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उत्तराखंड की जल विद्युत परियोजनाओं के बारे में क्या कहते हैं लोग, एक अध्ययन

उत्तराखंड की जल विद्युत परियोजनाओं से प्रभावित लोगों से बातचीत पर आधारित अध्ययन में कई अहम पहलू सामने आए

On: Wednesday 10 February 2021
 
Photo: wikimedia commons
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गिरीश नेगी

ऊर्जा आर्थिक एवं सामाजिक विकास के लिए एक आवश्यक एवं महत्वपूर्ण निवेष है। भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी विद्युत ऊर्जा उपभोक्ता वाला देश है, जो भारत की 2015 के ऊर्जा सांख्यिकी के अनुसार दुनिया की कुल वार्षिक ऊर्जा खपत का लगभग 4.4 प्रतिशत  है। भारत के केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के आकङों के अनुसार, विश्व में प्रति व्यक्ति 2873 किलोवाट प्रति घंटा विद्युत ऊर्जा खपत की तुलना में भारत में प्रति व्यक्ति ऊर्जा खपत अभी भी बहुत कम (1010 किलोवाट प्रति घंटा) है, और इस विद्युत खपत को सामाजिक - आर्थिक विकास के लिए बढ़ाने की आवश्यकता है।

भारत वर्तमान में अपने सकल बिजली उत्पादन का लगभग 63 फीसदी तापीय ऊर्जा प्लांटों से और लगभग 24 फीसदी जल-विद्युत परियोजनाओं (ज.वि.प.) से उत्पन्न करता है, जो मुख्य रूप से भारतीय हिमालयी क्षेत्र में स्थित हैं। भारतवर्ष में विद्युत ऊर्जा की पूर्ति में अक्षय ऊर्जा एवं ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों में से जल-विद्युत ऊर्जा पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ किफायती एवं सामाजिक-आर्थिक विकास हेतु भी अनुकूल साबित हो सकती है।

उत्तराखंड राज्य में मौजूद, ग्लेशियर एवं बर्फानी नदियों से लगभग 20,000 मेगावाट जल-विद्युत क्षमता उत्पन्न होने का अनुमान है, हालांकि इस क्षमता का लगभग 4000 मेगावाट ही अब तक विकसित कर उपयोग में लाया जा सका है, अतः इन नदियों की एक बड़ी ऊर्जा क्षमता को अभी भी उपयोग में लाना बाकी है। उत्तराखण्ड में वर्तमान में, 25 जल-विद्युत परियोजना (6 मध्यम एवं 19 लघु) 2378 मेगावाट क्षमता के साथ निर्माणरत चरण में हैं, तथा 21,213 मेगावाट क्षमता वाली 197 जल-विद्युत परियोजनाएं उत्तराखंड के विभिन्न नदी घाटियों में प्रस्तावित हैं।

इस क्षेत्र के संवेदनशील पर्यावरणीय परिवेश को संरक्षित करने हेतु इन नदी घाटी परियोजनाओं में से उत्तरकाषी जिले में धराॅसू से गंगोत्री के बीच संपूर्ण भागीरथी नदी के जलग्रहण क्षेत्र को पर्यावरण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा राजपत्र अधिसूचना संख्या 2429 दिनांक 18 दिसंबर 2012 के अन्र्तगत पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र के रूप में घोषित किया गया। जिसके अनुपालन में भागीरथी नदी घाटी के तीन प्रमुख भावी प्रस्तावित/निर्माणाधीन ज.वि.प., पाला मनेरी, भैरोंघाटी; दोनों प्रस्तावित एवं लोहारीनाग पाला (निर्माणाधीन) का निर्माण कार्य रोक दिया गया था।
भारतीय हिमालयी क्षेत्र में ज.वि.प. का निर्माण विवादास्पद रहा है अत्एव पर्यावरण तथा सामाजिक सरोकारों के प्रति जवाबदेही हेतु इन परियोजनाओं पर सामूहिक चर्चा आवश्यक है।

इस विषय पर प्रकाशित साहित्य में जल विद्युत परियोजनाओं के प्रभाव पर स्थानीय लोगों एवं अन्य हितधारकों की धारणाएं सामाजिक ताने-बाने में परिवर्तन, जनसांख्यिकी बदलाव वनों, जैव विविधता व कृषि भूमि के नुकसान पर केन्द्रित रहीं है। अतः प्रमुख सुझावों में इन प्रभावों को न्यून्तम रखनें हेतु ज.वि.प. के निर्माण के दौरान पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन को सम्मिलित करते हुए स्थानीय लोगों के हितों का ध्यान रखे जाने की जरूरत महसूस की जाती रही है।

उत्तराखंड में टिहरी ज.वि.प. के अलावा अन्य ज.वि.प. के सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभावों पर भारतीय हिमालयी क्षेत्र से कई रिपोर्टें उपलब्ध हैं। एक सर्वाधिक चर्चित रिपोर्ट में दिल्ली विष्वविद्यालय के पंडित एवं ग्रुम्बिन (2012) ने मॉडलिंग का उपयोग करते हुए भारतीय हिमालय क्षेत्र में 292 बांधों (निर्माणाधीन और प्रस्तावित) का वर्गीकरण करके अनुमान लगाया कि इन परियोजनाओं से 54,117 हेक्टेयर वन क्षेत्र जलमग्न हो जाएगा एवं 114,361 हेक्टेयर क्षेत्र बांध से संबंधित गतिविधियों से क्षतिग्रस्त हो जाएगा, जिसके परिणामस्वरूप वर्ष 2025 तक 22 पुष्पीय पौंधों एवं 7 कशेरुकीय जन्तु प्रजातियां विलुप्त हो जाएंगी।

