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गर्भावस्था में वायु प्रदूषण का संपर्क डाल सकता है बच्चों की शिक्षा पर असर

जन्म से पूर्व वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने के कारण आगे चलकर बच्चों में बौद्धिक और तार्किक क्षमता का विकास पूरी तरह नहीं हो पाता, जिसका असर उनकी विषयों को समझने की क्षमता पर पड़ता है

By Lalit Maurya

On: Thursday 15 July 2021
 

यदि कोई बच्चा गर्भावस्था के दौरान वायु प्रदूषण के संपर्क में आता है, तो वो आगे चलकर उसकी शिक्षा पर असर डाल सकता है। आज जब माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य को लेकर इतना ज्यादा चिंतित रहते हैं, ऐसे में यह बात परेशान कर देने वाली जरूर है| हालांकि इसकी वैज्ञानिक तौर पर पुष्टि हो गई है, जिसकी जानकारी हाल ही में यूनिवर्सिटी ऑफ कोलंबिया के मेलमैन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ और इरविंग मेडिकल सेंटर द्वारा किए शोध में सामने आई है।

जर्नल एनवायर्नमेंटल रिसर्च में छपे इस शोध के मुताबिक जन्म से पूर्व उच्च वायु प्रदूषण के संपर्क में आने के कारण बच्चों के तार्किक और बौद्धिक विकास में बाधा आ सकती है, जो आगे चलकर किशोरावस्था की शुरुवात में उनके स्कूल के रिजल्ट पर असर डाल सकता है। इससे उन्हें पढ़ने, स्पेलिंग याद करने और गणित आदि विषयों को समझने में मुश्किल हो सकती है।

शोधकर्ताओं के अनुसार वायु प्रदूषण से बच्चे के इन्हिबिटरी कंट्रोल क्षमता पर असर पड़ सकता है, जो  बच्चों की सोचने समझने की क्षमता को प्रभावित करता है, जिसका असर उसके रिजल्ट पर भी पड़ता है।  इन्हिबिटरी कंट्रोल को हम इस तरह समझ सकते हैं, यह हमारे दिमाग की वो क्षमता होती है जो हमें जल्दबाजी में अपने आप किसी सवाल का जवाब देने की जगह ध्यान और तर्कों की मदद से उसका उत्तर देने में मदद करती है। जब बच्चे नई बातें (कांसेप्ट) सीखते हैं, तो उन्हें इसके लिए पीछे की आदतों को भूलने की जरुरत होती है। ऐसे में इसके लिए उन्हें अपनी बौद्धिक और तार्किक क्षमता में विकास करने की जरुरत होती है| 

बच्चों के भविष्य की नींव होते हैं जीवन के शुरुआती वर्ष 

कोलंबिया विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान की प्रोफेसर और इस शोध से जुड़ी प्रमुख शोधकर्ता एमी मार्गोलिस ने बताया कि जिन बच्चों में इन्हिबिटरी कंट्रोल क्षमता उतनी बेहतर नहीं थी, वो बच्चे सामान्य से प्रश्नो का उतर देने में अटक गए थे। उदाहरण के लिए जब उनसे ऊपर की ओर इशारा करने वाले तीर के बारे में पूछा जाए तो एक सामान्य बच्चा 'ऊपर' की ओर इशारा करता है। इसी तरह ग्रीन रंग के प्रति बच्चे की सामान्य प्रतिक्रिया यह होती है कि वो इसका मतलब 'जाने' के लिए लगाते हैं। वहीं जिन बच्चों में मानसिक विकास ठीक से नहीं हुआ था वो ऐसा कर पाने में सफल नहीं हुए थे। उनके अनुसार कोई बच्चा आगे चलकर पढाई-लिखाई में कैसा होगा, यह उसके बचपन पर निर्भर करता है, वो शुरुवाती वर्ष उसके भविष्य की नींव होते हैं। पर उस उम्र में गंभीर वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से वो बच्चों की बौद्धिक और तार्किक क्षमता पर असर डाल रहा है। 

ऐसे में छात्रों को सीखने में मुश्किल क्यों हो रही है, इसे समझने और उसके उपचार की योजना बनाते समय माता-पिता और शिक्षकों को पर्यावरणीय जोखिम से जुड़ी उन शैक्षणिक समस्याओं को भी ध्यान में रखना होगा। उन्हें समझना होगा कि यह कमी उनके विषय को समझने की कमी नहीं है, बल्कि यह कमी उनके अपने मन को काबू में न रख पाने की कमी से जुड़ी है। बच्चों का मन वैसे भी बहुत चंचल होता है ऐसे में उसे एकाग्र करना बहुत महत्वपूर्ण होता है।   

वायु प्रदूषण के इस असर को समझने के लिए शोधकर्ताओं ने गर्भावस्था के अंतिम तीन महीनों के दौरान बच्चे पर वायु प्रदूषण के पड़ने वाले असर का अध्ययन किया था| गौरतलब है कि इसी अवधि में भ्रूण पर्यावरण सम्बन्धी जोखिमों के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील होता है। वहीं 10 वर्ष की आयु में बच्चों के इन्हिबिटरी कंट्रोल क्षमता और 12 वर्ष की आयु में वो पढ़ने लिखने में कैसे हैं, इस बात की जानकारी ली गई थी। 

इस शोध से जुड़ी अन्य शोधकर्ता जूली हर्बस्टमैन के अनुसार यह शोध बच्चे के जन्म से पहले उसपर वायु प्रदूषण के पड़ने वाले हानिकारक प्रभावों को दर्शाता है, जो न केवल उनके स्वास्थ्य पर बल्कि साथ ही आगे चलकर उनके पढ़ने और सीखने की क्षमता पर भी असर डाल सकता है।  ऐसे में वायु प्रदूषण की रोकथाम से न केवल बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को रोका जा सकता है, साथ ही बच्चों की शैक्षणिक उपलब्धि में सुधार किया जा सकता है।