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पर्यावरण मुकदमों की डायरी : दवा कंपनियां सिरसा और सतलुज नदी को कर रही हैं प्रदूषित, एनजीटी ने तीन महीने में मांगी रिपोर्ट

पर्यावरण संबंधी मामलों में अदालतों में क्या हुआ, बता रहा है डाउन टू अर्थ

By Susan Chacko, Dayanidhi

On: Friday 24 July 2020
 

हिमाचल प्रदेश में दवा के अपशिष्ट जल को सिरसा और सतलुज में बहाकर नदियों को प्रदूषित करने के मामले में 22 जुलाई, 2020 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल और न्यायमूर्ति सोनम फेंटसो वांग्दी की दो सदस्यीय पीठ ने संज्ञान लिया।

सोलन में एक्मे लाइफ साइंसेज, नालागढ़ और हेलियो फार्मास्यूटिकल्स द्वारा बद्दी में सामान्य अपशिष्ट उपचार संयंत्र (सीईटीपी) के कचरे को बहाने के खिलाफ एनजीटी में एक आवेदन दिया गया था।

इसमें कहा गया था कि सीईटीपी बरोटीवाला और नालागढ़ में दवा इकाइयों से जुड़ा नहीं था, इस प्रकार वे अपने अपशिष्टों को सीधे नदियों में प्रवाहित कर रहे थे।

आवेदक वेटरन्स फोरम फॉर ट्रांसपेरेंसी इन पब्लिक लाइफ ने कहा कि ईटीपी/ एसटीपी में उपचार के बाद भी उद्योगों से फार्मास्युटिकल अवयव तब तक बाहर आ सकते हैं जब तक कि ईटीपी/ एसटीपी विशेष उद्देश्य के लिए न बने हों। इसके अलावा, वर्तमान सीईटीपी को सक्रिय दवा के अंश (एपीआई) को साफ करने के लिए नहीं बनाया गया था।

उपचार, भंडारण और निपटान सुविधाओं (टीएसडीएफ) में नालागढ़ में औद्योगिक इकाइयों से उत्पन्न स्लज नहीं डाला जाता है। बद्दी क्षेत्र में स्थित उद्योग 20,779 केएलडी औद्योगिक अपशिष्ट उत्पन्न कर रहे थे, जिसमें से 17,894 केएलडी को उपचारित सीईटीपी में किया जा रहा था और शेष 2,885 केएलडी को सीधे सिरसा नदी में बहाया जा रहा था।

बद्दी बरोटीवाला नालागढ़ (बीबीएन) क्षेत्र में पहले से कोई सीवेज सिस्टम नहीं है, यहां आवासीय और औद्योगिक क्षेत्र का कोई सीमांकन नहीं था। रासायनिक विश्लेषण पर 296.1 यूजी/एल की सांद्रता में सिप्रोफ्लोक्सासिन की उपस्थिति पाई गई। मेसर्स एक्मे लाइफ साइंसेज के बहाए गए अपशिष्ट में सिप्रोफ्लोक्सासिन की मात्रा निर्धारित सीमा से 13455 गुना अधिक थी।

आवेदन के जवाब में, एनजीटी ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी), हिमाचल प्रदेश राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जिला मजिस्ट्रेट, सोलन की एक संयुक्त समिति को उपरोक्त मुद्दों पर विचार करने और आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया। उन्हें तथ्यात्मक कार्रवाई  की रिपोर्ट को तीन महीने के अंदर न्यायाधिकरण के सम्मुख प्रस्तुत करने को कहा गया है।  

 

मेघालय में रैट-होल कोयला खनन पर सीपीसीबी ने सौंपी रिपोर्ट

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने मेघालय में रैट-होल कोयला खनन से प्रभावित पर्यावरण को बहाल करने के उपायों पर एनजीटी को अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट में कहा गया है कि सीपीसीबी को इस मामले में गठित स्वतंत्र समिति द्वारा तैयार की गई कार्य योजना स्वीकार्य है। समिति यह सुनिश्चित करने के उद्देश्य से थी कि अवैध रैट-होल कोयला खनन से प्रभावित क्षेत्रों में पर्यावरण के पुनर्वास के लिए उपलब्ध रकम का उपयोग “समग्र और एकीकृत” तरीके से किया जाए। समिति ने सीपीसीबी को कार्य योजना के कार्यान्वयन के लिए 100 करोड़ रुपए की संपूर्ण राशि उपलब्ध कराने पर विचार करने की सलाह भी दी।

इसके अलावा, उप समिति का गठन करना जो उक्त कार्य योजना के कार्यान्वयन के लिए 100 करोड़ रुपए के उपयोग की निगरानी करेगी, सीपीसीबी ने इसे भी स्वीकार किया।

