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सवाल सुरक्षा का

ज्यादातर राज्य बांधों की सुरक्षा और मरम्मत के लिए पर्याप्त धनराशि उपलब्ध कराने में नाकाम रहे हैं। इसी वजह से बांधों की विफल होने की घटनाओं में इजाफा हुआ है। 

By Bhagirath Srivas

On: Wednesday 04 December 2019
 
फोटो : विकास चौधरी / सीएसई
फोटो : विकास चौधरी / सीएसई फोटो : विकास चौधरी / सीएसई

दोपहर डेढ़ बजे का वक्त था। विकास शर्मा उस दिन भी अपने गैराज में पंक्चर ठीक कर रहे थे। गर्मी और उमस से बुरा हाल था। तभी अचानक गांव में अफरा-तफरी मच गई। इससे पहले विकास कुछ समझ पाते, उन्होंने खुद को पानी में घिरा पाया। चंद पलों के भीतर कोई कमर तक तो कोई कंधे तक पानी में अचानक डूब गया। लोग अपना सामान जहां-तहां छोड़कर भागे और किसी तरह अपनी जान बचाई।

राजस्थान के झुंझनूं जिले के मलसीसर गांव में 31 मार्च की दोपहर ऐसा ही नजारा था। गांव में तब अचानक हाहाकार गया जब पास में बना बांध भरभराकर टूट गया और उसका पानी गांव में तेजी से घुस आया। विकास बताते हैं कि अचानक पानी देखकर उन्हें कुछ सोचने समझने का मौका नहीं मिला। गैराज का सामान वहीं छोड़कर जान बचाने के लिए वह वहां से किसी तरह भाग निकले। उनके गैराज में करीब 8 फुट पानी भर गया और सारा सामान खराब हो गया। नुकसान के बारे में पूछने पर वह कुछ देर हिसाब लगाकर बताते हैं कि करीब 5 लाख रुपए का नुकसान हो गया।

मलसीसर में ही रहने वाले रफीक हुकुमअली खां के घर में बांध का पानी भरने से दरारें पड़ गई हैं। उन्होंने बताया, “बांध टूटने की सूचना हमें कुछ देर पहले फोन पर मिल गई थी। हमने सामान दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए तुरंत गाड़ी भी मंगा ली थी लेकिन अचानक आए पानी के कारण सामान लोड नहीं कर पाए। सामान को मौके पर छोड़कर ही हमें गांव से भागना पड़ा।”

ग्रामीण उम्मेद सिंह करणावत ने बताया कि गनीमत रही कि बांध दोपहर में टूटा और लोगों को भागने का मौका मिल गया। अगर बांध रात को टूटता तो जानमाल की भारी क्षति होती। उनका कहना है कि बांध में दो दिन से रिसाव हो रहा था लेकिन गांव में अलर्ट जारी नहीं किया गया। वह बताते हैं कि पानी भरने से सभी के सेप्टिक टैंक और सबमरसिबल खराब हो गए हैं। दर्जनों घरों में दरारें आ गईं हैं, कई घरों की दीवारें ढह गई हैं और बिजली से चलने वाले सभी उपकरण खराब हो गए हैं।

ग्रामीण प्रशासन पर नुकसान का गलत आकलन का आरोप लगा रहे हैं। गांव में किराना की दुकान चलाने वाले अजीज सिरोहा बताते हैं, “प्रशासन ने सर्वे में मात्र छह घर प्रभावित बताए हैं। इन लोगों ने भी राहत लेने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि पीड़ितों की संख्या काफी अधिक है। सबको मुआवजा मिलना चाहिए।”

हालांकि एसडीएम अनीता धत्तरवाल ग्रामीणों के आरोप को नकारते हुए कहती हैं कि कुल 26 घर और कुछ बाड़े प्रभावित हैं। सर्वे कर लिस्ट बना ली गई है। उन्होंने बताया कि प्रभावित घरों की विडियोग्राफी की गई है। फिर भी अगर किसी ग्रामीण को लगता है कि उसका नुकसान हुआ तो वह अपना आवेदन दे सकता है। उन्होंने कहा कि बांध टूटने से सरकारी भवनों को भी काफी क्षति पहुंची है।

