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कोख में लड़का या लड़की : 50 हजार रुपये के पैकेज में हो रही अवैध जांच

उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में भ्रूण लिंग जांच और गर्भ से बच्चा गिराने का कुल पैकेज 50 हजार रुपये है। अब भी लड़कियों को इज्जत और कलंक से जोड़ा जाता है।

 
By Vivek Mishra
Last Updated: Thursday 25 July 2019
Photo : Clarius Mobile Health
Photo : Clarius Mobile Health
Photo : Clarius Mobile Health

उत्तर प्रदेश में गैरकानूनी तरीके से भ्रूण लिंग जांच के लिए मोबाइल अल्ट्रासाउंड डिवाइस का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है। यह डिवाइस न सिर्फ आसानी से जेब में पेन की तरह रखा जा सकता है बल्कि इस वायरलेस मशीन को गर्भवती महिला के पेट पर लगाते ही उसके परिणाम मोबाइल या टैब पर डाउनलोड एप में आसानी से दिख जाते हैं। इस काम को ज्यादातर पुराने पैथोलॉजी या एक्सरे के मशीन हैंडलर ही चोरी-छुपे कर रहे हैं। मेरठ में इसके विरुद्द कार्रवाई की गई है जबकि अन्य जिलों में इसके खिलाफ चुप्पी है, जिससे भ्रूण की लिंग जांच और भ्रूण हत्या पर रोकथाम के लिए 1994 में बनाए गए पूर्व गर्भाधान और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (पीसीपीएनडीटी) कानून का पालन भी खतरे में है।

उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से 1 जुलाई 2017 को मुखबिर योजना चलाई गई थी। इसके तहत मेरठ जिले में मुखबिरी पर 11 छापे मारे गए, इनमें पीसीपीएनडीटी प्रभारी की ओर से 9 छापे मारे गए। जो लोग पकड़े गए उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा रही है। हालांकि, जिस पैमाने पर यह काम किया जा रहा है उस पैमाने पर सूचनाएं और छापे सिर्फ आंखों की धूल ही हैं। मेरठ जिले में स्वास्थ्य विभाग के पीसीपीएनडीटी प्रभारी प्रवीण कुमार गौतम डाउन टू अर्थ को बताते हैं कि मोबाइल या टैबलेट से आसानी से जुड़ जाने वाले यह वायरलेस पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीनें थाईलैंड और बैकांक से लाई जा रही हैं। इसकी कीमत करीब साढ़े चार लाख रुपये है। प्रतिदिन 6 से 8 हजार रुपये में किराए पर इसे जिले में चलाया जा रहा है। जबसे छापे पड़े हैं तबसे जिले में कुछ कमी आई लेकिन लोग दूसरे जिलों में ऐसा कराने के लिए भाग रहे हैं। जबकि मेरठ के मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ राजकुमार ने बताया कि 2017 से इसके विरुद्ध कवायद चल रही है। छापे मारे जा रहे हैं। लेकिन यह परेशानी एक मानसिकता की है। इस कारण लड़ाई बड़ी जटिल है।

पीसीपीएनडीटी प्रभारी प्रवीण कुमार गौतम ने कहा कि देश में अब भी लड़कियों को सम्मान और कलंक से जोड़कर देखा जाता है। इसलिए कोख में ही उसकी हत्या कर देने का सिलसिला अभी थमा नहीं है। हरियाणा में सख्ती के बाद यह कुछ कम हुआ था लेकिन मानसिकता की क्या तोड़ होगी। वह कोई न कोई रास्ता खोज ले रही है। वे बताते हैं कि मेरठ में 50 हजार रुपये का पैकेज चल रहा है। 32 हजार रुपये में लड़का-लड़की की गर्भ में जांच और 18 हजार रुपये गर्भ की सफाई का रेट फिक्स किया गया है। हमारी सख्ती के बाद यह कुछ थमा जरूर है लेकिन अब समस्या यह है कि गैरकानूनी जांच करने वाले बुलावे पर सीधे गर्भवती महिला के घर पहुंच जाते हैं। वहां, जांच करके चुपचाप पैसा ले लेते हैं। ऐसे मामलों की मुखबिरी भी मुश्किल है।