हालांकि, इस संदर्भ में गढवाल वि. वि. के पूर्व कुलपति एवं प्रसिद्ध वनस्पति विज्ञानी प्रो. एस. पी. सिंह व डाॅ. थडानी (2015) का मत है कि पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन अध्ययन हेतु कमजोर कार्यप्रणाली एवं जमीनी स्तर पर अध्ययन आधारित अपर्याप्त आकङों का उपयोग किया जाता है, जिससे ज.वि.प. के प्रभावों की सटीकता का स्तर बहस योग्य हो जाता है।

अतः पर्यावरणीय प्रभावों की बेहतर निगरानी के लिए अधिकाधिक जमीनी सच्चाई पर आधारित आकङों के आदान-प्रदान की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। कुल मिलाकर, भारतीय हिमालयी क्षेत्र में बड़े बांधों के निर्माण के बजाय लघु पनबिजली परियोजनाओं के लिए स्थानीय निवासियों एवं पर्यावरणविदों में एक आम सहमति बनती प्रतीत होती है।

प्रस्तुत लेख उत्तराखंड की भागीरथी नदी में निर्माणाधीन एवं प्रस्तावित तीन ज.वि.प. क्रमषः लोहारीनाग पाला (600 मेगावाट निर्माणाधीन), मनेरी भाली फेज-प् (90 मेगावाट) एवं मनेरी भाली फेज-प्प् (304 मेगावाट) दोनों विद्युत उत्पादन कर रही ज.वि.प. में से प्रथम निर्माणाधीन ज.वि.प. को माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेष द्वारा रोकने के एक वर्ष बाद सकारात्मक एवं नकारात्मक पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का 140 परियोजनाओं प्रभावित परिवारों की धारणा पर पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रायोजित पायलट अध्ययन के तहत लेखक की टीम द्वारा 2009-10 में किये गये शोध कार्य पर आधारित है।

भागीरथी नदी के तट पर स्थित उत्तरकाशी जिले का मुख्यालय उत्तरकाशी नगर सामाजिक-राजनीतिक एवं व्यावसायिक गतिविधियों का केंद्र हैए एवं ऐतिहासिक रूप से एक समृद्ध पौराणिक एवं धार्मिक केन्द्र रहा है। उत्तराखण्ड के अन्य क्षेत्रों की भाॅति बार-बार भूगर्भीय हलचलों के कारण यह क्षेत्र पर्यावरणीय आपदाओं हेतु अत्यधिक संवेदनषील है। इस संदर्भ में अक्टूबर 1991 में आये उत्तरकाषी भूकम्प का स्मरण करना आवश्यक होगा जिसमें लगभग 768 से भी अधिक लोगों की जान चली गयी थी एवं चल- अचल सम्पति को लगभग 6 करोङ डालर की क्षति हुई थी। यह क्षेत्र भागीरथी नदी की मत्स्य विविधता सहित वनस्पतियों और जीवों की विविधता में भी समृद्ध है।

भागीरथी नदी गंगोत्री ग्लेशियर के गौमुख (ऊंचाई 3892 मीटर) से निकलती है एवं कई सहायक नदियों के जल प्रवाह को समेटे हुए टिहरी जिले के देवप्रयाग में एक प्रमुख हिमानी नदी (अलकनंदा नदी) के साथ मिलकर आगे गंगा नदी कहलाती है। भागीरथी नदी अपनी पौराणिक मान्यताओं के लिए पूजनीय है। साल भर भागीरथी नदी के किनारे कई मेले, त्यौहार (जैसे, कंडारी देवता/डोलियाँ) एवं अनुष्ठान किए जाते हैं। गंगा नदी के आत्म-शुद्धिकरण, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक महत्व को स्वीकार करते हुए, इसे वर्ष 2008 में भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया था।

इस नदी पर बाँध और नहर बनाकर ज.वि.प. हेतु जल के प्राकृतिक बहाव को रोकने पर पर्यावरणविदों एवं स्थानीय लोगों की गहरी सामाजिक-सांस्कृतिक एवं धार्मिक लोकाचार में बाधा के रूप में देखा जा रहा है। भागीरथी नदी घाटी क्षेत्र में धरासूॅ से गंगोत्री के बीच 23 ज.वि.प. (सूक्ष्म से मध्यम परियोजनाओं) निर्माणरत् या प्रस्तावित है। उनमें से, 18 ज.वि.प. भागीरथी नदी की सहायक नदीयों/उपनदियों पर प्रस्तावित हैं, जबकि केवल 5 ज.वि.प. (सभी मध्यम आकार) भागीरथी नदी पर प्रस्तावित हैं। इनमें से केवल दो ज.वि.प. (मनेरी भाली स्टेज-एक एवं मनेरी भाली स्टेज-दो) का निर्माण पूर्व में ही किया जा चुका था जो कि वर्तमान में विद्युत पैदा कर रही है। जबकि लोहारीनाग पाला ज.वि.प. वर्ष 2009 की शुरुआत में निर्माण चरण में थी एवं उच्चतम न्यायालय के निर्देशानुसार इसका निर्माण रोक दिया गया था।

मनेरी भाली फेेज-एक (90 मेगावाट) जल विद्युत परियोजना में वर्ष 1984 में विद्युत उत्पादन शुरू हो गया था, जिससे विगत 35 वर्षों से बिजली का उत्पादन किया जा रहा है। इस जल विद्युत परियोजना के अंतर्गत (आंशिक/पूर्णतया) परियोजना-प्रभावित गांवों में जामक, हीना, सिरोर एवं मनेरी शामिल हैं। इस परियोजना के अंतर्गत भागीरथी नदी पर बने मनेरी बांध (39 मीटर ऊँचा और 127 मीटर चौड़ा) के पानी को 8.6 किलोमीटर लंबी 4.75 मीटर गोलाई की उच्च दबाव वाली सुरंग से रन-ऑफ-द-रिवर विधि से 90 मेगावाट क्षमता वाली तिलोथ विद्युत गृह (उत्तरकाषी) को जल आपूर्ति करती है।

