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प्लास्टिक मुक्त हो सकते हैं समुद्र और नदियां, वैज्ञानिकों ने बनाया नया डिग्रेडेबल प्लास्टिक

अमेरिका स्थित कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के रसायनज्ञों ने एक नया पॉलीमर बनाया है, जो पराबैंगनी विकिरण द्वारा डिग्रेड हो सकता है

By Dayanidhi

On: Wednesday 22 April 2020
 
Photo: wikipedia commons
Photo: wikipedia commons Photo: wikipedia commons

आज दुनिया भर में समुद्र प्लास्टिक के कचरे से पटे पड़े हैं। ये हमारे पर्यावरण को ही प्रदूषित नहीं कर रहे हैं अपितु इसके कारण समुद्री जीवों का जीवन भी दांव पर लगा है। दुनिया के समुद्रों और जलमार्गों पर फैलने वाले प्लास्टिक प्रदूषण को दूर करने के लिए, अमेरिका स्थित कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के रसायनज्ञों ने एक नया पॉलीमर बनाया है, जो पराबैंगनी विकिरण द्वारा डिग्रेड हो सकता है।

शोधकर्ता ने बताया कि हमने एक नया प्लास्टिक बनाया है जिसमें व्यवसायिक मछली पकड़ने के लिए आवश्यक यांत्रिक गुण हैं। कॉर्नरी विश्वविद्यालय में रसायन विज्ञान के प्रोफेसर तथा प्रमुख शोधकर्ता ब्रायस लिपिंस्की ने कहा यदि यह जलीय वातावरण में कहीं छूट जाता है, तो कुछ समय बाद अपने आप डिग्रेड हो सकता है। यह सामग्री पर्यावरण में लगातार बढ़ती प्लास्टिक की मात्रा को कम कर सकती है। यह शोध जर्नल ऑफ़ अमेरिकन केमिकल सोसाइटी में प्रकाशित हुआ है।

लिपिंस्की ने कहा कि समुद्र में तैरने वाला लगभग आधे से अधिल प्लास्टिक कचरा व्यवसायिक मछली पकड़ने के कारण होता है। मछली पकड़ने के जाल और रस्सियां मुख्य रूप से तीन प्रकार के पॉलिमर से बनाई जाती हैं: आइसोटैक्टिक पॉलीप्रोपाइलीन, उच्च-घनत्व वाली पॉलीइथाइलीन और नायलॉन -6,6, जिनमें से कोई भी आसानी से डिग्रेड नहीं होते हैं।

कोएट्स और उनकी शोध टीम ने इस प्लास्टिक 'आइसोटैक्टिक पॉलीप्रोपाइलीन ऑक्साइड', या आईपीपीओ को विकसित करने में 15 वर्ष बिताए हैं। हालांकि इसकी मूल खोज 1949 में हुई थी, लेकिन इस हालिया काम से पहले इस सामग्री की यांत्रिक शक्ति और फोटोग्रेडेशन की जानकारी नहीं थी। उल्लेखनीय है कि फोटोग्रेडेशन-प्रकाश द्वारा सामग्री में परिवर्तन करना होता है।

लिपिंस्की ने उल्लेख किया कि जबकि आइसोटैक्टिक पॉलीप्रोपाइलीन ऑक्साइड (आईपीपीओ) सामान्य उपयोग में स्थिर रहता है, लेकिन यह पराबैंगनी विकिरण (यूवी प्रकाश) के संपर्क में आने पर टूट जाता है। उन्होंने कहा कि प्रयोगशाला में प्लास्टिक की संरचना में बदलाव होते है, लेकिन देखने में, प्रक्रिया के दौरान इसमें बहुत अधिक परिवर्तन नहीं हुए।

उन्होंने कहा कि डिग्रेड होने की दर प्रकाश की तीव्रता पर निर्भर करता है, लेकिन उनकी प्रयोगशाला में पॉलीमर की लंबाई 30 दिनों के बाद अपनी मूल लंबाई के एक चौथाई तक कम हो गई थी।

आखिरकार लिपिंस्की और शोध दल के अन्य वैज्ञानिक पर्यावरण में पॉलीमर का कोई निशान नहीं छोड़ना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि आइसोटैक्टिक पॉलीप्रोपाइलीन ऑक्साइड (आईपीपीओ) की छोटी श्रृंखलाओं के बायोडिग्रेडेशन होना अपने आप में मिसाल है जो इसे प्रभावी रूप से गायब कर सकता है।