उन्होंने बताया कि विभिन्न अल्ट्रासाउंड मशीनों वाली प्रयोगशालाओं में काम करने वाले लोग ही इस काम को चोरी-छिपे अंजाम दे रहे हैं। हमारे सामने सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इसे आसानी से जेबों में रखकर किसी के भी घर आसानी से आया-जाया जा सकता है। अब एक और ताजी तकनीक वाली अल्ट्रासाउंड मशीन आ गई है। मोबाइल ऑन करिए और एक पेननुमा जैसी चीज ही स्कोप का काम करेगी। इसके अलावा माइक्रोचिप भी इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके चलते निगरानी और नियंत्रण बेहद मुश्किल हो गई है। यह सारी मशीनें चीन में एसेंबल की जा रही हैं।

डॉ गौतम बताते हैं कि उत्तर प्रदेश के सभी जिलाधिकारी और पीसीपीएनडीटी प्रभारी को इसके विरुद्ध कदम उठाना होगा। नहीं तो पुरानी मानसिकता के तहत यह काम जारी रहेगा। उन्होंने बताया कि ऐसे मामलों की पकड़ के लिए मुखबिरी योजना को तहत कुल 2 लाख रुपये खर्च किए जाते हैं। इनमें छापे में सहयोग करने वाली गर्भवती महिला को एक लाख रुपये, 60 हजार रुपये मुखबिरी करने वाले को और सहायक को 40 हजार रुपये दिए जाते हैं। स्वास्थ्य विभाग पूरे घटनाक्रम पर नजर रखता है और महिला के सहायक से जांच करने वाले को केमिकल लगे हुए पैसे दिलाता है, जैसे ही जांच करने वाला पैसा लेता है उसे स्वास्थ्य विभाग के जरिए पकड़ लिया जाता है। लेकिन लोगों को पकड़ने का यह तरीका उतना कारगर नहीं रहा। अब गैरकानूनी काम करने वालों ने पैसा सीधा नहीं लेते हैं ताकि वे जांच के दौरान न फंसे।  

भारत दुनिया मे पांचवा सबसे बड़ा मेडिकल डिवाइस का आयात करने वाला देश है। भारत जो भी मेडिकल डिवाइस आयात करता है उसमें करीब 65 फीसदी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण होते हैं। इस तरह के गैर कानूनी और गैरपंजीकृत इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस आखिर भारत में पहुंच कैसे रहे हैं? ऐसे आयात पर नियंत्रण और अंकुश लगाने का काम सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन (सीडीएससीओ) का है। इस बारे में सीडीएससीओ से भी पूछा गया लेकिन उनकी ओर से कोई जवाब नहीं दिया गया। यूरोप और अमेरिका में यह मशीनें आसानी से हर स्टोर पर उपलब्ध हैं। हालांकि, भारत में यह मशीने न तो पंजीकृत हैं और न ही इनका इस्तेमाल कानूनी है।

 

यह मेरठ के स्वास्थ्य विभाग की ओर से डाउन टू अर्थ को उपलब्ध कराया गया वीडियो है। पूछताछ करते पुलिस कर्मी के हाथ में जब्त किया गया वायरलेस अल्ट्रासाउंड मशीन और एप्पल का टैब है, इसी वायरलेस मशीन का सहारा लेकर गर्भवती महिलाओं में प्रसव पूर्व लिंग की पहचान की जा रही है। हाल ही में पकड़े गए सूरज कुमार सिंह नाम के व्यक्ति ने पुलिस पूछताछ में बताया कि वह डॉक्टर सूरज जैन के यहां काम करता था और डॉक्टर की बिना जानकारी चोरी-छुपे छह हजार रुपये मरीज से लेकर यह काम कर रहा था...देखे वीडियो क्लिप

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