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नई खोज: मछली के बेकार फेंके गए हिस्सों से वैज्ञानिकों ने बनाई पर्यावरण अनुकूल प्लास्टिक

वैज्ञानिकों ने मछली के बेकार, फेंके गए हिस्सों से प्लास्टिक बनाने में सफलता हासिल की है जो ने केवल पर्यावरण के अनुकूल है साथ ही इससे बढ़ते कचरे को भी नियंत्रित किया जा सकता है

By Lalit Maurya

On: Tuesday 06 April 2021
 
मछली के तेल का उपयोग करके शोधकर्ताओं द्वारा बनाया गया पॉलीयूरेथेन, फोटो: मिखाइली व्हीलर
मछली के तेल का उपयोग करके शोधकर्ताओं द्वारा बनाया गया पॉलीयूरेथेन, फोटो: मिखाइली व्हीलर मछली के तेल का उपयोग करके शोधकर्ताओं द्वारा बनाया गया पॉलीयूरेथेन, फोटो: मिखाइली व्हीलर

वैज्ञानिकों ने मछली के बेकार, फेंके गए हिस्सों से प्लास्टिक बनाने में सफलता हासिल की है जो ने केवल पर्यावरण के अनुकूल है साथ ही इससे बढ़ते कचरे को भी नियंत्रित किया जा सकता है। इससे जुड़ी रिपोर्ट अमेरिकन केमिकल सोसाइटी द्वारा आगामी 08 अप्रैल को होने वाली मीटिंग में प्रस्तुत की जाएगी।

आज हम अपने चारों ओर देखें तो हमें अपने आसपास हर जगह प्लास्टिक से बनी चीजें आसानी से देखने को मिल जाएंगी। हम बहुत हद तक इसपर निर्भर हो चुके हैं। बात चाहे जूतों की हो, कपड़ों की, टायरों में या फ्रिज जैसे उपकरणों और निर्माण सामग्री की हो हर जगह प्लास्टिक दिख ही जाएगी। हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बनने के बावजूद भी इससे जुड़ी समस्याएं भी कम नहीं हैं। कच्चे तेल से बना यह पारंपरिक पॉलीयूरेथेन प्लास्टिक न केवल जहरीला होता है साथ ही इसे नष्ट होने में भी काफी वक्त लग जाता है जिस वजह से यह पर्यावरण के लिए भी एक बड़ी समस्या है।

हाल के दशकों में प्लास्टिक का उत्पादन तेजी से बढ़ा है, एक अन्य शोध से पता चला है कि हम 1950 से लेकर अब तक 830 करोड़ टन से अधिक प्लास्टिक का उत्पादन कर चुके हैं। जिसके 2025 तक दोगुना हो जाने का अनुमान है । दुनिया भर में हर मिनट 10 लाख पीने के पानी की बोतलें खरीदी जाती हैं जो कि प्लास्टिक से बनी होती है। ऐसे में इसके कारण बढ़ता प्लास्टिक प्रदूषण अपने आप में एक बड़ी समस्या है। लेकिन हाल ही में वैज्ञानिकों ने मछली के शरीर के बेकार फेंके गए अंगों जैसे सिर, हड्डियों और त्वचा से एक बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक बनाने में सफलता हासिल की है।

इस परियोजना के मुख्य अन्वेषक, फ्रांसेस्का कीर्टन के अनुसार यदि इसे सफलतापूर्वक विकसित करा जाता है तो मछली के तेल पर आधारित यह पॉलीयूरेथेन प्लास्टिक सम्बन्धी जरूरतों को पूरा कर सकता है। प्लास्टिक के निर्माण में यह जरुरी है कि हम इस बात का ध्यान रखें की एक बार इस्तेमाल होने के बाद उसका क्या होगा, क्या उसे ठीक से रीसायकल किया जा सकता है और उसका पुनः उपयोग कर सकते हैं। इसके लिए उन्होंने कचरे में पड़े मछली के बेकार हिस्सों से इस प्लास्टिक को बनाने की शुरुवात की थी।

पारम्परिक पॉलीयूरेथेन से क्यों बेहतर है यह

इसके विपरीत यदि पारम्परिक रूप से पॉलीयूरेथेन के उत्पादन को देखें तो उसमें पर्यावरण और सुरक्षा सम्बन्धी कई समस्याएं हैं। इसके लिए कच्चे तेल की जरुरत पड़ती है। जोकि एक गैर-नवीकरणीय संसाधन है। साथ ही इसके लिए एक रंगहीन और अत्यधिक विषाक्त गैस फॉस्जीन की आवश्यकता होती है। इसके निर्माण में आइसोसायनेट्स उत्पन्न होते हैं जो स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होते हैं। इससे जो प्लास्टिक बनता है वो आसानी से नष्ट नहीं होता है। साथ ही इसके विघटन से यह कैंसर पैदा करने वाले घटकों को जन्म देता है।

इसके आलावा पेट्रोलियम के स्थान पर पौधों से मिलने वाले तेल से भी पॉलीयूरेथेन का उत्पादन किया जाता है, पर उसमें सबसे बड़ी समस्या यह है कि यदि इस तेल के लिए पौधों को उगाया जाएगा तो भोजन के लिए फसलों के उत्पादन का क्या होगा। 

ऐसे में मछली के बेकार हिस्सों से इसका निर्माण किया जा सकता है। इसके लिए वैज्ञानिकों ने इन बेकार हिस्सों से प्राप्त तेल को पॉलीयूरेथेन में परिवर्तित करने के लिए एक प्रक्रिया विकसित की है। कीर्टन के अनुसार लेकिन इसमें सबसे बड़ी समस्या दुर्गन्ध की थी, जब तेल पर काम कर रहे थे तो वो मछली की तरह दुर्गन्ध कर रहा था, लेकिन प्रक्रिया के दौरान उसमें से यह दुर्गन्ध भी पूरी तरह गायब हो गई थी। 

एक अन्य प्रयोग में शोधकर्ताओं ने यह जांचने का प्रयास किया है कि एक बार इस प्लास्टिक का उपयोग हो जाने के बाद यह कितनी जल्दी और आसानी से नष्ट हो सकता है। इसके लिए उन्होंने एक एंजाइम लिपेस का इस्तेमाल किया है जो मछली के तेल में मौजूद वसा को तोड़ने में सक्षम है। उन्हें पता चला की इस एंजाइम की मदद से ऐसा किया जा सकता है। यह दिखाता है कि इसे आसानी से बायोडिग्रेड किया जा सकता है। अगले चरण में वैज्ञानिकों की योजना इसके भौतिक गुणों का अध्ययन करने की है जिससे इसे वास्तविक दुनिया में लाने की है जिससे इसका उपयोग पैकेजिंग और कपड़ों के निर्माण में किया जा सके।