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गंगा में प्लास्टिक प्रदूषण : नदी में कुल 94 दिनों में 2854 किलोमीटर तक बहीं प्लास्टिक बोतलें

गंगा में प्लास्टिक प्रदूषण का अनूठा तरीके से पता लगाया गया है, प्लास्टिक बोतलों में इलेक्ट्रॉनिक टैग लगाकर उन्हें गंगा में छोड़ा गया जो कि बंगाल की खाड़ी तक पहुंचा। 

By Vivek Mishra

On: Friday 04 December 2020
 

गंगा नदी में प्लास्टिक प्रदूषण कुछ ही महीनों में हजारों किलोमीटर की यात्रा तय कर सकता है, यह बात गंगा में छोड़े गए इलेक्ट्रॉनिक टैग वाले प्लास्टिक बोतल से पता चली है। शोधार्थियों ने यह निष्कर्ष जीपीएस और सेटलाइट टैग वाली प्लास्टिक बोतलों को गंगा और बंगाल की खाड़ी में छोड़ने के बाद पाया।

इलेक्ट्रॉनिक टैग वाली बोतल ने अधिकतम दूरी 2854 किलोमीटर (1,786 मील) 94 दिनों में पूरी की। 

एक्सटेर यूनिवर्सिटी औऱ जूओलॉजिकल सोसाइटी ऑफ लंदन (जेएसएल) के शोधार्थियों ने नेशनल जियोग्राफिक सोसाइटी सी टू सोर्स को साथ मिलकर यह अधययन किया है।   

एक्सटेर यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर इकोलॉजी एंड कंजर्वेशन के डॉक्टर इमिली डुंकन ने बताया कि टैग वाली प्लास्टिक बोतल में हमारा संदेश था कि यह प्लास्टिक प्रदूषण कितनी दूर और कितनी तेजी से कहीं जा सकता है।  यह दर्शाता है कि यह वास्तिवकता में वैश्विक मुद्दा है, सिर्फ एक प्लास्टिक पीस नदी या समुद्र में फेंका जाए तो वह दुनिया के किसी दूसरे कोने में जाकर मिलेगा।

सामान्य तौर पर गंगा में बोतल कई चरणों में मूव करती रही, प्रायः डाउनस्ट्रीम में कई जगह रास्तों में जाकर फंसी। 

समुद्र मे बोतल जबरदस्त दूरी नाप सकती हैं क्योंकि वहां कोस्टल करंट पहले होता है उसके बाद वह और चौड़े स्तर पर फैल जाता है। इस अध्ययन में 500 मिलीलीटर की 25 बोतलों को गंगा में फेंका गया था। 

कंजर्वेशन टेक्नोलॉजी ऑर्गेनाइजेशन अर्रीबडा और जेएसएल ने कहा कि प्रत्येक प्लास्टिक की बोतल के अंदर का हार्डवेयर पूरी तरह से खुला स्रोत है, यह सुनिश्चित करने के लिए कि शोधकर्ता दूसरे प्लास्टिक या पर्यावरणीय कचरे को ट्रैक करने के लिए हमारे द्वारा प्रस्तुत समाधान को दोहरा सकते हैं, संशोधित कर सकते हैं या इसे बढ़ा सकते हैं।

प्लास्टिक की बोतलों के अंदर एंबेडिंग इलेक्ट्रॉनिक्स ने भी सेलुलर और सैटेलाइट ट्रांसमीटर दोनों का उपयोग करने का एक अनूठा अवसर पेश किया है। इससे यह तय हुआ है कि हम शहरी वॉटरवेज के माध्यम से प्रत्येक बोतल की आवाजाही को ट्रैक कर सकते हैं, खासतौर से जहां मोबाइल फोन नेटवर्क उपलब्ध हो और सेटेलाइट कनेक्टिविटी के जरिए  बोतलों के खुले समुद्र में पहुंचने के बाद भी ट्रैकिंग संभव है। 

शोधार्थियों का मानना है कि सीख देने के लिए बोतल टैग एक पॉवरफुल टूल हो सकता है, इससे जागरुकता तो फैलेगी ही लेकिन व्यवहार में भी बदलाव किया जा सकता है।  

डुनकान ने कहा कि इसके जरिए स्कूलों में प्लास्टिक प्रदूषण के बारे में बताया जा सकता है ताकि वे जान सके कि बोतल कहां जाती हैं। इसके अलावा वैश्विक स्तर पर इस जानकारी के लिए कि समुद्र में किस तरह से प्लास्टिक प्रदूषण होता है और यहां कहां जाकर रुकता है इसे भी देखा जा सकता है।

पीएलओएस वन में इस जर्नल को प्रकाशित किया गया है।