छोटे-मझोले उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषण पर ध्यान देने की जरूरत: सीएसई

सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण ने कहा कि हमारा प्रयास एमएसएमई क्षेत्र को हरित, स्वच्छ तरीके से काम करने में मदद करने के लिए सबसे व्यवहार्य विकल्पों का पता लगाने का रहेगा

By DTE Staff

On: Monday 30 May 2022
 
Photo: wikimedia commons
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भारतीय उद्योग के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र का देश के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा है। भारत की अर्थव्यवस्था में इस क्षेत्र द्वारा निभाई गई इतनी महत्वपूर्ण भूमिका के बावजूद, शहरों और क्षेत्रों में बिगड़ती वायु गुणवत्ता में इसके योगदान का शायद ही कभी मूल्यांकन या विश्लेषण हुआ हो। 

2011 (तत्कालीन) योजना आयोग की रिपोर्ट ने अनुमान लगाया था कि उद्योगों से कुल उत्सर्जन के 70 प्रतिशत हिस्से के लिए एमएसएमई उद्योग ही जिम्मेदार हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) उन कुछ संस्थाओं में से एक है जो इस क्षेत्र द्वारा वायु गुणवत्ता पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन कर रहे हैं। 

सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण ने कहा कि छोटे और मध्यम स्तर के उद्योगों में औद्योगिक उत्सर्जन में योगदान देने वाले सबसे आम उत्प्रेरक पुरानी और अप्रचलित तकनीक ,खराब बुनियादी ढांचा और ईंधन के रूप में कोयले पर उनकी निरंतर निर्भरता है। 

नारायण सीएसई द्वारा आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला को संबोधित कर रही थीं, जिसमें “लघु और मध्यम स्तर के उद्योगों में प्रदूषण नियंत्रण रणनीति” विषय पर चर्चा की गई थी। 

यह आयोजन प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों, औद्योगिक संघों, एमएसएमई विशेषज्ञों, गैर सरकारी संगठनों के प्रतिनिधियों और भारत भर के सलाहकारों एवं अधिकारियों को प्रदूषण में इस क्षेत्र के योगदान पर चर्चा करने और उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए एक रोडमैप तैयार करने के लिए एक मंच था। 

इस अवसर पर सीएसई की कार्यकारी निदेशक अनुमिता रॉयचौधरी ने कहा कि कई हालिया स्रोत विभाजन अध्ययनों के अनुसार, छोटे और मध्यम स्तर के औद्योगिक क्षेत्र  वायु प्रदूषण में एक प्रमुख योगदानकर्ता के रूप में तेजी से सामने आ रहे हैं। हमने पाया है कि यह क्षेत्र कई समस्याओं से ग्रस्त हैं। विश्वसनीय डेटा की कमी, प्रदूषणकारी ईंधन के उपयोग और अक्षम छोटे बॉयलरों से लेकर स्वच्छ प्रौद्योगिकी की कमी तक।

इस विषय पर सीएसई के निष्कर्षों का उल्लेख करते हुए कार्यक्रम निदेशक निवित कुमार यादव ने कहा कि “दिल्ली एनसीआर में औद्योगिक वायु प्रदूषण के आकलन पर सीएसई का 2020 का अध्ययन अलवर, भिवाड़ी, गाजियाबाद, गुरुग्राम, फरीदाबाद, पानीपत और सोनीपत के सात प्रमुख औद्योगिक जिलों को कवर किया गया था।

अध्ययन में अनुमान लगाया था कि इन इलाकों में 1.4 मिलियन टन तक कोयले की खपत होगी। इन क्षेत्रों में अधिकांश उद्योग छोटे और मध्यम स्तर के उद्योग थे। सीएसई के अनुसार, इन उद्योगों को स्वच्छ ईंधन और सामान्य दहन सुविधाएं अपनाने, स्वच्छ प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल एवं उत्सर्जन को नियंत्रित करने और सुधार के लिए एक स्थायी भविष्य के लिए एक स्पष्ट रोडमैप और सक्षम वातावरण की आवश्यकता है। 

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव प्रशांत गर्गव ने इस स्थिति में उद्योग संघों की भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि उद्योगों के बीच सर्वोत्तम उपलब्ध प्रौद्योगिकियों के बारे में जागरूकता पैदा करने में उद्योग संघों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

इस अवसर पर हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव एस नारायणन ने एक चेतावनी दी कि “हमें नीतिगत ढांचे में कॉमन बॉयलरों के बारे में सोचने की जरूरत है। कानून में कुछ बदलाव के कारण कॉमन बॉयलरों में आज किया गया निवेश कल बेकार नहीं जाना चाहिए।

अंत में नारायण ने कहा कि “73वां राष्ट्रीय सैंपल सर्वे (2015-16) हमें बताता है कि भारत के एमएसएमई क्षेत्र में 63 मिलियन इकाइयां हैं जिन्होंने 111 मिलियन नौकरियां पैदा की हैं। एक ऐसा क्षेत्र जिसमें इस तरह का पैमाना है, स्वाभाविक रूप से एक विशाल पर्यावरणीय पदचिह्न छोड़ेगा।

हमारा प्रयास इस क्षेत्र को हरित, स्वच्छ तरीके से काम करने में मदद करने के लिए सबसे व्यवहार्य विकल्पों का पता लगाने का रहेगा। यह कार्यशाला उसी प्रयास का एक हिस्सा है। उन्होंने कहा कि हमें उम्मीद है कि इससे समन्वित तरीके से आगे बढ़ने के तरीकों पर आम सहमति बनाने में मदद मिलेगी।

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