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पर्यावरण मुकदमों की डायरी: ओडिशा रथ यात्रा पर सर्वोच्च न्यायालय ने लगाई रोक

यहां पढ़िए पर्यावरण सम्बन्धी मामलों के विषय में अदालती आदेशों का सार

By Susan Chacko, Lalit Maurya

On: Friday 19 June 2020
 
Photo: Getty Images

सुप्रीम कोर्ट ने 18 जून, 2020 को निर्देश दिया है कि इस साल ओडिशा के मंदिर शहर या राज्य के अन्य हिस्सों में कहीं भी रथ यात्रा का आयोजन नहीं किया जाएगा| इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी आदेश दिया है कि इस अवधि में रथ यात्रा से जुड़ी कोई भी अन्य धार्मिक गतिविधि नहीं होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला कोरोनावायरस फैलने के खतरे और स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर लिया है|

23 जून, 2020 को होने वाली इस वार्षिक रथ यात्रा में औसतन हर वर्ष 10 से 12 लाख लोग जुटते हैं| यह उत्सव 10 से 12 दिनों तक चलता है। पर वर्तमान स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे रोकने का आदेश दिया है| अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जिस तरह से कोरोनावायरस के फैलने का खतरा है उसे देखते हुए इस वर्ष रथ यात्रा का आयोजन सार्वजनिक स्वास्थ्य और नागरिकों की सुरक्षा के हितों के खिलाफ होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि संविधान का आर्टिकल 25 भी सभी को आपने धार्मिक उत्सव मनाने की आजादी देता है| पर इसमें स्वास्थ्य और सुरक्षा का ध्यान रखना जरुरी है|


स्वास्थ्य कर्मियों के कल्याण के लिए दिशा निर्देश जारी करें सरकार: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वो स्वास्थ्य कर्मियों के कल्याण के लिए दिशा निर्देश जारी करें| यह आदेश 17 जून 2020 को जारी किया गया है| अपने इस आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिव को उचित दिशा निर्देश जारी करने के लिए कहा है| साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी है कि इस निर्देश का उल्लंघन आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत अपराध माना जाएगा|

इससे पहले स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया था| जिसमें माना गया था कि स्वास्थ्य कर्मियों को सही समय पर नियमित वेतन नहीं मिल रहा है| जहां तक क्वारंटाइन का सवाल है, उसके सम्बन्ध में उपयुक्त आवास के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है|

15 मई, 2020 को जारी दिशानिर्देशों के अनुसार जो डॉक्टर या स्वास्थ्यकर्मी कोविड-19 वार्ड में रोगियों को देख रहे थे, उन्हें क्वारंटाइन की सुविधा नहीं दी गयी थी| यह सुविधा तभी दी गयी थी जब स्वास्थ्यकर्मी अधिक जोखिम वाले मरीजों की देखभाल में लगे थे|

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया है कि जहां तक स्वास्थ्य कर्मचारियों और डॉक्टरों के वेतन का संबंध है| इस मामले में केंद्र सरकार आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत उचित आदेश जारी करेगी| साथ ही इसके पालन के लिए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भी सूचित किया जाएगा। उन्होने बताया है कि उन डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों के क्वारंटाइन से इंकार नहीं किया गया है जो सीधे तौर पर कोरोना के मरीजों की देखभाल कर रहे हैं| साथ ही उनके संपर्क में आते हैं| सॉलिसिटर जनरल ने सुझाव दिया है कि अस्पताल में डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों की जरुरत को देखते हुए क्वारंटाइन की अवधि शुरुवात में एक सप्ताह की होने चाहिए| जिसे स्वास्थ्य कर्मियों के स्वास्थ्य को देखते हुए आगे एक सप्ताह के लिए बढ़ाया जा सकता है|


सतलुज और ब्यास नदी में प्रदूषण की रोकथाम पर कमिटी ने जारी की रिपोर्ट

सतलुज और ब्यास नदी में हो रहे प्रदूषण और उसकी रोकथाम पर एनजीटी द्वारा गठित कमिटी ने अपनी रिपोर्ट जारी कर दी है| यह रिपोर्ट 18 जून 2020 को एनजीटी की साइट पर अपलोड की गयी है। यह निगरानी समिति द्वारा जारी चौथी रिपोर्ट है| गौरतलब है कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने जस्टिस जसबीर सिंह की अध्यक्षता में इस समिति का गठन किया था| जिसे प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए जरुरी क़दमों पर अपनी रिपोर्ट देनी थी|

इस समिति ने सतलुज और ब्यास नदी के जलग्रहण क्षेत्र में मौजूद उद्योगों और प्रदूषण के अन्य स्रोतों का दौरा किया था| साथ ही कमिटी ने अपनी सिफारिशें संबंधित अधिकारियों के पास भेज दी हैं| जिससे प्रदूषण की रोकथाम के लिए जरुरी कदम उठायें जा सकें|

इसके साथ ही समिति ने सतलज और ब्यास नदी के पानी की गुणवत्ता से जुड़े आंकड़ें भी एकत्र किये हैं| समिति ने सतलज की सहायक नदियों अर्थात् बुद्ध नाला, ईस्ट बेइन, काला सिंघियन नाला और होली बेइन में भी पानी की गुणवत्ता से जुड़ा डेटा लिया है|

इसके साथ ही मौजूदा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और नए एसटीपी के निर्माण की स्थिति के बारे में भी डेटा इकट्ठा किया है| इसके साथ ही पहले से ही मौजूद सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता के विस्तार सम्बन्धी डेटा भी जुटाया गया है| समिति ने उन एसटीपी के बारे में भी डेटा लिया है जो जमीन और वित्त की कमी के चलते नहीं बन पाए हैं| उन्होंने सीवेज ट्रीटमेंट में जो गैप है उसके भी आंकड़े जुटाए हैं| साथ ही सिंचाई के लिए कितने उपचारित सीवेज का उपयोग हो रहा है उसका भी जायजा लिया है| 31 मार्च 2020 तक कितनी सिंचाई परियोजनाओं में उपचारित सीवेज का उपयोग किया जा रहा है उससे जुड़े भी आंकड़ें लिए गए हैं| साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में सीवेज का निस्तारण हो रहा है उसकी भी जांच की गई है|


उद्योगों से प्रदूषित हो रही भादर नदी पर जीपीसीबी ने प्रस्तुत की रिपोर्ट

भादर नदी प्रदूषण मामले पर गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने एनजीटी के समक्ष अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी है| दिसंबर 2019 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और जीपीसीबी ने संयुक्त रूप से उद्योगों के कारण नदी में हो रहे प्रदूषण की जांच की थी| जिसके आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है| यह मामला राजकोट जिले के जेतपुर क्षेत्र में उद्योगों द्वारा हो रहे प्रदूषण और भादर नदी से जुड़ा है जोकि गुजरात में है|

इसके अलावा, गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने यह भी जानकारी दी है कि उसने अब तक प्रदूषण फैला रही 126 इकाइयों को बंद करने का आदेश जारी कर दिया है। दिल्ली के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी सी पटेल ने इस मामले पर एक रिपोर्ट पेश की थी| जिसमें जेतपुर की सारी कपड़ा इकाइयों को शहर के बाहर स्थानांतरित करने की सलाह दी गई थी| साथ ही इस रिपोर्ट में उचित बुनियादी ढांचे के साथ एक नए औद्योगिक क्षेत्र को विकसित करने का सुझाव दिया गया था। जस्टिस बी सी पटेल की सिफारिश को लागू करने के लिए जीपीसीबी ने गुजरात सरकार के सामने यह मामला उठाया था।