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पर्यावरण मुकदमों की साप्ताहिक डायरी: एनजीटी ने वेटलैंड्स पर 30 दिनों के भीतर रिपोर्ट मांगी

यहां पढ़िए पर्यावरण सम्बन्धी मामलों के विषय में अदालती आदेशों का सार

By Susan Chacko, Lalit Maurya

On: Friday 12 June 2020
 

पूर्वी कोलकाता में वेटलैंड्स पर हो रहे अवैध अतिक्रमण के मामले पर एनजीटी में जस्टिस सोनम फेंटसो वांग्दी की पीठ द्वारा सुनवाई की गई। यह मामला वेटलैंडस पर अवैध अतिक्रमण और बिना मंजूरी के इस क्षेत्र में चलाये जा रहे अवैध उद्योगों विशेषकर प्लास्टिक यूनिट्स से जुड़ा हुआ है|

गौरतलब है कि इस मामले को पहली बार एनजीटी में 19 मई, 2016 को उठाया गया था| तब से लेकर अब तक इन अवैध प्लास्टिक इकाइयों को हटाने और गैर क़ानूनी रूप से संचालित की जा रही अन्य बड़ी इकाइयों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर कई दिशा-निर्देश जारी किए गए थे।

इस मामले पर एनजीटी ने निम्न प्रतिवादियों से 30 दिनों के भीतर नई रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है:

  • पश्चिम बंगाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड,
  • उद्योग निदेशालय, पश्चिम बंगाल
  • कोलकाता नगर निगम और उपायुक्त, दक्षिण पूर्व प्रभाग और
  • कोलकाता पुलिस।

14 जुलाई, 2020 को इस मामले पर अगली सुनवाई की जाएगी|


झिंझरिया नदी मामले पर एनजीटी ने दिया संयुक्त समिति के गठन का आदेश

10 जून, 2020 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने प्रदूषित हो रही झिंझरिया नदी के मामले पर एक संयुक्त समिति के गठन का निर्देश दिया है| साथ ही इसके मुहाने पर मौजूद धोबिया तालाब अवैध अतिक्रमण का शिकार हो रहा है| यह तालाब हजारीबाग, झारखंड में है| कोर्ट में दायर याचिका के अनुसार इस नदी धारा की लम्बाई करीब 5 किलोमीटर और चौड़ाई 30 फीट है| अवैध अतिक्रमण और निर्माण के चलते यह अब विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी है| इसके साथ ही धोबिया तालाब की स्थिति भी बहुत ख़राब है| कभी 12 एकड़ में फैला यह तालाब अब सिकुड़ कर केवल 5 से 6 एकड़ का रह गया है|

गौरतलब है कि प्रदूषित झिंझरिया धारा के कारण कोनार नदी का जल भी प्रदूषित हो रहा है| जोकि हजारीबाग शहर के लिए पानी का मुख्य स्रोत है|

ट्रिब्यूनल ने इस नदी और तालाब के आसपास निर्माण और अतिक्रमण पर रोक लगा दी है| साथ ही यह भी आदेश दिया है कि इन जल स्रोतों में ठोस अपशिष्ट को नहीं डाला जायेगा| साथ ही प्रदूषण को रोकने के लिए तालाब और नदी में सीवेज के डालने पर पूरी तरह से रोक लगा दी है| इसके साथ ही उसके आदेश पर सख्ती से पालन करने का भी निर्देश दिया है|


गोमती नदी में हो रहे प्रदूषण पर एनजीटी में दाखिल की गई रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव ने गोमती नदी में हो रहे प्रदूषण पर एक नई रिपोर्ट प्रस्तुत की है| जिसे एनजीटी के आदेश पर जारी किया गया है| इस रिपोर्ट के अनुसार सीपीसीबी ने सीतापुर से लेकर कैथी गांव तक गोमती नदी में कई प्रदूषित स्थानों की पहचान की है| यह स्थान उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में स्थित हैं| जोकि गोमती और गंगा नदी का संगम स्थल भी है|

इस रिपोर्ट को 11 जून को एनजीटी की वेबसाइट पर डाला गया है| जिसके अनुसार इस नदी का करीब 628 किलोमीटर में फैला क्षेत्र प्रदूषित हो चुका है| गौरतलब है कि इस रिपोर्ट का मकसद नदी में प्रदूषित क्षेत्रों की पहचान और उसे रोकने के उपाय करना है|

