Health

भ्रूण लिंग जांचने वाली अवैध मशीनों की ऑनलाइन बिक्री जारी

कहीं भी ले जा सकने वाले नई अल्ट्रासाउंड तकनीकी  का बेजा इस्तेमाल जारी है। बेटियों को खत्म कर देने वाली मानसिकता के लिए यह घातक हथियार बनकर उभर रही है। 

 
By Vivek Mishra
Last Updated: Thursday 01 August 2019
ई कॉमर्स पोर्टल अमेजन पर बिकती अल्ट्रासाउंट मशीन का स्क्रीन शॉट
ई कॉमर्स पोर्टल अमेजन पर बिकती अल्ट्रासाउंट मशीन का स्क्रीन शॉट ई कॉमर्स पोर्टल अमेजन पर बिकती अल्ट्रासाउंट मशीन का स्क्रीन शॉट

गूगल सर्च इंजन पर वायरलेस पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीन को खोजिए। सर्च इंजन पर की गई इस खोज में आपको ऑनलाइन बिक्री वाली ई-कॉमर्स साइट अमेजन पर यह मशीन उपलब्ध मिलेगी। मशीन की पिक्चर और खूबी के साथ अमेजन की साइट पर यह दावा भी किया जा रहा है कि सिफसॉफ कंपनी के वायरलेस पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड स्कैनर मशीन की सिर्फ छह पीस बिक्री के लिए बचे हैं। जल्दी खरीदिए, स्टॉक सीमित है। यह भारत में 1279.99 डॉलर (93351.30 रुपये) में फ्री शिपिंग के जरिए पहुंचा दिया जाएगा। इस उत्पाद के पहुंचने की तारीख होगी एक अगस्त से छह अगस्त के बीच। यानी ऑर्डर करने के भीतर दस दिनों में यह आपके हाथ में होगा।

इस सूचना के साथ अब यह जान लेना जरूरी है कि पीएनडीटी एक्ट के तहत वायरलेस अल्ट्रासाउंड मशीनों का इस्तेमाल भारत में प्रतिबंधित है। साथ ही पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीनों की खरीद और आयात पर अभी तक किसी तरह का नियंत्रण नहीं है। यही वजह है कि भ्रूण की लिंग जांच और भ्रूण हत्या की रोकथाम के लिए 1994 में बनाए गए पूर्व गर्भाधान और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (पीसीपीएनडीटी) कानून भी असरविहीन साबित हो रहा है। क्योंकि नई तकीनीकी वाले अल्ट्रासाउंड से न सिर्फ प्रसव पूर्व लिंग की पहचान की जा रही है बल्कि यह कोख में ही लड़कियों की हत्या का कारण भी बन रहे हैं। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश, हरियाणा और मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों में बेटियों की कोख में हत्या का सिलसिला अभी तक थम नहीं पाया है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में एक पोर्टेबल वायरलेस अल्ट्रासाउंड पकड़ा गया है। यह थाईलैंड से चोरी-छुपे लाया गया था। तकनीकी में सुधार अब बेटियों को खत्म कर देने वाली मानसिकता के लिए घातक हथियार बन रही हैं। (यहां पढें - कोख में लड़का या लड़की : 50 हजार रुपये के पैकेज में हो रही अवैध जांच)

ऑनलाइन अल्ट्रासाउंड की बिक्री को लेकर डाउन टू अर्थ की ओर से की गई खोजबीन में यह पता चला कि इंडिया मार्ट, अलीबाबा जैसी वेबसाइट ऑनलाइन होलसेल दुकानों के जरिए पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीनें आराम से बेच रही हैं। बाहरी मुल्कों से आयात भी कर रही हैं। साथ ही इस्तेमाल की गई अल्ट्रासाउंड मशीनें बेचने में इन्हें यहां कोई दिक्कत नहीं है। इन सारी चीजों को लेकर अभी प्रस्ताव हैं लेकिन कोई पाबंदी और कानून नहीं।

