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मध्यप्रदेश में 55 हजार से अधिक ग्रामीणों पर विस्थापन का खतरा

जल विद्युत परियोजनाओं से विस्थापित हुए हजारों परिवारों का अब तक राज्य सरकार पुनर्वास नहीं कर पाई है

By Anil Ashwani Sharma

On: Sunday 05 July 2020
 
मध्यप्रदेश के मंडला जिले का गांव सिंगापुर, जिसके प्रभावित होने का खतरा है। फोटो: राजकुमार सिन्हा
मध्यप्रदेश के मंडला जिले का गांव सिंगापुर, जिसके प्रभावित होने का खतरा है। फोटो: राजकुमार सिन्हा मध्यप्रदेश के मंडला जिले का गांव सिंगापुर, जिसके प्रभावित होने का खतरा है। फोटो: राजकुमार सिन्हा

पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन, दिल्ली और नर्मदा बेसिन प्रोजेक्टस कम्पनी लिमिटेड के बीच हुए अनुबंध के बाद 99 गांवों के लगभग 55 हजार लोगों पर विस्थापन का खतरा बढ़ गया है। इनमें लगभग 50 गांव आदिवासियों के हैं, जहां लगभग 30 हजार आदिवासी रह रहे हैं। 

दरअसल, पिछले दिनों पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशनदिल्ली और नर्मदा बेसिन प्रोजेक्टस कम्पनी लिमिटेडमध्यप्रदेश के बीच 22 हजार करोड़ का अनुबंध हुआ है। इसमें नर्मदा घाटी की कुल 12 परियोजनाएं शामिल हैं। इनमें चार जल विद्युत और 8 बहुद्देश्यीय (जल विद्युत और सिंचाई दोनों) योजनाएं शामिल हैं। इन परियोजनाओं से राज्य को 225 मेगावाट बिजली प्राप्त होगी।

अब तक राज्य सरकार 4 परियोजनाओं की डीपीआर (विस्तृत परियोजना रिपोर्ट) बनाई है। इन 4 परियोजनाओं की वजह से लगभग 55 हजार ग्रामीण प्रभावित होंगे, जबकि अभी आठ परियोजनाओं की डीपीआर तैयार नहीं हुई, जिसका असर बाद में दिखाई देगा।

ध्यान रहे कि मध्य प्रदेश में नर्मदा घाटी परियोजना 1980 के दशक से शुरू हुई थी, जिसके अंतर्गत 29 बड़े बांधों को बनाया जाना था। अब तक इनमें से आठ का निर्माण हो चुका है। और इनमें से लगभग 625 गांव के 96,500 परिवार विस्थापित हुए यानी लगभग 4,82,500 ग्रामीण अब तक विस्थापित हो चुके हैं।

यहां सबसे बड़ा सवाल है कि राज्य सरकार अब तक इन हजारों परिवारों का तो ठीक से पुनर्वास कर नहीं पाई है, ऐसे में नए 55 हजार और ग्रामीणों को विस्थापित कर कैसे उनका पुनर्वास होगा।

इस संबंध में बरगी बांध विस्थापित संघ के राजकुमार सिन्हा कहते हैं कि 03 मार्च, 2016 के विधानसभा सत्र में विधायक जितेंद्र गहलोत द्वारा नर्मदा नदी पर 29 बड़े बांध की योजना सबंधी पूछे गए सवाल के जवाब में प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लिखित जवाब दिया था कि राघवपुर, रोसरा, बसनिया, अपर बुढनेर आदि परियोजना नए भू-अर्जन अधिनियम से लागत में वृद्धि होने, डूब क्षेत्र में वनभूमि आने के कारण निरस्त की गई है।

वह कहते हैं कि मुख्यमंत्री ने जब इन योजनाओं को निरस्त करने की बात बकायदा विधानसभा में कही है तो ऐसे में इन परियोजनाओ को नए सिरे से किस आधार पर अनुबंध किया गया है। सबसे बड़ी बात है कि राज्य सरकार इस प्रकार के अनुबंध लॉकडाउन के दौरान किया है। ताकि इसका विरोध न हो सके।

नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पॉवर कारपोरेशन द्वारा इन 12 परियोजनाओं में से एक बसानिया जल विद्युत परियोजना के अध्ययन में बताया गया है कि 2,256 हैक्टेयर सघन जंगल, 6,033 हैक्टेयर खेती की जमीन और 50 जल स्त्रोत खत्म हो जाएंगे। यह अध्ययन तो सीधे तौर पर विस्थापित होने वाले 50 आदिवासी गांवों का है।

अध्ययन में यह भी कहा गया है कि इसके अतिरिक्त इस परियोजना के पूरा होने के बाद उसके आसपास के लगभग सात किलोमीटर की परिधि में आने वाले 34 और गांवों के सघन जंगल 4,774, कृषि भूमि 3,860 हेक्टेयर और कुल 66 जल स्त्रोत अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होंगे।

नर्मदा घाटी में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा 29 बड़े बांध प्रस्तावित हैं, इसमें बरगी, तवा, बारना, इंदिरा सागर(पुनासा), ओंकारेश्वर, महेश्वर, मटियारी, हालोन बांध का निर्माण हो चुका है। हालोन बांध से मंडला एवं बालाघाट जिले के अधिकतर विस्थापित परिवार आज भी पुनर्वास का इंतजार कर रहे हैं।

बरगी बांध के उपर बुढनेर,राघवपुर, रोसरा और बसानिया बांध बनना बाकी है। भारत सरकार और मध्यप्रदेश के बीच हुए अनुबंध के अन्तर्गत डिंडोरी और मंडला जिले के राघवपुर, रोसरा एवं बसनिया बांध से 65 मेगावाट जल विद्युत परियोजना बनाया जाना प्रस्तावित है।

इन तीनों विद्युत परियोजनाओं से 8,367 हैक्टर क्षेत्र में बसे किसानों को विस्थापित किया जाएगा। इन तीन परियोजनाओं पर पूर्व में कुल लागत 1,283.12 करोड़ अनुमानित थी, लेकिन अब इसकी लागत दोगुना से ज्यादा आंकी जा रही है।