तिलोथ विद्युत गृह पर यह जल पुनः भागीरथी नदी में प्रवाहित हो जाता है जो कि मनेरी भाली स्टेज-दो परियोजना (स्थापित क्षमता 4 × 76 त्र 304 मेगावाट) के उत्तरकाषी नगर के पास बने 81 मीटर ऊंचें बांध में जमा होकर 16 किमी लंबी एवं 6 मीटर व्यास वाली सुरंग से धरासू बिजली घर तक ले जाया जाता है एवं यह जल आगे पुनः भागीरथी नदी में मिलकर टिहरी जल विद्युत परियोजना में प्रयुक्त हो जाता है।

इस परियोजना से 2008 में विद्युत उत्पादन शुरू हो गया था एवं इससे पिछले 10 वर्षों से बिजली का उत्पादन किया जा रहा है। इसके अंतर्गत प्रभावित (आंशिक/पूर्ण रूप से) ग्रामों में पुजार, गुयाना, ढुंगी, सिंगुडी, कुरीगाड और दयाली शामिल हैं। लोहारीनाग पाला रन-ऑफ-द-रिवर निर्माणाधीन परियोजना (150 × 4: 600 मेगावाट) हेतु भागीरथी नदी पर 8 मीटर ऊंची जलधारा मोड़ने हेतु एक संरचना प्रस्तावित है, जो भागीरथी नदी के जल को सुरंग से लोहारीनाग से पाला बिजली घर तक ले जाने हेतु निर्मित होनी थी।

इस परियोजना की 2006 में हुई निर्माण गतिविधियाँ लगभग आधी हो चुकने के बाद इसे पर्यावरणविदों के भारी विरोध के कारण वर्ष 2009 में रोक दिया गया और इसे अंततः 2010 में मा0 सुप्रीम कोर्ट के आदेषानुसार इसे बंद कर दिया गया था। इसके अंतर्गत 12 आंशिक व पूर्ण रूप से प्रभावित गांवों में सुक्की, सुनगढ, कुॅजन, पाला, भटवाङी, भुकी, भंगेली, तेहार, बर्सू, क्यार्की, सालंग और हुर्री शामिल हैं।

लेखक एवं उनकी टीम द्वारा उपरोक्त तीन परियोजनाओं के पर्यावरणीय एवं सामाजिक-आर्थिक प्रभावों पर लोगों की धारणा को समझने के लिए परियोजना प्रभावित गांवों के परिवारों में गहन साक्षात्कार एवं फोकस समूह चर्चा (एफजीडी) सहित अन्य अनुसंधान विधियां प्रयुक्त की गईं जिसमें परियोजनाओं के विभिन्न सामाजिक-आर्थिक एवं पर्यावरणीय प्रभावों के बारे में चिंताओं और धारणाओं पर आधारित 33 प्रभावों (नकारात्मक/सकारात्मक) की एक चेकलिस्ट तैयार की गई, जिनमेंः (1) जैव विविधता प्रभाव (8 बिन्दु), (2) पर्यावरणीय प्रभाव (12 बिन्दु ं), (3) सामाजिक-आर्थिक प्रभाव (8 बिन्दुं) एवं (4) सांस्कृतिक प्रभाव (5 बिन्दु) शामिल थे।

हमारी परियोजना टीम ने उपरोक्त तीन परियोजनाओं के विभिन्न ग्रामों में 140 परियोजना-प्रभावित लोगों के बीच इस चेकलिस्ट को लेकर व्यक्तिगत संवाद किया। इसके अतिरिक्त हमने इन ज.वि.प के स्थानीय कार्यालयों में दस्तावेजों का अध्ययन एवं उपलब्ध ज.वि.प. कर्मियों से भी साक्षात्कार किया। अतः व्यक्तिगत साक्षात्कार पर आधारित उत्तरदाताओं द्वारा बताऐ गए इन प्रभावों की (सूची “सकारात्मक“/“नकारात्मक“ प्रभाव/कोई प्रभाव नहीं/ पता नहीं) चार श्रेणियों में संकलित की गई।

इसके अलावा, उपरोक्त सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभावों का परियोजनाओं से सम्बन्ध होने पर उत्तरदाताओं की प्रतिक्रिया “हाँ“ या “नहीं“ में दर्ज की गई एवं पूर्वाग्रह को कम करने के लिए तीन परियोजना में से दो हां या नहीं को “निर्णायक“ माना गया। अध्ययन से प्राप्त आकङों एवं निष्कर्ष को परियोजनाओं के अनुसार निम्नवत प्रस्तुत किया गया है।

मनेरी भाली स्टेज-एक 

इस परियोजना के 38 प्रभावित परिवारों के 55-73 प्रतिशत उत्तरदाताओं की धारणा थी कि वन्य आवास विखंडन (73 प्रतशित), चारागाह (68%), वनस्पतियां एवं वन्य जीवों की आबादी (55%) जल विद्युत परियोजना से प्रभावित नहीं हुए हैं। क्योंकि यह परियोजना आज से लगभग 35 वर्ष पूर्व बनी थी, अतः वरिष्ठ नागरिकों के अनुसार इस ज.वि.प के निर्माण चरण के दौरान वनस्पतियों में कुछ नुकसान देखा गया जो कि अब स्थिर है, अपितु परियोजना अधिकारियों द्वारा किये गये वृक्षारोपण के कारण भी वनस्पतियों में वृद्धि हुई।

पुनः 42-55 प्रतशित लोगों की धारणा थी कि परियोजना के कर्मचारियों द्वारा दूध और सब्जियों की अधिक मांग के कारण विशेष रूप से पशुधन एवं कृषि कार्य में वृद्धि हुई। परियोजना-प्रभावित लोगों के आधे से अधिक (52 प्रतिशत) ने परियोजना के बांध के कारण मछलियों की विविधता में भी वृद्धि की बात कही।