मलसीसर के पास बना यह बांध इसी साल जनवरी में 588 करोड़ रुपए की लागत से तैयार हुआ था। कुंभाराम लिफ्ट कैनाल परियोजना के तहत इस बांध का निर्माण किया गया था। तारानगर में इंदिरा गांधी नहर से पाइपलाइन के जरिए इस बांध में पानी भरा गया था। 11 मीटर गहरे बांध की क्षमता 15 लाख क्यूबिक मीटर पानी की थी। जब बांध टूटा तब 9 मीटर पानी भरा था। बांध में उस वक्त 4,400 मिलियन लीटर पानी भरा था जिसमें से एक तिहाई बह गया। इस बांध से झुंझनूं और खेतड़ी तहसील के 1,473 गांवों को पीने के पानी की सप्लाई की जानी थी।

<b>तबाही के निशान:  </b>बांध टूटने से पास में  बनी इमारतों को काफी नुकसान पहुंचा। साथ ही कई दिन तक गांव में पानी भरा रहा। अधिकांश घरों में रखा सामान भी खराब हो गया

क्यों टूटा बांध

ग्रामीण बांध टूटने की वजह भ्रष्टाचार और घटिया निर्माण सामग्री को बता रहे हैं। विकास शर्मा बताते हैं कि बांध के निर्माण में पक्का काम नहीं किया गया था, नीचे बालू और मिट्टी भर दी गई थी जबकि ऊपर दिखाने के लिए टाइलें लगा दी गईं। नाम उजागर न करने की शर्त पर बांध बनाने वाली नागार्जुन कंस्ट्रक्शन कंपनी के एक कर्मचारी ने भी दबी जुबान में स्वीकार किया कि बांध के निर्माण में घटिया सामग्री इस्तेमाल की गई थी। हालांकि जिला कलेक्टर दिनेश कुमार यादव इन आरोपों को नकारते हुए बताते हैं कि बांध के अंदर से जो पाइपलाइन डाली गई थी, उसमें तकनीकी खामियां रह गईं।

शायद यह ठीक से नहीं डाली गई। इसी पाइपलाइन के साथ रिसाव शुरू हुआ। यादव के अनुसार, “कंपनी ने लीकेज के बारे में प्रशासन को समय पर जानकारी नहीं दी। बांध टूटने से पानी का जो नुकसान हुआ है, उसके लिए कंपनी पर पौने तीन करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया गया है। इसके अलावा कंपनी पर एफआईआर दर्ज कराई गई है और उसे ब्लैकलिस्ट करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। प्रोजेक्ट मैनेजर बी. प्रसाद को गिरफ्तार कर लिया गया है।”

बांध को नए सिरे से बनाया जाएगा या टूटे हुए हिस्से की मरम्मत की जाएगी? यह सवाल पूछने पर यादव बताते हैं कि लोगों ने ढांचे पर शक जता दिया है। इसलिए सरकार आईआईटी रुड़की के विशेषज्ञों से बांध की जांच कराएगी। उसकी रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। इसके अलावा तीन इंजीनियरों की टीम भी बांध टूटने का कारणों का पता लगाएगी।

राजस्थान में सिंचाई विभाग में कार्यरत एक इंजीनियर ने नाम जाहिर न करने की शर्त पर बताया कि मलसीसर में बने बांध में तकनीकी खामियां थीं। पहली यह कि यह ऊंचाई पर बना था और तमाम प्रशासनिक इमारतें निचले इलाकों में थीं। दूसरी कंपनी ने जलाशय से ट्रीटमेंट प्लांट तक जो पाइपलाइन डाली थी, उसे चारों तरफ से सीमेंट और कंक्रीट से कवर नहीं किया गया। इस कारण रिसाव शुरू हुआ और नमी आने लगी। कंपनी ने शुरू में इसकी अनदेखी की जिसकी वजह से तटबंध टूट गया।

सुरक्षा पर सवाल

मलसीसर में नए नवेले बांध टूटने की घटना ने बांधों की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) की डैम रिहेबिलिटेशन एंड इंप्रूवमेंट (ड्रिप) परियोजना की “डैम सेफ्टी इन इंडिया रिपोर्ट” बताती है कि बड़े बांधों के विफल होने की देश में सर्वाधिक 11 घटनाएं राजस्थान में घटी हैं। सिंचाई विभाग के एक इंजीनियर पहचान गुप्त रखने पर इसकी वजह समझाते हैं “राजस्थान में पहाड़ों में कई बांध हैं और वहां ब्लास्टिंग करके पहाड़ तोड़ा जाता है। बांध बनाने के लिए खनन के सारे कायदे तोड़े जा रहे हैं। नियम है कि निचले इलाकों में 1,500 मीटर तक माइनिंग नहीं होनी चाहिए।

