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भारत का गहराता जल संकट: प्रदूषण की वजह से जहर पी रहे हैं हम

पूरी दुनिया में उपलब्ध कुल पानी में से महज 0.6 फीसदी ही पीने लायक है। जो नदियों, तालाबों, झीलों में ही मौजूद है। बावजूद इसके ये जलस्रोत जबरदस्त औद्योगिक प्रदूषण के शिकार हैं।

By DTE Staff

On: Saturday 29 June 2019
 
इस ग्राफ में समझिए कि राज्यों में पानी को गंभीर रूप से प्रदूषित करने वाली औद्योगिक इकाइयों की संख्या कितनी है?
इस ग्राफ में समझिए कि राज्यों में पानी को गंभीर रूप से प्रदूषित करने वाली औद्योगिक इकाइयों की संख्या कितनी है? इस ग्राफ में समझिए कि राज्यों में पानी को गंभीर रूप से प्रदूषित करने वाली औद्योगिक इकाइयों की संख्या कितनी है?

पूरी दुनिया में उपलब्ध कुल जल में महज 0.6 फीसदी पानी ही हमारे पीने लायक है। यह पानी हमारी नदियों, तालाबों, झीलों और अन्य जल निकायों में ही मौजूद है। बावजूद इसके इस वक्त हमारे जलस्रोत जबरदस्त औद्योगिक प्रदूषण के शिकार हैं। इसका खामियाजा जल संकट और बीमारियों के रूप में आम लोग झेल रहे हैं। औद्योगिक प्रदूषण के कारण धीरे-धीरे नदियों, तालाबों, झीलों और टैंक में उपलब्ध पानी खतरनाक रसायनों के मिश्रण का घोल बन रहा है। अगर कहें कि घूंट-घूंट में जहर है तो अतिशयोक्ति अतिश्योक्ति नहीं होगी। 

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने अपने अध्ययन में कहा है कि देश की 323 नदियों के 351 हिस्से प्रदूषित हैं। इसके अलावा 17 फीसदी जल निकाय गंभीर तरीके से प्रदूषित हैं। उत्तर से लेकर दक्षिण तक औद्योगिक जल प्रदूषण की शिकायत एक जैसी हो चली है।

जहां दक्षिण की नदियां और जल निकाय तेजी से प्रदूषित हो रहे हैं। वहीं, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, आंध्र प्रदेश व गुजरात में औद्योगिक प्रदूषण की मार सबसे ज्यादा है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने भी हाल ही में अपनी रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि की है कि नदी, तालाब, झील और टैंक तेजी से प्रदूषित होते जा रहे हैं। इनके प्रदूषण की प्रमुख वजह भी गंभीर प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग ही हैं। उत्तराखंड से चलकर यूपी, बिहार, झारखंड, पश्चिम-बंगाल का सफर तय कर बंगाल की खाड़ी तक जाने वाली राष्ट्रीय नदी गंगा भी जगह-जगह औद्योगिक और घरेलू प्रदूषण की शिकार हैं।

सीपीसीबी के मुताबिक करीब 2,500 किलोमीटर की लंबाई में 50 से अधिक हिस्सों में गंगा प्रदूषित हैं। वहीं, सरकार की ओर से बड़ी धनराशि खर्च करने का दावा किए जाने के बावजूद गंगा के प्रदूषण में कोई कमी नहीं आई है। उल्टे गंगा और उसकी सहायक नदियों पर प्रदूषण का दबाव भी बढ़ गया है। नदियों में प्रदूषण रोकने के लिए लगाए गए सीवेज शोधन संयंत्रों की संख्या भी पर्याप्त नहीं है और न ही वे खतरनाक औद्योगिक प्रदूषण का उपचार करने में सक्षम हैं। 

एक तरफ जलस्रोत सिकुड़ रहे हैं और दूसरी तरफ प्रदूषण फैलाने वाली औद्योगिक ईकाइयों की संख्या में वृद्धि हो रही है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के मुताबिक गंभीर प्रदूषण फैलाने वाली करीब 11 फीसदी औद्योगिक ईकाइयां नियमों का पालन भी नहीं कर रही हैं। झारखंड में 87 फीसदी और पंजाब में 60 फीसदी गंभीर प्रदूषण फैलाने वाली औद्योगिक ईकाइयां (जीपीआई) बिना किसी शोधन के अपना कचरा नदियों में गिरा रही हैं। देश में गंभीर प्रदूषण फैलाने वाली औद्योगिक ईकाइयों की संख्या 2497 है। इनमें से 11 फीसदी ईकाइयां नियमों का पालन नहीं कर रही हैं। वहीं, 84 फीसदी औद्योगिक ईकाइयां अकेले चार राज्यों उत्तर प्रदेश, हरियाणा, आंध्र प्रदेश और गुजरात में मौजूद हैं।

क्या है जीपीआई
ऐसी कोई भी औद्योगिक ईकाई जो रोजाना 100 किलोलीटर औद्योगिक अपशिष्ट की निकासी करती हो या फिर पर्यावरण (संरक्षण) कानून 1986 के तहत अधिसूचित खतरनाक रसायनों का उत्पादन, भंडारण व आयात करती हैं, उन्हें ग्रॉस पॉल्यूटिंग इंडस्ट्री कहा जाता है।