शत-प्रतिषत ग्रामीणों के अनुसार विशेष रूप से सर्दियों के दौरान नदी के प्रवाह में कमी के कारण नदी तट की ओर बढ़ती हुई मानव गतिविधियों को मुख्य नकारात्मक प्रभावों में माना गया। परियोजना में कार्यरत बाह्य लोगों के आने से चोरी की घटनाओं एवं सांस्कृतिक संक्रमण जैसी सामाजिक बुराइयों में वृद्धि को भी नकारात्मक प्रभावों के संदर्भ में 71 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा महसूस किया गया।

अन्य नकारात्मक प्रभावों में 60-95 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा भागीरथी घाटी में वर्षा (82 प्रतिशत) एवं प्राकृतिक सौंदर्य (74 प्रतिशत) में कमी तथा तापमान (95%), जल प्रदूषण (76%) एवं वायु प्रदूषण (60%) में वृद्धि के रूप में इंगित की गई। फोकल समूह चर्चा से ज्ञात हुआ कि ज.वि.प का निर्माण चरण समाप्त होने के बाद, वायु और ध्वनि प्रदूषण निर्णायक रूप से कम हो गया है।

दिलचस्प बात यह है कि परियोजना-प्रभावित लोगों द्वारा जल विद्युत परियोजना का कोई भी ठोस नकारात्मक सामाजिक-आर्थिक प्रभाव महसूस नहीं किया गया। इसके बजाय, 79-82 प्रतिशत लोगों ने परियोजना और उससे संबंधित गतिविधियों के कारण सार्वजनिक सुविधाओं में वृद्धि (84%), पर्यटन (82%) और जीवन स्तर में सुधार (79%) जैसे सकारात्मक प्रभाव का पक्ष लिया।

हमने देखा कि इस परियोजना का गाद निष्कासन स्थल स्थानीय लोगों के लिए एक पर्यटन स्थल बन गया है जहां पर स्थानीय बेरोजगार युवाओं द्वारा दो दुकानें खोली गई हैं। जल विद्युत परियोजना के उल्लेखनीय सकारात्मक सांस्कृतिक प्रभावों में 79-95 प्रतिशत लोगों द्वारा पर्यावरणीय जागरूकता (95%) एवं धार्मिक त्योहारों (79%) में वृद्धि महसूस की गई।

मनेरी भाली स्टेज- दो 

इसके प्रभाव क्षेत्र के अंतर्गत छह गांवों के 59 परिवारों के 49-83 प्रतिशत उत्तरदाताओं की धारणा के अनुसार जैव विविधता पर उल्लेखनीय नकारात्मक प्रभावों में पहाड़ी ढलानों पर परिेयोजना हेतु सम्पर्क मार्ग निर्माण से उत्पन्न मलवे के पर्वतों के ढाल पर निस्तारण के कारण वनस्पतियों/जीवों (83%), कृषि (83%), चारागाह भूमि (77%), वन्यजीव आबादी में कमी (56%), प्राकृतिक आवास के विखंडन (48%) एवं खरपतवारों में वृद्धि (49%) को माना गया।

उन्होंने शिकायत की कि परियोजना के बांध से अचानक जल बहाव के कारण कभी-कभी नदी के तट पर निचले क्षेत्रों में चराई/पानी पीने के लिए आने वाले पालतू पशु बह जाते हैं। इन लोगों में से 22-37 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने मनेरी भाली परियोजना के जलाशय के आसपास नए पक्षियों की उपस्थिति (22%) और मत्स्य विविधता (37%) में वृद्धि को सकारात्मक प्रभाव के रूप में स्वीकार किया।

हालांकि, 39 प्रतिशत परियोजना-प्रभावित लोगों ने कहा कि नदी के प्रवाह में गिरावट से मछली पकड़ने के अवसरों में वृद्धि के कारण मछलियों कि प्रजातियां घट रही है। इनके द्वारा इंगित प्रमुख नकारात्मक पर्यावरणीय प्रभावों में, जल प्रदूषण (100% ), भागीरथी नदी के जल प्रवाह में कमी (90%), नदी घाटी की सुन्दरता में कमी (90%), वर्षा की मात्रा में कमी (83%) एवं वायु प्रदूषण (85%), ध्वनि प्रदूषण (81%), वायु तापमान (78%), नदी किनारों के मृदा अपरदन (68%), भूस्खलन (63%) तथा नदी के तट से रेत और पत्थर का उत्खनन (62%) एवं नदी तट में मानव जनित गंदगी में वृद्धि (58%) को स्वीकार किया गया।

प्रमुख सकारात्मक सामाजिक-आर्थिक प्रभावों में 56-75ः उत्तरदाताओं द्वारा परिवहन के साधनों (75%), दूरसंचार (63%), चिकित्सा, शिक्षा एवं सार्वजनिक-सुविधाओं में वृद्धि (56%) के रूप में महसूस की गई। लेकिन इन सुविधाओं का ज.वि.प. के साथ कोई संबंध होना नहीं बताया गया। एमबी-प्प् ज.वि.प. के भाली बांध जलाशय के कारण पर्यटन में वृद्धि को 51ः परियोजना-प्रभावित लोगों द्वारा स्वीकार किया गया। उल्लेखनीय नकारात्मक सांस्कृतिक प्रभावों में, धार्मिक त्योहारों (53%) और भागीरथी नदी के प्रति श्रद्धा में कमी (50%) को स्वीकार किया गया। लेकिन इन्हीं में से 72ः उत्तरदाताओं ने पर्यावरण जागरूकता में वृद्धि को परियोजना का सकारात्मक प्रभाव माना।

