का पता लगाया है।

By Dayanidhi

On: Tuesday 08 June 2021
 
क्या वायु प्रदूषण की वजह से मनोभ्रंश अथवा डिमेंशिया हो सकता है
Photo : Wikimedia Commons Photo : Wikimedia Commons

परिवेशी पीएम 2.5 प्रदूषण के संपर्क में आने से स्वास्थ्य पर कई तरह के हानिकारक प्रभाव पड़ते हैं। इस शोध में अतिरिक्त प्रभावों की पहचान की गई है और इन रोगों में मनोभ्रंश या विक्षिप्तता (डिमेंशिया) की संभावित भूमिका को समझने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।

शोधकर्ताओं ने कहा कि मनोभ्रंश (डिमेंशिया) के खतरे के रूप में पीएम 2.5 की अहम भूमिका है, परिवेशी वायु प्रदूषण, घरेलू वायु प्रदूषण, सक्रिय धूम्रपान से होने वाले खतरे के संबंध में महामारी विज्ञान की व्यवस्थित रूप से समीक्षा करके इसकी जांच की गई है।

दुनिया भर में पहले की तुलना में अधिक लोग बीमार पड़ रहे हैं और मनोभ्रंश या विक्षिप्तता (डिमेंशिया) होने के कारण मर रहे हैं। 2000 और 2019 के बीच, विक्षिप्तता होने की दर में 86 फीसदी की वृद्धि हुई, जबकि इस विकार से होने वाली मौतें दोगुनी से अधिक हो गई हैं। सबूत बताते हैं कि जीवनशैली और पर्यावरणीय भूमिका इसमें महत्वपूर्ण हैं जैसे वायु प्रदूषण, अत्यधिक शराब का सेवन और मस्तिष्क की चोट आदि इसमें शामिल हैं।

क्या होता है मनोभ्रंश या विक्षिप्तता (डिमेंशिया)

मनोभ्रंश या विक्षिप्तता (डिमेंशिया) से ग्रस्त व्यक्ति की याददाशत भी कमज़ोर हो जाती है। वे अपने रोजमर्रा के कार्य ठीक से नहीं कर पाते हैं। कभी-कभी वे यह भी भूल जाते हैं कि वे किस शहर में हैं, या कौनसा साल या महीना चल रहा है। बोलते हुए उन्हें सही शब्द नहीं सूझता। उनका व्यवहार बदला-बदला सा लगता है और व्यक्तित्व में भी फ़र्क आ सकता है।

इस नए शोध में, शोधकर्ताओं ने मनोभ्रंश या विक्षिप्तता (डिमेंशिया) के बढ़ते मामलों में वायु प्रदूषण की भूमिका का पता लगाया है। उन्होंने फाइन पार्टिकुलेट मैटर 2.5 (पीएम2.5) - 2.5 माइक्रोमीटर से कम या उसके बराबर व्यास वाले पार्टिकुलेट और डिमेंशिया के बीच संबंध खोजने के लिए मौजूदा साहित्य का अध्ययन किया।

पीएम 2.5 मानवजनित और प्राकृतिक दोनों स्रोतों से उत्पन्न होता है, जैसे वाहनों से निकलने वाले धूएं और जंगल की आग आदि से। इसके अलावा, सिगरेट जलने पर निकलने वाले सूक्ष्म कण, जो धूम्रपान करने वाले और अन्य तरह के धुएं के माध्यम में सांस लेते हैं। जब ये प्रदूषक शरीर में प्रवेश करते हैं, तो वे केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं और संज्ञानात्मक विकारों को जन्म दे सकते हैं।

अध्ययन के निष्कर्षों से पता चलता है कि 2015 में, वायु प्रदूषण ने दुनिया भर में विक्षिप्तता (डिमेंशिया) लगभग 20 लाख घटनाओं और लगभग 6 लाख मौतों का कारण बना। इससे सबसे अधिक प्रभावित देश चीन, जापान, भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका थे। इसके अलावा, एशिया, मध्य पूर्व और अफ्रीका में जीवन स्तर और प्रदूषण बढ़ने के कारण बीमारी से बढ़ते बोझ का सामना करना पड़ता है।

विश्लेषण का निष्कर्ष है कि वायु प्रदूषण लगभग 15 फीसदी समय से पहले होने वाली मौतों और 7 फीसदी विकलांगता-समायोजित जीवन वर्षों (जो मृत्यु दर और रुग्णता के लिए जिम्मेदार है) का कारण विक्षिप्तता (डिमेंशिया) से जुड़ा है, जिसकी अनुमानित आर्थिक लागत लगभग 26 बिलियन डॉलर है। यह शोध जीओहेल्थ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

अध्ययन विक्षिप्तता (डिमेंशिया) वायु प्रदूषण के चलते हो सकती है, इसमें इसकी अहम भूमिका है। इससे पता चलता है कि वायु प्रदूषण को कम करने से वृद्ध आबादी में मनोभ्रंश या विक्षिप्तताता (डिमेंशिया) को रोकने में मदद मिल सकती है। हालांकि, शोधकर्ताओं विक्षिप्तताता (डिमेंशिया) और वायु प्रदूषण के बीच संबंध में और अधिक शोध की आवश्यकता पर जोर दिया।