हाल ही में पीएंडडीटी एक्ट के तहत बिक्री करने वालों का रजिस्ट्रेशन किया गया है लेकिन सभी ऑनलाइन विक्रेता रजिस्टर्ड नहीं हैं। इंडियामार्ट पर 1000 पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीनों की मांग की गई। वेबसाइट की तरफ से पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड बिक्री करने वाले कुछ नंबर मुहैया कराए गए। इन्हीं में दिल्ली स्थित त्रिवेणी मेडिकल सिस्टम प्राइवेट लिमिटेड के कंपनी मालिक से बातचीत की गई। कंपनी मालिक ने बताया कि वे खुद पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड डिवाइस बनाते हैं और पीएंडडीटी एक्ट में रजिस्ट्रेशन कराने वाले चिकित्सकों को ही यह मशीन बेचते हैं। उन्होंने बताया कि इसके लिए राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिल चुका है। अब तक 2500 मशीनें बेच चुके हैं। उन्होंने कहा कि पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड से घर जाकर सर्विस देने की यदि आप अनुमति ले आते हैं तो उन्हें मशीनें बेचने में कोई गुरेज नहीं है।

इसी तरह गुरुग्राम में फ्यूजीफिल्म सोनोसाइट प्राइवेट लिमिटेड ने बताया कि वायरलेस अल्ट्रासाउंड मशीन भारत में प्रतिबंधित है। वे भी सिर्फ पोर्टेबल मशीनें बेचते हैं। यह आसानी से पीएंडडीटी एक्ट के प्रमाण पत्र से मिल जाएगा। कंपनियां तो पीएंडडीटी एक्ट देखकर पोर्टेबल मेडिकल डिवाइस बेच रही हैं लेकिन क्या वे इस मेडिकल उपकरण को बेचने की उत्तराधिकारी हैं? यह एक रिक्त स्थान है। इसे लेकर कोई कानून नहीं है। इतना जरूर है कि रजिस्टर्ड कंपनियां सिर्फ उन्हीं डॉक्टर्स को यह मेडिकल उपकरण बेच सकती हैं जिनके पास जिला स्तरीय मुख्य चिकित्सा अधिकारी का प्रमाण पत्र हो। इसके अलावा भले ही मशीनें पोर्टेबल हों लेकिन उनका मूवमेंट क्लीनिक या अस्पताल में ही हो सकता है।

मेडिकल डिवाइस के आयात, निर्माण और बिक्री जैसी गतिविधियों को नियंत्रित करने वाले सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन (सीडीएसओ) के निदेशक एस ईस्वरा रेड्डी ने डाउन टू अर्थ को बताया कि पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड पर कोई नियंत्रण नहीं है। केद्रीय महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय की हालिया बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ गाइडलाइन के तहत लिंग पहचान को रोकने के लिए कुछ प्रावधान हाल ही में किए गए हैं। रेड्डी ने बताया कि सीटी स्कैन, एमआरआई आदि को लेकर हाल ही में अधिसूचना जारी की गई  है लेकिन यह एक जनवरी, 2020 से प्रभावित होंगे। पोर्टेबल और वायरलेस अल्ट्रासाउंड को लेकर अभी कोई प्रयास नहीं किया गया है।

भारत सरकार के 2017 के आंकड़ों के मुताबिक पीसीपीएनडीटी कानून, 1994 का उल्लंघन करने के लिए देश में 3986 कोर्ट के मामले दर्ज हुए। इनमें 2007 अल्ट्रासाउंड मशीनें भी जब्त की गईं। दिसंबर तक 449 लोगों का अपराध सिद्ध हुआ और महज 136 डॉक्टर के लाइसेंस निरस्त किए गए। यदि उत्तर प्रदेश की बात करें तो 2002 से अब तक 190 मामले दर्ज हुए। इनमें  महज 37 मामलों का निस्तारण किया गया। 2011 जनगणना के मुताबिक पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सबसे खराब लिंगानुपात बागपत, गौतमबुद्ध नगर, मेरठ, गाजियाबाद, बुलंदशहर का रहा है। 0 से 6 वर्ष उम्र की श्रेणी में बागपत जिले में 1000 पर 841 लड़कियां जबकि गौतमबुद्ध नगर में 1000 पर 843, गाजियाबाद में 850, मेरठ 852, बुलंदशहर 854 रिकॉर्ड किया गया था।

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