लोहारीनाग पाला ज.वि.प. के प्रभाव क्षेत्र में पड़ने वाले 12 गाँवों में स्थित 43 परियोजना-प्रभावित परिवारों की धारणा के आधार पर 51-84ः उत्तरदाताओं ने जैव विविधता पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों में, वनस्पतियों/जीवों (84%), कृषि (81%), चारागाह भूमि (77%) एवं वन्यजीवों की आबादी में कमी (53%), वन्य जीव निवास स्थान विखंडन (53%) एवं खरपतवार में वृद्धि (51%) को माना गया।

हालांकि, चरागाह भूमि में कमी के विपरीत, परियोजना-प्रभावित 65% लोगों ने स्वीकार किया कि पशुधन की आबादी स्थिर बनी हुई है। वन्य जीवों हेतु भोजन तथा जल की कमी के कारण वन्यजीव आबादी में आई गिरावट को 50ः से अधिक उत्तरदाताओं ने नकारात्मक प्रभाव के रूप में महसूस किया। अन्य नकारात्मक पर्यावरणीय प्रभावों में 84-100% उत्तरदाताओं ने नदी के जल (100%), वायु (88%) एवं ध्वनि प्रदूषण (84%) में वृद्धि, परियोजना में कार्यरत स्टोन क्रशर से उत्पन्न धूल, निर्माण सामग्री के परिवहन के लिए बड़े वाहनों की आवाजाही एवं ईंधन दहन से उत्पन्न धुआ, सड़क निर्माण हेतु चट्टानों में ब्लास्टिंग इत्यादि कारण बतलाये गये।

इसके अलावा, भागीरथी नदी की जलराषि में कमी से उत्पन्न हुई मानव की समीपता के कारण नदी तट पर बढ रहे अतिक्रमण और घाटी की सौंदर्यता में आई गिरावट क्रमशः 76-86% परियोजना-प्रभावित लोगों की चिंता थी। पुनः 63-77% उत्तरदाताओं द्वारा वर्षा की मात्रा में कमी (77%), हवा के तापमान में वृद्धि (72%), मिट्टी के कटाव में एवं, भूस्खलन में वृद्धि (65%) एवं पहाड़ी ढलानों पर निर्माण का मलबा गिरने के कारण नदी में गंदगी (63 प्रतिशत) को भी परियोजना के महत्वपूर्ण नकारात्मक प्रभावों से जोड़ा।

सकारात्मक सामाजिक-आर्थिक प्रभावों के रूप में 37-72 प्रतिशत उत्तरदाताओं की धारणा थी कि परिवहन के साधनों में हुई उल्लेखनीय वृद्धि के कारण कुंजन, तिहाड़ और भंगेली जैसे गांवों का सड़क से जुड़ाव (37 प्रतिशत), दूरसंचार (72 प्रतिशत), चिकित्सा (67 प्रतिशत), शिक्षा (56 प्रतिशत) और अन्य सार्वजनिक सुविधाएं (53 प्रतिशत) में वृद्धि हुई है।

विस्तृत चर्चा में स्थानीय लोगों की आय में वृद्धि को अंकित किया क्योंकि इन ग्रामों में उपलब्ध सब्जी एवं दूध को अब ज.वि.प. के कर्मचारियों को बेचा जाता है एवं स्थानीय बाजार में ले जाया जा सकता है, जो कि पूर्व में मोटर सड़क न होने के कारण बाजार में नहीं बेचा जा सकता था। उल्लेखनीय नकारात्मक सांस्कृतिक प्रभावों में 51 प्रतिशत परियोजना-प्रभावित लोगों ने नदी के किनारे धार्मिक त्योहारों में कमी और सामाजिक बुराइयों में वृद्धि होना बताया।

इस अध्ययन के निष्कर्ष पर पहुचने हेतु तीनों जल विद्युत परियोजनाओं के प्रभावित लोगों की धारणा के संदर्भ में प्राप्त आकड़ों पर सावधानी से अवलोकन करने से बेहतर उपयोगी अंतर्दृष्टि प्राप्त की जा सकती है। इस अध्ययन में भूगर्भीय रूप से संवेदनशील एवं जैव विविधता व सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से समृद्ध भागीरथी नदी पर धरासूं-गंगोत्री क्षेत्र के बीच निर्मित ज.वि.प. के प्रभावों (नकारात्मक और सकारात्मक) पर प्रभावित लोगों की धारणा को समझने की कोशिश की है।

इस अध्ययन में शामिल दो परियोजनाओं क्रमश: पिछले 30 वर्षों से (एमबी-एक) और पिछले 10 वर्षों से (एमबी-दो) बिजली पैदा कर रही है जबकि लोहारीनाग पाला ज.वि.प. का निर्माण प्रस्तुत अध्ययन के किए जाने से ठीक पहले बंद हो गया था। अतएव, यह अध्ययन परियोजनाओं के प्रभावों की दोनों स्थितियों (चालू/निर्माणाधीन) को प्रस्तुत करता है।

परिणामतः इन तीन परियोजनाओं के बारे में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जानकारी के कारण परियोजना के नकारात्मक/सकारात्मक प्रभावों पर लोगों की धारणाएँ भिन्न पाई गयी। परन्तु इन तीनों परियोजनाओं के प्रभावित ग्रामीणों द्वारा यह समान रूप से माना कि वायुमंडल के तापमान में वृद्धि एवं वर्षा में आई गिरावट परियोजना से संबंधित है, परन्तु इन धारणा को बिना किसी वैज्ञानिक अध्ययन के सच नहीं माना जा सकता है।

इसी प्रकार परियोजनाओं से धार्मिक उत्सवों में आई कमी को विशेष रूप से लोहारीनाग पाला परियोजना के हेतु सत्य नही माना जा सकता, क्योंकि वहां अभी भागीरथी नदी में कोई बैराज नहीं बना है एवं नदी का प्रवाह अभी भी अपनी प्राकृतिक स्थिति में बना हुआ है।