इस रिपोर्ट को 28 नवंबर, 2019 को उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और शहरी विकास विभाग द्वारा प्रस्तुत किया गया था| जिसके बाद उत्तर प्रदेश के सचिव ने इस पर संज्ञान लेते हुए शहरी विकास विभाग के प्रमुख सचिव को निर्देश दिया कि वो गोमती नदी में हो रहे प्रदूषण को रोकने के लिए तुरंत जरुरी कार्रवाही करे| 

जिसेक अंतर्गत गोरखपुर में गोमती नदी और रामगढ़ ताल में गिरने वाले तमाम नालों का जैविक तरीके से शोधन करना शामिल था| इसके साथ ही सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों (एसटीपी) की स्थापना के लिए भी समय सीमा तय करने का निर्देश दिया गया| जिससे प्रदूषण की सही समय पर रोकथाम की जा सके और समय-समय पर उसकी समीक्षा भी की जा सके|

रिपोर्ट में इस बात की भी जानकर दी गई है कि इस कार्य योजना पर काम चल रहा है| समय-समय पर जिसकी निगरानी उत्तर प्रदेश की नदी कायाकल्प समिति द्वारा की जा रही है| इसके साथ ही पीलीभीत से वाराणसी तक 25 स्थानों पर नदी जल गुणवत्ता की भी नियमित रूप से निगरानी की जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार कई स्थानों पर पानी की गुणवत्ता में सुधार भी आ रहा है| अप्रैल से जून 2019 के बीच 11 में से सात स्थानों पर प्रदूषण के स्तर में कमी दर्ज की गई है|


15 दिन के अंदर प्रवासी मजदूरों को उनके घर भेजने का इंतजाम करें: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को आदेश दिया है कि वो 15 दिनों के अंदर सभी प्रवासी मजदूरों को उनके घर भेजने का इंतजाम करें|  इसके साथ ही 9 जून को जारी इस आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वो प्रवासी मजदूरों पर दर्ज मामलों और शिकायतों को वापस लेने पर विचार करें| इस आदेश में आपदा प्रबंधन अधिनियम की धारा 51 के तहत दर्ज मामलों और शिकायतों को वापस लेने की बात कही गई है|

गौरतलब है कि लॉकडाउन के चलते जब प्रवासी मजदूरों के पास कोई काम और आय का स्रोत नहीं बचा तो ऐसे में वो अपने घरों/ गावों को लौटने को मजबूर हो गए थे| जब ये मजदूरों अपने गांवों को लौटने के लिए सड़कों पर उतरे, तो उनपर लॉकडाउन का उल्लंघन करने के आरोप में आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत मामले और शिकायतें दर्ज की गई थी|

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को उनके अधिकार क्षेत्र में फंसे उन सभी प्रवासी मजदूरों की पहचान करने के लिए आवश्यक कदम उठाने को कहा है जो अपने गांव लौटना चाहते हैं| इसके साथ ही निर्देश दिया है कि उन्हें 15 दिनों के अंदर उनके घरों को भेजने का इंतजाम किया जाये|

इसके अलावा रेलवे को भी 24 घंटों के अंदर प्रवासी मजदूरों के लिए श्रमिक ट्रेनों की व्यवस्था करने को कहा है, जिससे उन्हें असुविधा न हो| इसके साथ ही केंद्र सरकार को उन सभी योजनाओं का विवरण देने के लिए कहा गया है, जो प्रवासी मजदूरों को उनके मूल स्थानों को लौटने में मददगार हो सकती हैं। यह कुछ निर्देश दिए हैं जो सुप्रीम कोर्ट ने लॉकडाउन की वजह से फंसे मजदूरों की पीड़ा को कम करने के लिए जारी किये हैं|

इस बाबत सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी है कि अब तक विशेष श्रमिक ट्रेनों के माध्यम से लगभग 57.22 लाख प्रवासी मजदूरों को उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में उनके गंतव्यों तक पहुंचाया गया है|  साथ ही लगभग 41 लाख प्रवासी श्रमिकों को सड़क के माध्यम से उनके इच्छित स्थान पर भेजा गया है|