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वायु प्रदूषण के आंकड़ों को सार्वजनिक करने में पारदर्शिता नहीं दिखाता भारत: रिपोर्ट

भारत सहित कुल 30 देशों की सरकारें एयर क्वालिटी का रियल टाइम डाटा इकट्ठा करती हैं| लेकिन इसके बावजूद वो पूरी जानकारी पारदर्शिता के साथ उपलब्ध नहीं कराती हैं

By Lalit Maurya

On: Thursday 09 July 2020
 

अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ ओपन एक्यू द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार भारत उन देशों में से एक है जो अपने वायु प्रदूषण सम्बन्धी आंकड़ों को स्वतंत्र और पारदर्शी तरीके से साझा नहीं करता| जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार भारत के कई शहरों में हवा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो चुकी है| हालांकि रिपोर्ट के अनुसार भारत अपने वायु प्रदूषण सम्बन्धी आंकड़ों की रियल टाइम में मॉनिटरिंग करता रहा है, लेकिन दुनिया की करीब आधी आबादी अभी भी वायु प्रदूषण सम्बन्धी आंकड़ों से दूर है। उसे नहीं मालूम की उनके क्षेत्र में वायु की गुणवत्ता कैसी है।

वहीं आंकड़ों की उपलब्धता की असमानता विकसित और विकासशील देशों के बीच भी बरकरार है| जहां विकासशील देशों में रहने वाले लोग आज भी इन आंकड़ों से अनभिज्ञ हैं| जबकि उन्हीं देशों में वायु की गुणवत्ता सबसे ज्यादा ख़राब है| कई देशों में वायु प्रदूषण सम्बन्धी आंकड़ों को केवल इंसानों के पढ़ने लायक या फिर अस्थायी तरीके से साझा किया जाता है|

यहां तक कि जिन देशों में यह डाटा सबके लिए उपलब्ध है वहां इसके फॉर्मेट में इतनी विभिन्न्नता होती है, कि उसका ठीक से विश्लेषण नहीं किया जा सकता। यही वजह है कि इन देशों में डेटा होने के बावजूद भी उसका ठीक से उपयोग नहीं हो पता और वायु गुणवत्ता में सुधार के लिए किए जा रहे उपाय सफल नहीं होते। भारत भी उन्हीं देशों में से एक है।

इससे पहले सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर द्वारा जारी एक  रिपोर्ट के अनुसार वायु प्रदूषण के चलते हर साल भारतीय अर्थव्यवस्था को करीब 15,000 करोड़ डॉलर (1.05 लाख करोड़ रुपए) का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ रहा है। यदि सकल घरेलु उत्पाद के रूप में देखें तो यह नुकसान कुल जीडीपी के 5.4 फीसदी के बराबर है। दूसरी ओर हर साल इसके कारण देश में 9 लाख 80 हजार असमय मौतें हो जाती हैं। हर साल 350,000 बच्चे अस्थमा से ग्रस्त हो जाते हैं।  जबकि 24 लाख लोगों को हर साल इसके कारण होने वाली सांस की बीमारियों के चलते हॉस्पिटल जाना पड़ता है। साथ ही इसके कारण देश में हर साल 49 करोड़ काम के दिनों का नुकसान हो जाता है।

हर साल होने वाली 88 लाख मौतों के लिए जिम्मेवार है वायु प्रदूषण

गौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी वायु प्रदूषण को स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़े पर्यावरण सम्बन्धी खतरे के रूप में चिन्हित किया है| आलम यह है कि दुनिया की करीब 90 फीसदी आबादी दूषित हवा में सांस लेने को मजबूर है| रिपोर्ट के अनुसार हर साल 42 लाख मौतों के लिए सीधे तौर पर आउटडोर एयर पोल्युशन ही जिम्मेवार है| जिनमें से करीब 90 फीसदी मौतें गरीब और मध्यवर्गीय देशों में ही होती हैं| जबकि आउटडोर और इंडोर एयर पोल्युशन से होने वाली मौतों के आंकड़ों को जोड़ दिया जाए तो इसके कारण हर साल करीब  88 लाख लोगों की मौत हो जाती है| इसके चलते शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य भी गिरता जा रहा है, परिणामस्वरूप हिंसा, अवसाद और आत्महत्या के मामले बढ़ते जा रहे हैं।

इस अध्ययन में 93 देशों में स्थित 11,000 से ज्यादा एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग स्टेशनों से प्राप्त पीएम 2.5 के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है| वायु प्रदूषकों के वह कण जो 2.5 माइक्रोमीटर से छोटे होते हैं उन्हें पीएम 2.5 के नाम से जाना जाता है। जिनकी वजह से हृदय रोग, स्ट्रोक, फेफड़ों के कैंसर और मधुमेह जैसी अनगिनत बीमारियां हो सकती हैं| शोध के अनुसार जिन देशों में ज्यादा मॉनिटरिंग स्टेशन होते हैं वहां वायु प्रदूषण का स्तर कम रहता है|

शोधकर्ताओं के अनुसार पाकिस्तान, नाइजीरिया, इथियोपिया, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, तंजानिया और केन्या सहित कुल 13 देशों की सरकारें वायु गुणवत्ता सम्बन्धी आंकड़ों को साझा नहीं कर रही हैं| जिससे करीब 100 करोड़ लोग प्रभावित होते हैं| जबकि रिपोर्ट के अनुसार भारत, चीन, इंडोनेशिया, ब्राजील, रूस, जापान, फिलीपींस और दक्षिण अफ्रीका सहित कुल 30 देशों की सरकारें एयर क्वालिटी का रियल टाइम डाटा इकट्ठा करती हैं| लेकिन इसके बावजूद वो पूरी जानकारी पारदर्शिता के साथ उपलब्ध नहीं कराती हैं| इस वजह से करीब 440 करोड़ लोग प्रभावित हो रहे हैं|  इस 212 देशों पर किये गए इस विश्लेषण के अनुसार दुनिया के 109 देश किसी भी प्रमुख प्रदूषक का डेटा रिकॉर्ड नहीं करती हैं|

दुनिया भर में वायु प्रदूषण एक ऐसा खतरा है जिससे कोई नहीं बच सकता और न ही कोई इससे भाग सकता है। ऐसे में इससे बचने का सिर्फ एक तरीका है, जितना हो सके इसे कम किया जाये| साथ ही सरकारों की भी जिम्मेवारी बनती है कि इसकी रोकथाम का प्रयास करे और इससे जुड़े आंकड़ों को पूरी पारदर्शिता के साथ सभी के लिए उपलब्ध कराएं जिससे इनको बेहतर तरीके से समझकर इसकी रोकथाम सम्बन्धी नीतियां बनाई जा सकें|