जैव-विविधता पर पड़ने वाले प्रभावों पर स्थानीय लोगों की धारणा में एमबी-एक परियोजना प्रभावित लोगों में से आधे से अधिक लोगों द्वारा कृषि फसलों एवं भागीरथी नदी में मत्स्य प्रजाति की विविधता में वृद्धि महसूस की गई। जबकि वन्यजीवों की आबादी में कमी, वनस्पतियों/जीवों के निवास स्थान के विखंडन और चारागाह भूमि के ह्रास के संबंध में एमबी-एक के आधे से अधिक परियोजना प्रभावित लोगों ने माना कि यह परियोजना से संबंधित नहीं है।

एमबी-दो एवं एलएनपी के प्रभावित लोगों ने वनस्पतियों/जीवों, कृषि फसलों, चारागाह भूमि, वन्यजीव की आबादी में कमी एवं वन्य जीवों के निवास स्थानों के विखंडन और खरपतवारों की वृद्धि को जैव विविधता पर महत्वपूर्ण नकारात्मक प्रभावों के रूप में दर्ज किया। कृषि कार्य एवं पषुधन में आई कमी को एमबी-दो एवं एलएनपी ज.वि.प. के प्रभावितों ने नकारात्मक प्रभाव के रूप में माना। हालांकि उत्तराखण्ड के अन्य क्षेत्रों की भांति इस क्षेत्र में भी लोगों की बदलती जीवन शैली और नौकरी की तलाश में आवास-प्रवासन के लिए कृषि और पशुधन आबादी में कमी को अधिक जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। अतः यह प्रभाव पूरी तरह से ज.वि.प. के लिए निर्दिष्ट नहीं किया जा सकता।

यह स्पष्ट है कि भागीरथी नदी घाटी में तीनों ज.वि.प. के प्रभाव स्वरूप नदी के बहाव में कमी एवं भागीरथी नदी घाटी के सौदर्य में 90ः से भी अधिक उत्तरदाताओं ने गिरावट महसूस की। उल्लेखनीय नकारात्मक प्रभावों में वायु, जल, एवं ध्वनि प्रदूषण में वृद्धि, नदी तट क्षेत्र में अतिक्रमण और नदी तट में गंदगी, रेत एवं पत्थर के उत्खनन, मृदा अपरदन, एवं भूस्खलन में वृद्धि एमबी-दो और एलएनपी ज.वि.प. के आधे से अधिक परियोजना प्रभावित लोगों द्वारा सूचित किए गए।

भागीरथी नदी से बहाव को तुरन्त एमबी-एक और एमबी-दो दोनों ज.वि.प. के जलाशय से एकाएक छोड़ा जाना (विशेष रूप से सर्दियों के महीनों के दौरान जब बर्फ का पिघलना कम रहता है) को नदी की तटीय पारिस्थितिकी के लिए चिंता का विषय माना। हालांकि लगभग तीन दषक पूर्व एमबी-प् के निर्माण के दौरान सड़क के किनारे होने वाले भूस्खलन अब स्थिर हो जाने से लोगों द्वारा भुला दिए गए है जो उनके द्वारा नकारात्मक प्रभावों की सूची में नहीं रखें गये।

भटवाड़ी और गंगनानी (एलएनपी परियोजना क्षेत्र में पड़ने वाले ग्राम) क्षेत्र भूगर्भीय कारकों की दृष्टि से भूस्खलन हेतु सबसे संवेदनशील क्षेत्र हैं। पुनः मानवजनित गतिविधियों द्वारा इस संवेदनषीलता में वृद्धि होने से अक्सर ज.वि.प. को ही भूस्खलन हेतु जिम्मेवार ठहराया जाता हैं। फोकल समूह चर्चा से यह खुलासा हुआ कि ज.वि.प. निर्माण के लिए होने वाले ब्लास्टिंग पर्वतीय ढलान को अस्थिर करता है, इससे घरों में दरार और कुछ क्षेत्रों में जलस्रोत सूखने (एमबी-एक के जामक गांव और एमबी-दो के सिंगुडी और पुजार गांव) के लिए स्थानीय निवासियों ने जिम्मेदार ठहराया। ब्लास्टिंग के कारण भू-गर्भीय संरचना में हुई गड़बड़ी को इंकार नहीं किया जा सकता है जिसके लिए वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है।

एलएनपी परियोजना क्षेत्र में फोकल समूह चर्चा से खुलासा हुआ कि, ज.वि.प. के स्टोन क्रशर और लोडिंग वाहनों से उत्पन्न होने वाली धूल, सेब के फूलों में परागकण एवं पत्तियों के प्रकाष संष्लेषण को प्रभावित करती है, जिसे फसलों की पैदावार में कमी और उपज में गिरावट का कारण माना गया जिसे कि अन्य वैज्ञानिकों द्वारा भी साबित किया जा चुका है।

इसके अलावा धूल जमने के कारण आसपास की दुकानों में विक्रय हेतु रखे संमान की गुणवत्ता घट जाने के कारण वस्तुओं बिक्री भी प्रभावित होती हैं। उपरोक्त अलग-अलग उदाहरणों के जरिए लोगों नेे बड़ी परियोजनाओं  के नकारात्मक प्रभावों को कम करने के लिए रन-ऑफ-द-रिवर एवं छोटी जल विद्युत परियोजनाओं को बढ़ावा देने का समर्थन किया।

यह विदित है कि ज.वि.प. के ग्रामीण क्षेत्र की पिछड़ी अर्थव्यवस्था के कारण आधुनिक सुविधाओं से वंचित हैं। परियोजना के परिणामस्वरूप सकारात्मक परिणामों के रूप में सड़क मार्ग, दूरसंचार, चिकित्सा और शिक्षा सुविधाओं में वृद्धि को महसूस किया गया जबकि ये सुविधाएं सरकार के विकास कार्यक्रमों से ज्यादा संबंधित रही होंगी। स्पष्टतया ग्रामीणों में इस जानकारी के अभाव से इस धारणा को बल मिला होगा कि जल विद्युत परियोजनाओं के आने से उनके ग्रामों में मूलभूत सुविधाओं का विकास हो पाया।

