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देश में जरुरी है बढ़ते प्रदूषण को रोकना, साफ ईंधन पर देना होगा ध्यान: एनजीटी

यहां पढ़िए पर्यावरण सम्बन्धी मामलों के विषय में अदालती आदेशों का सार

By Susan Chacko, Lalit Maurya

On: Friday 17 July 2020
 

एनजीटी ने 16 जुलाई, 2020 को भारत में पेटकोक और फर्नेस ऑयल के उपयोग और उसके नियमन एवं नियंत्रण का मामला उठाया है। अपने पिछले आदेश में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कहा था कि उद्योगों द्वारा पेटकोक और फर्नेस ऑयल के उपयोग के कारण पर्यारवरण पर बुरा असर पड़ रहा है| ऐसे में इसके उपयोग पर रोक लगाने के लिए 'एहतियाती' सिद्धांत के साथ-साथ 'स्थायी विकास' के सिद्धांत पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। जिसके बारे में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एक्ट, 2010 में उल्लेख किया गया है|

एनजीटी ने जोर देकर कहा है कि उद्योगों को प्रदूषण फ़ैलाने वाले ईंधनों की जगह उसके विकल्पों और साफ-सुथरे ईंधन को अपनाना चाहिए। कोर्ट के अनुसार देश के कई स्थानों में वायु गुणवत्ता तय मानकों से कहीं ज्यादा दूषित हो चली है| देश के 102 से भी ज्यादा शहरों को नॉन अटेन्मेंट महानगरों की श्रेणी में रखा गया है| आसान शब्दों में, यह वो महानगर हैं जहां की हवा तय मानकों से ज्यादा दूषित हो चुकी है| ऐसे में जहां तक हो सके उन सभी उपायों को अपनाना चाहिए जिससे हवा की गुणवत्ता में सुधार लाया जा सके|    

गौरतलब है कि 14 जुलाई को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने एनजीटी में एक रिपोर्ट सबमिट की थी| इस रिपोर्ट में 27 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों  में की गई कार्रवाई का सारांश था। जिसके जवाब में ट्रिब्यूनल ने कहा है कि इस रिपोर्ट में जो जानकारी दी गई है उसमें कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में की गई कार्रवाई एनजीटी और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के विपरीत हैं| ऐसे में एनजीटी ने कहा है कि जो रिपोर्ट ठीक नहीं हैं उन्हें अस्वीकार कर दिया जाएगा। ऐसे में एनजीटी ने सीपीसीबी को चार महीने का वक्त दिया है| जिसके अंदर उसे कार्रवाई पर रिपोर्ट प्रस्तुत करनी है। 


सीपीसीबी ने उत्तराखंड के मैसर्स स्पेशलिटी इंडस्ट्रीज पॉलिमर एंड कोटिंग प्राइवेट लिमिटेड पर 19,90,000 रुपए के जुर्माने की सिफारिश

सीपीसीबी ने औद्योगिक प्रदूषण के मामले में उत्तराखंड के मैसर्स स्पेशलिटी इंडस्ट्रीज पॉलिमर एंड कोटिंग प्राइवेट लिमिटेड पर 19,90,000 रुपए के जुर्माने की सिफारिश की है| यह जुर्माना 18 मई, 2018 से 4 दिसंबर, 2018 के बीच औद्योगिक प्रदूषण के मामले में लगाया गया है| यह इंडस्ट्री उत्तराखंड में  उधमसिंह नगर के सितारगंज में स्थित है|

इसके अलावा, केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (सीजीडब्ल्यूए) से एनओसी के बिना भूजल निकालने पर 5,33,760 रुपए का जुर्माना लगाया गया है| गौरतलब है कि उद्योग ने इस अवधि में करीब 26,688 क्यूबिक मीटर पानी लिया है। इसके साथ ही यह भी कहा गया है कि जबतक एनओसी नहीं ली जाती तब तक 20 रुपए प्रति क्यूबिक मीटर की दर से पानी के लिए वसूले जाएंगे|

इसके साथ ही यूनिट को जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (जेडएलडी) स्थापित करने के लिए थर्ड पार्टी फिजिबिलिटी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए भी कहा गया है| यह रिपोर्ट सीपीसीबी के लखनऊ स्थित क्षेत्रीय निदेशालय द्वारा सबमिट की गई है| जिसे 16 जुलाई को एनजीटी की साइट पर अपलोड किया गया है।

गौरतलब है कि यह यूनिट पॉलीमर इमल्शन और पानी पर आधारित ऐक्रेलिक इमल्शन के उत्पादन में लगी हुई थी। जिसका 28 जनवरी को सीपीसीबी के लखनऊ स्थित क्षेत्रीय निदेशालय और उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों की एक संयुक्त टीम द्वारा दौरा किया गया था| जिसके लिए 3 दिसंबर, 2019 को एनजीटी ने आदेश दिया था|

रिपोर्ट से पता चला है कि इस यूनिट ने भूजल निकासी के लिए अब तक सीजीडब्ल्यूए से एनओसी नहीं ली है| हालांकि यूनिट ने पानी की खपत और अपशिष्ट जल की माप के लिए इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फ्लो मीटर लगाए हुए हैं| जिसका दैनिक आधार पर डेटा लिया जा रहा है|

लॉग बुक के अनुसार, 1 से 28 जनवरी 2020 के बीच 30.02 केएलडी पानी की खपत की गई थी। इसके साथ ही यूनिट कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट में किसी भी ट्रीटेड इफ्लुएंट को डिस्चार्ज नहीं कर रही थी| और उसने पीईटीपी आउटलेट से सीईटीपी कन्वेक्शन सिस्टम को जोड़ने वाली पाइप को हटा दिया था। साथ ही प्रक्रिया के दौरान और अन्य घरेलू अपशिष्ट उत्पन्न हो रहे है उसका पुनर्नवीनीकरण किया जा रहा है और उसे उपचार के बाद इस प्रक्रिया में पुन: उपयोग किया जा रहा है। 


बिना अनुमति के चल रही है फतेहाबाद में मेसर्स कैमी राइस मिल्स: एचएसपीसीबी

हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एचएसपीसीबी) ने एनजीटी के समक्ष अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी है| जिसमें उसने जानकारी दी है कि फतेहाबाद में मेसर्स कैमी राइस मिल्स बिना स्थापना और संचालन की अनुमति के चल रही है| उसने सञ्चालन के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से सहमति नहीं ली है| यह यूनिट कच्चे चावल के उत्पादन में लगी हुई है, जिसे ग्रीन श्रेणी में शामिल किया गया था।

एचएसपीसीबी ने जानकारी दी है कि 13 नवंबर, 2019 को इस यूनिट को वाटर एक्ट 1974 और एयर एक्ट 1981 के तहत कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया गया था| साथ ही बंद करने का आदेश दिया गया था| जब यूनिट का 8 मई, 2020 को निरीक्षण किया गया तो यह यूनिट बंद पाई गई थी|

चूंकि यह यूनिट बिना अनुमति के चल रही है इसलिए हरियाणा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के हिसार में स्थित क्षेत्रीय कार्यालय ने इस पर कार्यवाही करने की सिफारिश की है| इसके साथ ही रिपोर्ट में जानकारी दी गई है कि एचएसपीसीबी इसके संचालन पर कड़ी निगरानी रखेगा जिससे किसी भी तरह की गैरकानूनी गतिविधि न की जा सके|