हालांकि, यह अनुरोध किया गया कि सीपीसीबी अधिकारी को उक्त उप समिति का सदस्य बनाया जाना चाहिए, न कि अध्यक्ष को। रिपोर्ट में कहा गया है कि उप समिति के अध्यक्ष राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी (मुख्य सचिव या वन एवं पर्यावरण विभाग के सचिव) होने चाहिए।

18 अवैध स्क्रैपिंग इकाइयों को बंद कर, पर्यावरण क्षतिपूर्ति के लिए कारण बताओ नोटिस

दिल्ली के नगली सकरावती क्षेत्र में सभी अवैध वाहन हटाने स्क्रैपिंग/निराकरण इकाइयों को बंद कर दिया गया और पर्यावरण क्षतिपूर्ति के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।

16 मार्च के एनजीटी के आदेश के अनुपालन में दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में इसका उल्लेख किया गया था।

एनजीटी के आदेश पर परिवहन विभाग और डीपीसीसी के अधिकारियों के एक संयुक्त दल ने 3 जून को छह वाहन स्क्रैपिंग इकाइयों का निरीक्षण किया। छह में से, चार इकाइयां चल रही थीं जिनमें वाहनों को तोड़ने की गतिविधि चल रही थी। दो इकाइयां बंद थी जहां परिसर खाली पाया गया। उन चार इकाइयों को बंद करने के लिए निर्देश जारी किए गए, जो चल रहे थे।

यह सुनिश्चित करने के लिए कि अदालत के आदेश में उल्लिखित छह इकाइयों के अलावा ऐसी कोई भी अवैध इकाई तो नहीं चल रही है, 10 जुलाई को डीपीसीसी द्वारा नंगली सकरावती क्षेत्र का एक व्यापक सर्वेक्षण किया गया था। इस तरह के और अधिक अवैध वाहन स्क्रैपिंग इकाइयों की पहचान की गई थी। सर्वेक्षण के दौरान पहचानी गई इन अवैध इकाइयों को बंद करने के निर्देश जारी किए गए।

सभी पंद्रह अवैध वाहन स्क्रैपिंग/निराकरण इकाइयां बंद हो गई हैं, यह सुनिश्चित करने के लिए डीपीसीसी, दक्षिणी दिल्ली नगर निगम, राजस्व, पुलिस, दिल्ली जल बोर्ड और बीएसईएस के अधिकारियों के एक दल ने 10 जुलाई को एक अभियान चलाया। अभियान के दौरान तीन और ऐसी अवैध इकाइयों की पहचान की गई जो इन 15 इकाइयों से अलग थीं।

रिपोर्ट में कहा गया कि नंगली सकरावती क्षेत्र में पहचानी गई सभी अठारह इकाइयों को प्रभावी ढंग से बंद कर दिया गया है और बिजली और पानी की आपूर्ति काट दी गई है। सभी अठारह अवैध स्क्रैपिंग इकाइयों में पर्यावरण क्षतिपूर्ति के लिए कारण बताओ नोटिस जारी कर दिए गए हैं। इसके अलावा, वायु अधिनियम 1981 और जल अधिनियम 1974 के तहत प्रावधानों के उल्लंघन के लिए इकाइयों के खिलाफ कार्यवाही शुरू की जाएगी।

छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल ने बूचड़खाने पर लगाया जुर्माना

जिला दुर्ग के एक आवासीय क्षेत्र राधिका नगर में एक बूचड़खाने का अवैध तरीके से संचालन किया जा रहा था, जिस पर छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल (सीईसीबी) ने 2,68,87,500 रुपए का जुर्माना लगाया है। 2,151 दिनों से बूचड़खाने में गैरकानूनी ढंग से अनुपचारित अपशिष्ट के बहने तथा अवैध संचालन के लिए जुर्माना लगाया गया है।

यह जानकारी 22 जनवरी के एनजीटी के आदेश के अनुपालन में सीईसीबी द्वारा प्रस्तुत की गई कार्रवाई रिपोर्ट में दी गई है। सीईसीबी ने 25 अक्टूबर, 2019 को आयुक्त, नगर निगम, भिलाई को अवैध बूचड़खाने के संचालन और बिना उपचार के अपशिष्ट के बहने के संबंध में एक नोटिस जारी किया था। इसके अलावा, 11 नवंबर, 2019 को जल (रोकथाम और प्रदूषण नियंत्रण) अधिनियम, 1974 की धारा 33ए के तहत इसे बंद करने के दिशा-निर्देश जारी किए गए थे।

रिपोर्ट में कहा गया है कि छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड ने भी बूचड़खाने की बिजली काट दी है। जब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों ने 25 नवंबर, 2019 और 5 फरवरी, 2020 को जगह का निरीक्षण किया, तो बूचड़खाने बंद पाए गए।