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पर्यावरण मुकदमों की डायरी: 793 स्थानों पर हो रही है वायु गुणवत्ता की निगरानी

पर्यावरण संबंधी मुकदमों की सुनवाई के दौरान आज क्या हुआ

By Susan Chacko, Dayanidhi

On: Wednesday 10 June 2020
 

8 अक्टूबर, 2018 के नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के आदेश का पालन करते हुए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा रिपोर्ट प्रस्तुत की गई, जिसमें निर्धारित मानदंडों के अंतर्गत वायु गुणवत्ता के मानको को पूरा करने वाले शहरों के साथ-साथ सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को, उचित कार्रवाई करने के लिए एक्शन प्लान तैयार करने को कहा गया था।

राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों (एसपीसीबी) और प्रदूषण नियंत्रण समितियों (पीसीसी) के साथ सीपीसीबी राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम के तहत देशभर में काम कर रहा है। इसके अंतर्गत 28 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों में 344 शहरों और कस्बों को कवर करते हुए 793 स्थानों पर मैन्युअल रूप से राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम (एनएएमपी) कर रहा है। 219 स्टेशनों में रियल टाइम स्टेशनों के माध्यम से 18 राज्यों में 123 शहरों में लगातार वायु गुणवत्ता की निगरानी की जा रही है। इसमें  2 केंद्र शासित प्रदेश भी शामिल हैं।

इसके अलावा, एसपीसीबी / पीसीसी, राज्य वायु गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम (एसएएमपी) के तहत 13 राज्यों में 86 शहरों और कस्बों को कवर करते हुए 126 स्थानों पर मैन्युअल रूप से वायु गुणवत्ता की निगरानी कर रहे हैं। बारह वायु प्रदूषकों जैसे सल्फर डाइऑक्साइड (एसओ2), नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (एनओ2), पार्टिकुलेट मैटर (पीएम10), पीएम2.5 और आठ वायु गुणवत्ता मापदंडों की निगरानी वास्तविक समय के आधार पर वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशनों (सीएक्यूक्यूएमएस) में की जा रही है। 

सोर्स अपॉइंटमेंट (एसए) के लिए ड्राफ्ट फ्रेमवर्क को वायु विशेषज्ञों के साथ साझा किया गया और विशेषज्ञों से प्राप्त सुझाव के आधार पर, सोर्स अपॉइंटमेंट अध्ययन के लिए फ्रेमवर्क को अंतिम रूप दिया गया। इसे 10 अक्टूबर, 2019 को -समिक्षा के माध्यम से सभी एसपीसीबी / पीसीसी के साथ साझा किया गया।

राज्यों द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, सोर्स अपॉइंटमेंट अध्ययन को 45 शहरों में लागू कर पूरा किया गया। 35 शहरों में यह अध्ययन एमओयू / प्रस्ताव चरण पर है। पर्यावरण देखभाल क्षमता (सीसी) के आकलन के लिए कार्यप्रणाली को संबंधित एसपीसीबी / पीसीसी के साथ 16 दिसंबर, 2019 को साझा किया गया था।

2- मिजोरम में सप्ताह में एक बार नियमित रूप से की जा रही है ध्वनि प्रदूषण की निगरानी

मिजोरम की राजधानी, आइजोल शहर में चार मैनुअल एयर मॉनिटरिंग स्टेशन हैं जो 2005 से आज तक चल रहे हैं और सिकुलपाइकॉन में एक लगातार वायु गुणवत्ता की निगरानी करने वाला सेंसर (कंटीन्यूअस एम्बिएंट एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग सेंसर (सीएक्यूक्यूएमएस)) भी लगा है।

आइजोल में फरवरी 2020 से एलईडी डिस्प्ले बोर्ड का उपयोग करते हुए, वायु प्रदूषण के आंकड़ों को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया गया। मिजोरम प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा दायर रिपोर्ट में इसका उल्लेख भी किया गया है।

एसपीसीबी की रिपोर्ट में कहा गया है कि आइजोल शहर में 4 स्थानों पर व्यापक वायु निगरानी उपकरण लगाए गए हैं और जुलाई, 2019 से सप्ताह में एक बार ध्वनि की नियमित निगरानी की जा रही है सभी विक्रेताओं को निर्देशित किया गया है कि वे ध्वनि को सीमा के अंदर रखने वाले  तंत्र के बिना ऑडियो सिस्टम को बेचें।

रिपोर्ट के अनुसार, सहमति निधि (कंसेंट फण्ड) से उत्पन्न राजस्व काफी सीमित था, क्योंकि राज्य में कार्यरत अधिकांश उद्योग छोटे स्तर के हैं।

इसके अलावा, प्राप्त धनराशि का उपयोग उद्योगों के निरीक्षण, औद्योगिक कचरे के विश्लेषण, उद्योगों से संबंधित निगरानी और निगरानी गतिविधियों के खर्चों को पूरा करने के लिए किया जा रहा है। एसपीसीबी ने यह भी बताया कि मिजोरम में कोई पुरानी अपशिष्ट डंप साइट नहीं है।

3- सुबरनरेखा नदी रेत खनन में उड़ रहीं हैं नियमों की धज्जियां

एनजीटी ने 9 जून, 2020 को सुबरनरेखा नदी, तहसील जलेश्वर, जिला बालासोर, ओडिशा में अवैध रेत खनन के मामले की जांच के लिए एक संयुक्त समिति गठित करने का निर्देश दिया।

रेत खनन के प्रभाव से पंचुघंटा के ग्रामीण प्रभावित हो रहे हैं - क्योंकि वहां वायु प्रदूषण, जल स्तर में कमी, नदी के प्रवाह में परिवर्तन से लकड़ी के पुल और नदी को पार करने वाले मार्ग पर रुकावट रही है। 

इसके अलावा, अंधाधुंध रेत खनन से पर्यावरण को गंभीर खतरा पैदा हो रहा है और पर्यावरणीय क्षरण और पर्यावरणीय प्रभाव पड़ रहा है। क्योंकि रेत खनन से पहले इसका पर्यावरणीय प्रभाव का कोई आकलन नहीं किया गया था। इसके अलावा, रेत खनन में लगे ट्रकों और ट्रैक्टरों की भारी आवाजाही देखी जा रही है। खदान के लिए रोड के साथ कोई ग्रीन बेल्ट विकसित नहीं किया गया। शोर और धूल को रोकने के लिए भी कोई अवरोधक नहीं बनाया गया है।

कृत्रिम रेत तट बनाए गए, जिससे नदी का जल बहाव रुक गया है। वाहनों के लिए नदी पार करने के लिए लकड़ी के पुलों का निर्माण किया गया है। मशीनों के द्वारा खनन का भी सहारा लिया जा रहा है जबकि यहां केवल मैनुअल खनन की अनुमति है। अनुमति से अधिक मात्रा में खनन भी किया जा रहा है। 

इस प्रकार जो खनन गतिविधि की जा रही है, वह केवल अवैज्ञानिक है, बल्कि शिकायतकर्ता के अनुसार, एहतियाती नियमों और ईआईए अधिसूचना, 2006 के खिलाफ भी है।