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आरओ पर प्रतिबंध: सरकार के ड्राफ्ट से गायब हैं एनजीटी के ये निर्देश

एनजीटी ने आरओ पर प्रतिबंध लगाने के निर्देश दिए थे, लेकिन सरकार के ड्राफ्ट में कुछ निर्देश गायब हैं

By Shagun Kapil

On: Friday 07 February 2020
 
Photo: wikimedia commons
Photo: wikimedia commons Photo: wikimedia commons

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के आरओ प्यूरीफायर के अंधाधुध उपयोग से होने वाली पानी की बर्बादी को रोकने संबंधी निर्देश के बाद केंद्र सरकार ने इस संबंध मसौदा तैयार कर लिया है, लेकिन इस अधिसूचना में एनजीटी की मूल भावना को वह जगह नहीं मिली है, जिसको लेकर एनजीटी के स्पष्ट निर्देश दिए थे। एनजीटी ने मई 2019 में सरकार को आदेश दिया था कि जिन इलाकों में पानी ज्यादा खारा नहीं है, वहां आरओ प्यूरीफायर पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। एनजीटी ने इस संबंध में नीति बनाने का निर्देश भी दिया था और कहा था कि जिन जगहों में टीडीएस की मात्रा 500 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम है, वहां घरों में सप्लाई होने वाले नल का पानी सीधे पिया जा सकता है। ऐसा होने से पानी की अनावश्यक बर्बादी पर रोक लगेगी। एनजीटी ने यह भी कहा था कि केवल 60 फीसदी से ज्यादा पानी देने वाले आरओ के इस्तेमाल को ही मंजूरी दी जाए। एनजीटी ने सरकार से आरओ सिस्टम को इस तरह से डिजाइन करने का आदेश दिया था कि न्यूनतम टीडीएस की मात्रा 150 मिलीग्राम प्रतिलीटर तक हो जाए। 

 एनजीटी की तय सीमाओं का उल्लेख नहीं

 केंद्रीय पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 3 फरवरी 2020 को इस संबंध में अधिसूचना तो जारी कर दी है, लेकिन एनजीटी द्बारा तय की सीमाओं का उल्लेख नहीं किया गया है। महज यह उल्लेख किया गया है कि झिल्ली आधारित जल शोधन प्रणाली, मुख्य रूप से आरओ का इस्तेमाल प्रतिबंधित होगा, जहां पीने का पानी भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) के अनुसार है। पानी का कोई विशेष नमूना बीआईएस का अनुपालन है या नहीं, यह टीडीएस ही नहीं, बल्कि कई मापदंडों पर निर्भर करता है, जबकि आरओ तकनीकी महज अतिरिक्त टीडीएस को हटाने तक ही समित है, जबकि पानी में अन्य अशुद्धियों या धातुओं की सफाई करने का काम नहीं करता है।

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 एनजीटी द्बारा बनाई गई विशेषज्ञ कमिटी की रिपोर्ट के अनुसार बीआईएस मानकों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि आरओ सिस्टम को कच्चे पानी के शोधन के लिए 0.1 मिलीग्राम/1 से ऊपर और फलोराइड का स्तर 8.0 मिलीग्राम/1 से ऊपर की सिफारिश नहीं की गई है। उदाहरण के तौर पर अगर एक घर में 500 मिलीग्राम/1 से कम टीडीएस के साथ पानी आता है, लेकिन बीआईएस की स्वीकार्य सीमा से उपर अन्य तत्व जैसे नाइट्रेट्स , सल्फेट्स व फलोराइड आदि तत्व हैं तो तय मानक का पालन नहीं करेगा, लेकिन इससे इसके शोधन के लिए पानी के लिए आरओ सिस्टम की जरूरत नहीं होगी, क्योंकि टीडीएस पहले से ही सीमा के भीतर है, हालांकि यह अन्य अशुद्धियों के उपचार में प्रभावी नहीं होगा।

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आरओ निर्माता जिस प्रकार टीडीएस के अलावा आरओ सिस्टम के जरिए अन्य रसायनों के उपचार का दावा करते हैं, वह सही नहीं है। यह उपभोक्ताओं को गुमराह करने वाला है। यही विशेषज्ञ समिति का मूल तथ्य भी था। बीआईएस के मानकों में कई मापदंडों को शामिल किया गया है, जिसके आधार पर पानी के परीक्षण के साथ-साथ टीडीएस की मात्रा को भी जांचा जा सकता है। 

 दोबारा कोर्ट में मिलेगी चुनौती

 याचिकाकर्ता एनजीओ फेंड्स के महासचिव शरद तिवारी ने कहा कि इस अधिसूचना के आधार पर, एनजीटी के आदेश का कोई मतलब नहीं रह जाता है, हम फिर से उसी कसौटी पर खड़े हैं, इसीलिए इसे फिर से अदालत में चुनौती दी जाएगी। अधिसूचना में न्यूनतम टीडीएस को लेकर कुछ भी स्पष्ट नहीं है, जबकि एनजीटी के आदेश के अनुसार विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट ने अंतिम रूप से कैल्शियम, मैग्नीशियम आदि जैसे महत्वपूर्ण खनिजों को हटाने वाले आरओ सिस्टम के कारण कमियों के मुद्दों की जांच की, जो पानी के उपयोगकर्ता उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डालता है। यह कम टीडीएस के पानी के उपभोग और उपयोग को कम करने और विनियमित करने के लिए निर्माताओं को 150 मिलीग्राम या कैल्शियम और मैग्नीशियम के न्यूनतम स्तर को न्यूनतम टीडीएस एकाग्रता बनाए रखने के लिए कहता है। सरकार द्बारा जारी मसौदा अधिसूचना में केवल बीआईएस अनुपालन का उल्लेख है। बीआईएस के पास शोधित पानी में टीडीएस के लिए कोई न्यूनतम सीमा नहीं है और एनजीटी द्बारा इसी पर काम करने के लिए कहा गया था, हालांकि आरओ निर्माताओं को निर्देश दिया है कि वे 60 प्रतिशत तक पानी की वसूली के लिए आरओ सिस्टम की दक्षता बढ़ाए। आरओ सिस्टम केवल 20 प्रतिशत पानी की ही बचत करता है, जबकि 60 फीसदी पानी बेकार हो जाता है।

 भारतीय मानक ब्यूरो-बीआईएस के एक अधिकारी के अनुसार अधिसूचना के बाद बीआईएस ने आरओ प्यूरीफायर के लिए मानकों को संशोधित किया। उन्होंने कहा कि आरओ और बीआईएस प्रमाणीकरण के लिए लाइसेंस देना अनिवार्य होगा, जबकि वर्तमान में यह स्वैच्छिक प्रक्रिया है, जिसे अब तक केवल एक कंपनी द्बारा ही चुना गया गया था। मंत्रालय ने मसौदा अधिसूचना जारी करने के लिए जनता से 30 दिनों के भीतर टिप्पणियां मांगी हैं, जिसके बाद एक अंतिम अधिसूचना जारी की जाएगी।