स्रोत: डैम सेफ्टी इन इंडिया रिपोर्ट, केंद्रीय जल आयोग की ड्रिप परियोजना। बांध विफलता के कारणों में बाढ़ के पानी से दरारें पड़ना (44 प्रतिशत), पानी की निकासी की अपर्याप्त व्यवस्था (25 प्रतिशत), त्रुटिपूर्ण पाइपिंग या काम (14 प्रतिशत) और अन्य परेशानियां (17 प्रतिशत) शामिल हैं

लेकिन यहां खनन विभाग ने 150 से 300 मीटर तक लीज दे रखी है। पहाड़ी क्षेत्रों में बांध टूटने की यह सबसे बड़ी वजह है।” वह बताते हैं कि रेतीली इलाकों में बांधों के टूटने की वजह लापरवाही और अनेदखी है। राजस्थान के जल संसाधन विभाग में बांधों के लिए कोई निगरानी तंत्र नहीं है। इसके लिए स्टाफ ही नहीं है।”

सीडब्ल्यूसी की रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान के बाद मध्य प्रदेश में 10 और गुजरात में बड़े बाधों के असफल होने की पांच घटनाएं हुई हैं। 2001 से 2010 के बीच देश में बांध की असफलता के नौ मामले सामने आए (देखें विफलता का दायरा)। इससे पहले 1951 से 1960 की अवधि में ही इससे ज्यादा 10 घटनाएं हुईं थीं। 1961-70 तक सात, 1971-80 तक तीन, 1981-90 तक एक और 1991-2000 के बीच बांध विफलता के तीन मामले सामने आए। रिपोर्ट बताती है कि अधिकांश बांध उस वक्त टूट गए जब उनमें पूरी क्षमता में पानी भरा गया। मलसीसर में बांध इसी कारण टूटा।

इससे पता चलता है कि बांध के डिजाइन में खोट था या उसमें घटिया निर्माण सामग्री इस्तेमाल की गई थी। बांध विफलता की 44.44 प्रतिशत घटनाएं बांध बनने के 0-5 वर्ष की अवधि के दौरान घटीं। देशभर में ऐसे कुल 16 मामले सामने आए हैं। पिछले साल 19 सितंबर को बिहार के भागलपुर के कहलगांव में बना बांध उद्घाटन से महज एक दिन पहले टूट गया था। यह बांध 389 करोड़ रुपए की लागत से बना था। रिपोर्ट के अनुसार, ज्यादातर राज्य बांधों की सुरक्षा और मरम्मत के लिए पर्याप्त धनराशि उपलब्ध कराने में नाकाम रहे हैं।

बांध को सुरक्षित रखने के लिए इन राज्यों के पास तकनीकी और संस्थागत क्षमताएं भी नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, बांध विफलता के मुख्य कारणों में अचानक आए बाढ़ के पानी से दरारें पड़ना (44 प्रतिशत), पानी की निकासी की अपर्याप्त व्यवस्था (25 प्रतिशत), त्रुटिपूर्ण पाइपिंग या काम (14 प्रतिशत) और अन्य परेशानियां (17 प्रतिशत) हैं।

सीडब्ल्यूसी की रिपोर्ट ही नहीं बल्कि नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट भी बांधों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करती है। पिछले साल जारी की गई सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार, 4,862 बडे बांधों में केवल 349 बांधों यानी महज सात फीसदी में ही आपातकालीन आपदा कार्य योजना मौजूद थी। केवल 231 बांधों (कुल बांधों का पांच प्रतिशत) पर ऑपरेटिंग मैनुअल मौजूद थे। सीएजी ने पाया कि 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में केवल दो ने ही मानसून से पहले बाद में बांधों की पूरी जांच कराई और केवल तीन राज्यों ने आंशिक जांच की जबकि 12 राज्यों ने ऐसा नहीं किया।

सीएजी ने कई बड़े बांधों की सुरक्षा में बड़ी चूकें पाईं। रिपोर्ट के अनुसार, बांध सुरक्षा पर कानून बनाने के लिए अगस्त 2010 में केंद्र सरकार ने बांध सुरक्षा विधेयक संसद में पेश किया था। इस विधेयक को सुझावों और संशोधनों के लिए पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमिटी के पास भेज दिया गया। बाद में बिल से हाथ खींच लिए गए और संसद में संशोधित विधेयक पेश किया गया। लेकिन इसके बाद 15वीं लोकसभा का कार्यकाल खत्म हो गया और विधेयक भी।

नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े राहुल यादव बांधों पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए बताते हैं “पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने बांधों को विकास का प्रतीक बताया था और देश भर में बड़ी-बड़ी बांध परियोजनाओं की आधारशिला रखी थी। जिस मकसद से बांध बने थे, वे मकसद कभी पूरे ही नहीं हुए। इन बांधों से न तो किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिल पाया और न ही पीने के पानी का इंतजाम हुआ”। उन्होंने बताया कि हर बांध की एक क्षमता और अवधि होती है। उसके अनुसार योजनाएं नहीं बनतीं। इसी वजह से बांध टूटने की घटनाएं सामने आती हैं। वह बांधों की जरूरत का विश्लेषण करने की वकालत करते हुए बताते हैं “बांध के बजाय छोटे-छोटे चेकडैम बनाने और तालाबों, कुओं व नदियों को पुनर्जीवित करने की जरूरत है। तालाब और छोटी नदियों के संरक्षण के लिए ग्रामीण स्तर पर समिति बननी चाहिए।” उनका कहना है कि बड़े बांध निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के मकसद से भी बनाए जाते हैं। कंपनियां ज्यादा मुनाफे के लिए घटिया निर्माण सामग्री इस्तेमाल करती है और बांधों की प्रशासनिक स्तर पर निगरानी नहीं की जाती। 


पर्यावरणविदों और बांध सुरक्षा की तमाम चिंताओं के बीच सरकारों का बांध प्रेम कम नहीं हो रहा है। यही वजह है कि भारत में चीन और अमेरिका के बाद विश्व से सबसे ज्यादा बांध हैं। नेशनल रजिस्टर ऑफ लार्ज डैम्स (एनआरएलडी) की 2017 की रिपोर्ट के अनुसार, देश में 5,254 बड़े बांध बन चुके हैं और 447 निर्माणाधीन हैं। इन बांधों के पानी भंडारण की क्षमता 253 बीसीएम (बिलियन क्यूबिक मीटर है)। अन्य 51 बीसीएम क्षमता भंडारण के लिए बांधों का कार्य प्रगति पर है।

बांधों का अध्ययन करने वाले पर्यावरणविद रामप्रताप गुप्ता बताते हैं कि देश में ज्यादातर बांध असफल हो चुके हैं। जल दोहन की गलत तकनीक के कारण बांधों में पानी का स्तर कम होता जा रहा है। वह बताते हैं कि जो लोग बांध बनाते हैं कि वे किसी जलग्रहण क्षेत्र का पानी आगे स्थानांतरित कर देते हैं। इससे एक क्षेत्र पानी से वंचित हो जाता है जबकि दूसरे क्षेत्र में पानी की उपलब्धता दोगुनी हो जाती है।

चंबल नदी पर बने गांधी सागर बांध का उदाहरण देते हुए वह बताते हैं कि इस बांध के लिए पानी सुनिश्चित करने के लिए वर्षा के जल के संग्रहण के लिए क्षेत्र में किसी संरचना पर प्रतिबंध लगाया गया है। इससे क्षेत्र बंजर बनता जा रहा है। गांधी सागर बांध भी 8-9 वर्ष में एक बार ही भर पाता है। उनके अनुसार, इस बांध ने क्षेत्र में हजारों तालाब सुखा दिए जिन पर लोग निर्भर थे। गुप्ता गांधी सागर परियोजना को समाप्त करने की वकालत करते हैं।

“हिमाचल प्रदेश के जनसंघर्ष” पुस्तक में जितेंद्र सिंह चाहर लिखते हैं “हमारे देश में बने 9.2 प्रतिशत बांधों में दरारें पड़ चुकी हैं जो दुनिया के औसत से दोगुने से ज्यादा है। देश में 435 बांधों में से 13 एकदम नाकामयाब रहे हैं।” वह आगे लिखते हैं “बांधों के कारण बड़े क्षेत्र डूब में आएंगे, जंगल नष्ट होंगे, भूकंप की संभावना बढ़ेगी, भूस्खलन होना, जैव विविधता खत्म होगी और जल की गुणवत्ता में जो कमी होगी उसकी पूर्ति असंभव है।”

किताब के अनुसार, “हिमाचल प्रदेश में 300 से अधिक स्थल विभिन्न परियोजनाओं के लिए चिन्हित कर लिए गए हैं और दर्जनों पर काम शुरू हो चुका है। एक ही नदी को 100-150 किलोमीटर के दायरे में बार-बार बांधा जा रहा है और सुरंगों से निकाला जा रहा है। नदी के नैसर्गिक प्रवाह के साथ छेड़छाड़ की जा रही है। बिना सबक सीखे बांध बनाने की बदहवास दौड़ जारी है।”