परियोजना-प्रभावित लोगों की इस धारणा का समर्थन इस तथ्य से भी होता है कि गरीबी से त्रस्त ग्रामीणों में ज.वि.प. के द्वारा रोजगार सृजन उल्लेखनीय रूप से सकारात्मक प्रभाव लाया है। उदाहरण के लिए, एलएनपी के निर्माण के दौरान, 480 ग्रामीणों को (2500-5000 रू. प्रति महीनें) अकुशल से लेकर उच्च कुशल मजदूरी का रोजगार मिला था। लेकिन एलएनपी परियोजना के बन्द हो जाने के परिणामस्वरूप, इन स्थानीय लोगों ने अपनी नौकरियां खो दीं एवं उन्होनें उक्त ज.वि.प. को पुनः शुरू करने के लिए प्रयास किये एवं वह इस परियोजना के निर्माण के समर्थक थे। इन ग्रामीणों को प्रत्यक्ष रोजगार लाभ के अलावा, सड़क संपर्क की सुविधा और अपने उत्पादों जैसे दूध और सब्जियों को बेचने के लिए बाजार की उपलब्धता हुई।

उदाहरण के लिए, एमबी-एक और एमबी-दो के आसपास के लोगों ने स्वीकार किया कि ज.वि.प. कर्मचारियों मे दूध की बढ़ती माँग के कारण वे अब अतिरिक्त गायों और भैंसों को पालने लगे हैं। इसलिए, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्र में जहां विकास अपेक्षित गति से नही हो सका है, परियोजनाएं लोगों की आशा के अनुरूप नौकरी के अवसरों एवं अवस्थापना विकास से जीवन स्तर में आंषिक सामाजिक-आर्थिक लाभ प्रदान करती हैं, लेकिन इन परियोजनाओं के निर्माण में प्राकृतिक संसाधनों की भारी लागत आती है, जिसका आर्थिक आकलन आवश्यक है।

उत्तराखंड की अलकनंदा घाटी में दो ज.वि.प. के एक मामले के अध्ययन में ऐलन इत्यादि; 2013 के माध्यम से यह सुझाव आया कि उत्तराखंड में परियोजना का विकास, निर्णय लेने में सुधार, समानता को बढ़ावा देने एवं सतत् विकास के अवसर पैदा करने के लिए सहभागी बन सकता है। परियोजना-प्रभावित लोगों के कौशल वृद्धि एवं उनकों रियायती दर पर बिजली के प्रावधान का उपयोग करने से वैकल्पिक आजीविका विकल्प जैसे- पर्यटन और कुटीर उद्योग हो सकते हैं।

जैसा कि पहले बताया गया है भागीरथी नदी घाटी की ज.वि.प. को रोकने का एक मजबूत कारण माॅ गंगा नदी का स्रोत, एवं इससे जुड़ी सामाजिक-सांस्कृतिक और धार्मिक लोकाचार थी। अतः सांस्कृतिक प्रभावों पर लोगों द्वारा व्यक्त धारणा का सावधानीपूर्वक परीक्षण आवश्यक है। एमबी-एक के 79 प्रतिशत परियोजना-प्रभावित लोगों की धारणा के अनुसार धार्मिक त्योहारों में वृद्धि एवं भागीरथी नदी के प्रति श्रद्धा में कोई अन्तर नहीं आया है। जिसे एमबी-दो और एलएनपी के आधे से अधिक परियोजना-प्रभावित लोगों के द्वारा आ रही कमी में माना गया और इसे ज.वि.प. से संबंधित पाया गया।

इसके अलावा, सामाजिक बुराइयों में वृद्धि को आधे से अधिक लोगों ने ज.वि.प. में कार्यरत बाहरी लोगों से जुड़ा हुआ होना बताया। तीनों ज.वि.प. के 79 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने सबसे महत्वपूर्ण सकारात्मक प्रभाव स्थानीय लोगों में पर्यावरणीय जागरूकता के रूप में बताया गया। इसे एक सकारात्मक संकेत के रूप में लिया जा सकता है, क्योंकि लोग अपनी प्राकृतिक संपत्ति की उपयोगिता के बारे में अब अधिक जानने लगे हैं और इसे विकासात्मक गतिविधियों के कारण होने वाले नुकसान से बचाने हेतु संरक्षण और संवर्धन के लिए आगे आने लगे हैं।

यह वास्तविकता है कि उत्तराखण्ड में ऊर्जा की मांग जनसंख्या वृद्धि (प्रति वर्ष कम से कम 1.8ः की दर से) और शहरीकरण के साथ तेजी से बढ़ रही है। इस प्रदेष में बिजली खपत के चरम घंटों के दौरान विद्युत मांग और आपूर्ति में कमी प्रति व्यक्ति वर्ष 2012 में 1012 किलोवाट प्रति घंटा से बढ़कर वर्ष 2015 में 1154 किलोवाट प्रति घंटा पाई गई।

इस अंतर को पाटने के लिए बायोगैस प्लांट, लकङी गैसीफायर-आधारित पॉवर प्लांट, सोलर वाटर हीटर, सोलर पीवी प्लांट, पवन ऊर्जा और बायोडीजल जैसे कार्बन संग्रहण और भंडारण टेक्नोलॉजी पर आधारित कम कार्बन उत्पन्न करने वाले ईधनों के विकल्पों की जरूरत है। सरकार द्वारा इनमें से सौर ऊर्जा को अधिक लोकप्रिय बनाया जा रहा है क्योंकि इसे संग्रहीत करके आवश्यकतानुसार उपयोग किया जा सकता है जिससे सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में एक व्यवहार्य विकल्प प्रदान किया जा सकता है जहां छोटे पैमाने के उपयोगों के लिए बिजली का सामान्य ग्रिड तक पहुँचना मुश्किल है।

