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क्या वायु गुणवत्ता का पूर्वानुमान लगाने में मदद कर सकती है डीप लर्निंग

वैज्ञानिकों की मानें तो डीप लर्निंग तकनीक की मदद से वायु गुणवत्ता सम्बन्धी पूर्वानुमान को अधिक सटीक और बेहतर बनाया जा सकता है

By Lalit Maurya

On: Wednesday 07 April 2021
 

वैज्ञानिकों की मानें तो डीप लर्निंग तकनीक की मदद से वायु गुणवत्ता सम्बन्धी पूर्वानुमान को अधिक सटीक और बेहतर बनाया जा सकता है। यह जानकारी जर्नल साइंस ऑफ द टोटल एनवायरनमेंट में छपे एक शोध में सामने आई है। जीवाश्म ईंधन का उपयोग न केवल पर्यावरण बल्कि हमारे स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक होता है।

इसके बावजूद आज भी सही समय और स्थान पर इसका पूर्वानुमान एक कठिन काम है। लेकिन इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों का मत है कि डीप लर्निंग इस काम में हमारी मदद कर सकती है। उनके अनुसार इस शोध से प्राप्त निष्कर्ष यह जांचने में मददगार हो सकते हैं कि प्रदूषण बढ़ने के साथ ही आर्थिक कारकों जैसे औद्योगिक उत्पादकता और स्वास्थ्य जैसे मरीजों का अस्पताल में भर्ती होना किस तरह से प्रभावित होते हैं।

इस शोध से जुड़े शोधकर्ता मन्जु यू ने बताया कि शहरी क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता के प्रमुख मुद्दा है, जो लोगों के जीवन को प्रभावित करता है। इसके बावजूद मौजूदा अवलोकन व्यापक जानकारी देने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इनसे लोगों को उतनी जानकारी नहीं मिल पाती जिससे वो आगे की योजना बना सकें।

उनके अनुसार उपग्रह और जमीन आधारित अवलोकन वायु प्रदूषण को मापते तो जरूर हैं, लेकिन वो सीमित होते हैं। मिसाल के तौर पर उपग्रह हर दिन एक ही समय पर दिए गए स्थान को पार कर सकते हैं। लेकिन वो हर घंटे प्रदूषण के स्तर में आने वाले उतर-चढाव को नहीं माप सकते। इसी तरह जमीन पर मौजूद मौसम स्टेशन केवल सीमित स्थानों पर ही लगातार डेटा एकत्र करते हैं।

ऐसे में इस समस्या के समाधान के लिए वैज्ञानिकों ने डीप लर्निंग तकनीक की मदद ली है। उन्होंने इसकी मदद से अमेरिका के लॉस एंजेलेस शहर में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का जमीनी और उपग्रह से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर विश्लेषण किया है। यह गैस मूलतः वाहनों और बिजली संयंत्रों से निकलती है। 

क्या होती है डीप लर्निंग

डीप लर्निंग, आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) और मशीन लर्निंग (एमएल) तकनीक की ही एक उपशाखा है जो इंसानी दिमाग का अनुसरण करते हुए या यह कहें की उसी तरह काम करते हुए डेटासेट को स्वरुप देने का काम करती है। जिसकी मदद से बेहतर और कुशल निर्णय लिए जा सकें। यह तकनीक आज कई जगह इस्तेमाल भी हो रही है जैसे वर्चुअल असिस्टेंट, बिना ड्राइवर वाली कारें और आपके मोबाइल द्वारा चेहरे को पहचाना, यह सभी इसके उदाहरण हैं।

यह तकनीक बहुत हद तक इंसानी दिमाग की तरह ही काम करती है। और कृत्रिम न्यूरॉन्स की कई परतों की मदद से आंकड़ों को प्रोसेस करती है और उससे एक पैटर्न बनाती है। यह बहुत बड़े डेटासेटस में मौजूद कनेक्शनों के आधार पर खुद सीखती है और अपने आप को तैयार करती है।

वैज्ञानिकों ने इस शोध में दो डीप लर्निंग एल्गोरिथम्स का परिक्षण किया है। जिसमें पहली एल्गोरिथम की मदद से जमीन और उपग्रहों से प्राप्त नाइट्रोजन डाइऑक्साइड की सूचना का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है जिसने सटीकता के साथ उसके स्तर का पता लगाने में मदद की है। जबकि दूसरी एल्गोरिथम की मदद से मौसम संबंधी आंकड़ों, ऊंचाई और जमीन आधारित स्टेशनों और प्रमुख सड़कों और बिजली संयंत्रों के स्थानों सम्बन्धी जानकारी को जोड़ने में मदद ली गई है जिससे पूर्वानुमान और अधिक सटीक हों। 

हर साल 90 लाख जिंदगियां लील जाता है वायु प्रदूषण

दुनिया भर में हर साल तकरीबन 90 लाख लोग वायु प्रदूषण के चलते असमय मारे जाते हैं। भारत में वायु प्रदूषण की जो स्थिति है वो किसी से छुपी नहीं है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट व डाउन टू अर्थ की ओर से जारी रिपोर्ट स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट – 2021 के अनुसार 2019 में वायु प्रदूषण करीब 16.7 लाख मौतों के लिए जिम्मेवार था, जिनमें से 50 फीसदी (851,698) मौतें महज पांच राज्यों  उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और राजस्थान में हुई थी।

 यू के अनुसार इस शोध को अन्य ग्रीनहाउस गैसों और शहरों में भी दोहराया जा सकता है। जिससे वहां उनका सटीकता से पता लगाया जा सके। साथ ही इसे छोटे या बड़े दोनों पैमाने पर इस्तेमाल किया जा सकता है। यही नहीं जब नये उपग्रह लांच किए जाते हैं तब इस मॉडल को उनके अनुसार अपडेट भी किया जा सकता है। उनके अनुसार इस तकनीक की मदद से वायु गुणवत्ता और स्वास्थ्य पर पड़ रहे प्रभावों को ज्यादा बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।