बांधों के कारण लाखों मील बहने वाली नदियों के अस्तित्व पर मंडरा रहा है खतरा

दुनिया के कई हिस्सों में प्रस्तावित जलविद्युत बांधों के बनने से नदियों तथा इसमें रहने वाले जीवों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है

By Dayanidhi

On: Thursday 12 August 2021
 
बांधों के चलते लाखों मील बहने वाली नदियों के अस्तित्व पर मंडरा रहा है खतरा
फोटो : विकिमीडिया कॉमन्स फोटो : विकिमीडिया कॉमन्स

नदियों का संरक्षण और उन्हें सतत रूप से कैसे विकसित किया जाए, इस पर संघर्ष, अध्ययन और बहस का एक लंबा इतिहास रहा है। जिन देशों ने सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) और जैव विविधता पर सम्मेलन में साझेदारी की है, उन देशों ने ताजे पानी की जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं में दुनिया भर में होने वाली गिरावट को रोकने के लिए हामी भरी है।

लेकिन इस सब के बाद भी एक नए अध्ययन से पता चला है कि दुनिया के अधिकतर देश अन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए इनकी अनदेखी कर रहे हैं।

अध्ययन के मुताबिक नए जलविद्युत बांधों के प्रस्तावित निर्माण के कारण 160,000 मील से अधिक स्वच्छंद तरीके से बहने वाली नदियों पर रोक लगने का खतरा मंडरा रहा है। मुक्त रूप से बहने वाली नदियों का कुल भाग पृथ्वी के चारों ओर की दूरी के छह गुना से अधिक लंबा है। अमेजन, कांगो और साल्विन जैसी प्रतिष्ठित नदियों पर जलविद्युत विकास से इनके स्वच्छंद तरीके से बहने पर रोक लग जाएगी।

बांध और जलाशय दुनिया भर की नदियों को एक दूसरे से मिलने से रोकते हैं। जैसा कि संयुक्त राष्ट्र ने जलवायु और जैव विविधता की इस गिरावट को लेकर शिखर सम्मेलन आयोजित किया। सम्मेलन में कहा गया कि नीति निर्माताओं को जलविद्युत विकास और साफ ताजे पानी के पारिस्थितिक तंत्र को बनाए रखने के बीच संतुलन पर विचार करना चाहिए।

विश्व वन्यजीव कोष (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) के वैज्ञानिक और प्रमुख अध्ययनकर्ता मिशेल थिएम ने कहा जब नदी के स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के नुकसान की बात आती है, तो हमें इन मुद्दों को अलग-अलग देखने के बजाय एक साथ मिलाकर देखने की जरूरत हैं।

नदियां वन्यजीवों और इसमें निवास करने वाले जीवों को स्वस्थ रखने के लिए महत्वपूर्ण हैं, विशेष रूप से इस गर्म होती जलवायु में। दुनिया के कई हिस्सों में जलविद्युत बांधों से जीवों पर खतरा मंडरा रहा है। सबसे अच्छे नीतिगत समाधान वे होंगे जिनमें अक्षय ऊर्जा की जरूरतों को ताजे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र के साथ संतुलन बैठाया जाय।

अध्ययन में पाया गया है कि मुक्त रूप से बहने वाली नदियों पर सभी प्रस्तावित बांध सामूहिक रूप से वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने के लिए 2050 तक आवश्यक नवीकरणीय ऊर्जा का केवल 2 फीसदी से कम उत्पन्न करेंगे।

स्वस्थ नदियां कई तरह से फायदे पहुंचाती हैं, जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। ताजे पानी की मछली का भंडार जो लाखों लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा में अहम भूमिका निभाता है। तलछट का वितरण जो कृषि को उपजाऊ बनाता है और बढ़ते समुद्रों के ऊपर डेल्टा बनाता है। बाढ़ के मैदान जो बाढ़ के प्रभाव को कम करने में मदद करते हैं तथा जैव विविधता के खजाने हैं।

थिएम कहते हैं कि आने वाला समय अक्षय ऊर्जा का है, इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि हम यथार्थवादी समाधान तैयार करें जो मुक्त बहने वाली नदियों के कई तरह के लाभों के लिए जिम्मेदार हों, लेकिन गर्म होती जलवायु में लोगों को स्वच्छ ऊर्जा की आवश्यकता भी है। यह शोध ग्लोबल सस्टेनेबिलिटी जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

शोधकर्ताओं ने जलवायु और ऊर्जा के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए विज्ञान आधारित नीतिगत समाधान तैयार किए है। जबकि मुक्त बहने वाली नदियों ने लोगों और प्रकृति की भी सुरक्षा की है। अध्ययन उन विशिष्ट उदाहरणों की रूपरेखा तैयार करता है जहां सरकारों ने इन रणनीतियों को सफलतापूर्वक लागू किया है, जिनमें शामिल हैं:

नदियों के औपचारिक संरक्षण करके या वैकल्पिक विकास विकल्पों की खोज करके, जैसे कि सौर और पवन जैसे बिना जलविद्युत नवीकरणीय ऊर्जा की खोज करके नदियों को बर्बाद होने से बचाया जा सकता है।

लोगों और प्रकृति पर कम प्रभाव वाले स्थानों पर बांध बनाकर नदियों पर बांधों के प्रभाव को कम करना। पर्यावरणीय प्रवाह जैसी प्रौद्योगिकियां भी बांधों के माध्यम से पानी के प्राकृतिक प्रवाह को बनाए रखने और बांध के प्रभावों को कम करने में मदद कर सकती हैं।

बांधों को हटाना और नदियों को बहाल करना, बांध रखरखाव की उच्च लागत और आसपास के पारिस्थितिक तंत्र पर नकारात्मक प्रभावों के कारण यह कई देशों में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।

बांधों के नकारात्मक प्रभावों की भरपाई करना। यदि एक नदी पर से बांध को हटा दिया जाता है, तो यह सुनिश्चित करने के लिए कि क्षेत्र में समान मूल्यों को बनाए रखा जाता है, यह दूसरी नदी की रक्षा करने के विकल्प हो सकते हैं।

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