जीवाश्म ईंधन के विपरीत, सौर ऊर्जा के दोहन से हानिकारक कार्बनडाइ ऑक्साइड उत्सर्जन नहीं होता है। इसी तरह, पवन ऊर्जा एक पर्यावरण के अनुकूल अक्षय ऊर्जा का स्रोत है जो जलवायु परिवर्तन या वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में, सामुदायिक बायोगैस संयंत्र खाना पकाने और पानी गर्म करने के लिए एक और ऊर्जा का विकल्प प्रदान कर सकते हैं जिसे उत्तराखंड में बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जा रहा है।

यह अनुमान है कि उत्तराखंड में सालाना लगभग 20 मिलियन मीट्रिक टन कृषि अवशेष और कृषि औद्योगिक/प्रसंस्करण अपशिष्ट का उत्पादन किया जाता है, जिसमें लगभग 300 मेगावाट बिजली पैदा करने की क्षमता है। इसके अलावा, राज्य में हर दिन उत्पादित होने वाले लगभग 1000 मीट्रिक टन नगरपालिका, शहरी और औद्योगिक ठोस/तरल अपशिष्ट को वैज्ञानिक रूप से संषोधित किया जा सकता है जिसे पर्यावरण प्रदूषण के उन्मूलन के साथ-साथ बिजली उत्पन्न करने के लिए उपयोग किया जा सकता है।

इसके अलावा, राज्य में पर्याप्त अप्रयुक्त भू - तापीय विद्युत क्षमता उपलब्ध है जिसे प्रयोग में लाने की आवश्यकता है। पर्वतीय समुदायों के बीच बिजली की पहुंच बढ़ाने के लिए इस क्षेत्र में छोटे पैमाने पर पनबिजली (एक मेगावाट से कम) विकसित करने की बहुत बड़ी संभावना है। ये विकल्प सस्ते है एवं कम पर्यावरणीय प्रभाव डालते हैं एवं इनका परिचालन स्थानीय समुदायों को शामिल करते हुए कम समय में किया जा सकता है।

वर्तमान में, उत्तराखंड में ऊर्जा का सबसे बड़ा हिस्सा हाइड्रो-पावर (68 प्रतिशत) है, इसके बाद कोयला (12 प्रतिशत), गैस (3 प्रतिशत), परमाणु (1 प्रतिशत) और नवीकरणीय ऊर्जा (16 प्रतिशत) के लगभग है। सरकार बिजली बचाने के लिए विद्युत बल्व और सीएफएल की जगह एलईडी बल्ब उपलब्ध करा रही है। इस प्रकार, एक विकेन्द्रीकृत ऊर्जा रणनीति, जो हिमालय क्षेत्र में स्थानीय मांग को पूरा करने के लिए कुशल प्रौद्योगिकियों के माध्यम से स्थानीय रूप से उपलब्ध अक्षय ऊर्जा संसाधनों का उपयोग करती है एंब उत्तराखण्ड में बढती हुई विद्युत ऊर्जा खपत हेतु एक आदर्श समाधान प्रस्तुत करती है।

संक्षेप में: भागीरथी नदी घाटी क्षेत्र के निवासियों के मध्य इस धारणा अध्ययन के आधार पर ज.वि.प. के नकारात्मक प्रभावों में वनस्पतियों/वन्य जीवों, कृषि, भागीरथी नदी का प्रवाह एवं नदी घाटी की सुंदरता में कमी, एवं जल प्रदूषण, रेत/पत्थर उत्खनन और सामाजिक बुराइयों में वृद्धि को उल्लेखनीय माना जा सकता है। सकारात्मक प्रभावों में, जीवन स्तर में वृद्धि, सड़क संपर्क और परिवहन के साधन, सार्वजनिक सुविधाएं, पर्यटन और पर्यावरणीय जागरूकता को निर्णायक रूप से स्वीकार किया जा सकता है।

यह कहना उचित होगा कि कारण और प्रभाव की जटिलता के विश्लेषण की अनुपस्थिति में नकारात्मक एंब सकारात्मक प्रभावों के अंतरसंबंध को समझना मुश्किल है। अतएव भागीरथी नदी घाटी पारिस्थितिकी तंत्र के पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक घटकों पर जल विद्युत परियोजनाओं  और अन्य मानवजनित गतिविधियों के प्रभावों को अलग- अलग करना परियोजनाओं के विरोध की धारणा को दूर करने के लिए इन निर्माणाधीन/प्रस्तावित परियोजनाओं के बन्द हो जाने के बाद भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

इसके अलावा इस अध्ययन से यह भी पता चलता है कि जब परियोजना से बिजली उत्पादन के लाभ मिलने लगते हैं तो लोग समय के साथ परियोजनाओं के नकारात्मक प्रभावों को भूल जाते हैं एवं परियोजना के निर्माण चरण में ही सर्वाधिक नकारात्मक प्रभाव लोगों द्वारा महसूस किये जाते हैं। अतः इस क्षेत्र में परियोजनाओं को पर्यावरण के अनुकूल एवं सत्त बनाये रखने के लिए एवं विज्ञान-आधारित, बहुआयामी अध्ययन परियोजना-प्रभावित लोगों की भागीदारी से करने की आवश्यकता है जिससे कि जल संसाधनों से विद्युत ऊर्जा के विकास, सामाजिक आर्थिक उन्नयन एवं पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।

लेखक डाॅ. गिरीश नेगी, पर्यावरण संस्थान, कोसी-कटारमल, अल्मोड़ा से जुड़े हैं। उन्होंने निदेशक, गोविंद बल्लभ पन्त राष्ट्रीय हिमालय पर्यावरण संस्थान, कोसी-कटारमल द्वारा आवश्यक सुविधाऐं प्रदान करते करने हेतु आभार व्यक्त किया है