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चंद्रपुरा थर्मल पावर स्टेशन से हुए तेल रिसाव के मामले में समिति रिपोर्ट में दी गई गलत जानकारी: रिपोर्ट

पर्यावरण से संबंधित मामलों में सुनवाई के दौरान क्या कुछ हुआ, यहां पढ़ें-

By Susan Chacko, Lalit Maurya

On: Wednesday 11 November 2020
 

दामोदर घाटी निगम द्वारा संचालित चंद्रपुरा थर्मल पावर स्टेशन से हुए तेल रिसाव के बारे में जो जानकारी समिति ने कोर्ट से साझा की है वो गलत है| यह बात आवेदक प्रवीण कुमार सिंह द्वारा एनजीटी में एक रिपोर्ट के माध्यम से सामने रखी है, जिसे समिति की रिपोर्ट के जवाब में कोर्ट में दायर किया गया है| उनके अनुसार 29 सितंबर, 2020 को जारी रिपोर्ट में संयुक्त जांच समिति ने घटना की जो तारीख बताई है वो गलत है| साथ ही नदी में कितना तेल फैला है उसके बारे में भी सही जानकारी नहीं दी गई है| गौरतलब है कि चंद्रपुरा थर्मल पावर स्टेशन से हुए तेल रिसाव के चलते तेल दामोदर और उसकी सहायक नदियों और आसपास के क्षेत्र में फैल गया था|

आवेदक द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार समिति को घटना की तारीख के बारे में गलत जानकारी है, उन्होंने घटना की तारीख 15 अक्टूबर, 2019 बताई है जबकि सही तारीख 13 अक्टूबर, 2019 है| उन्होंने आरोप लगाया है कि घटना के बाद झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों द्वारा तुरंत कोई कार्रवाई नहीं की गई थी। संयुक्त समिति भी लीक हुए तेल की सही मात्रा का पता लगाने में विफल रही थी। समिति ने दामोदर नदी में हुए तेल रिसाव की मात्रा का पता लगाने के लिए बहुत ही ढुलमुल रवैया अपनाया था| उन्होंने इसके लिए पूरी तरह से एक रिपोर्ट पर भरोसा किया है जिसे मैसर्स चंद्रपुरा थर्मल पावर स्टेशन की एक इन-हाउस समिति द्वारा तैयार किया गया था।

संयुक्त समिति की रिपोर्ट के अनुसार दामोदर नदी में करीब 600 लीटर तेल का रिसाव हुआ था। लेकिन आवेदक का आरोप है कि यह मात्रा सही नहीं हो सकती क्योंकि वहां रिसाव 41 घंटे से अधिक समय तक जारी रहा था| जब तक धनबाद के जिला कलेक्टर को इसका पता लगता तब तक 53,000 लीटर तेल का रिसाव दामोदर नदी में हो चुका था।

10 नवंबर, 2020 को जारी प्रतिक्रिया रिपोर्ट में कहा गया है कि मीडिया के हवाले से यह भी पता चला है कि दामोदर घाटी निगम ने जानबूझकर तेनुघाट जलाशय से पानी को नदी में और नीचे की ओर छोड़ दिया था, जिसके चलते दामोदर नदी के साथ-साथ धनबाद, चास, झरिया और सिंदरी जैसे क्षेत्रों में भी तेल फैल गया था। जिसके कारण लगभग 20 से 30 लाख लोगों की पेयजल आपूर्ति पर असर पड़ा था।

समिति ने तेल रिसाव का कोई पारिस्थितिक मूल्यांकन भी नहीं किया था| संयुक्त समिति ने घटना के लगभग 11 महीने बाद बारिश के मौसम में साइट का दौरा किया था| जिसमें किसी भी तरह के सबूत मिलने की संभावना नहीं थी| 

सैनिक प्रतिष्ठानों में अपशिष्ट प्रबंधन के मुद्दे पर एनजीटी ने जारी किया आदेश

एनजीटी ने अपने 10 नवंबर को दिये आदेश में कहा है कि सशस्त्र बलों में विभिन्न स्तरों पर एक उपयुक्त इन-हाउस निगरानी तंत्र होना चाहिए ताकि पर्यावरणीय मुद्दों पर पूरी तरह से ध्यान दिया जा सके। इस संबंध में जिम्मेदार व्यक्तियों को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) जैसे विशेषज्ञ संस्थानों के साथ एक संयुक्त बैठक करनी चाहिए ताकि सबसे बेहतर उपायों को बनाया जा सके और उनकी समीक्षा की जा सके।

पर्यावरणीय मुद्दों और चुनौतियों पर जागरूकता बढ़ाने के लिए विभिन्न स्तरों पर नामित अधिकारी जागरूकता कार्यक्रम शुरू कर सकते हैं| जिन्हें समय-समय पर किया जा सकता है| गौरतलब है कि एनजीटी का यह आदेश एयर मार्शल अनिल चोपड़ा द्वारा सशस्त्र बलों के प्रतिष्ठानों में अपशिष्ट प्रबंधन पर दायर आवेदन के जवाब में था। इस मुद्दे पर वायु, थल और नौसेना के संबंध में 10 सितंबर, 2020 को एक स्थिति रिपोर्ट दायर की गई थी।

मेसर्स मेटालिक अलॉयज द्वारा किए प्रदूषण पर छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल ने जारी की रिपोर्ट

मेसर्स मेटालिक अलॉयज द्वारा किए प्रदूषण पर छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी है| मेसर्स मेटालिक अलॉयज छत्तीसगढ़ के रायपुर में इंडस्ट्रियल ग्रोथ सेंटर में स्थित है| इस उद्योग में मैंगनीज, डोलोमाइट, कार्बन पेस्ट और कोक का उपयोग करके कार्बन फेरो मिश्र धातुओं के उत्पादन के लिए 05 एमवीए विद्युत चाप भट्टी स्थापित की हुई थी| जानकारी दी गई है कि यह यूनिट औद्योगिक क्षेत्र में स्थित है और इसमें नियमित पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए छत्तीसगढ़ इस्पात लिमिटेड के साथ एक समझौता किया है। हालांकि किसी भी आपातकालीन स्थिति के लिए उद्योग ने केंद्रीय भूजल प्राधिकरण से बोरवेल के लिए एनओसी भी ली हुई है जोकि 9 अगस्त, 2022 तक वैध है।

छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण बोर्ड ने इस उद्योग से होने वाले उत्सर्जन की निगरानी पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का भी निर्देश दिया था।