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बिजली के लिए इथोपिया के बांध निर्माण पर मिस्र का विरोध जारी

जलसंकट के चलते मिस्र ने अपने यहां चावल उगाना बंद कर दिया है। वहीं, इथोपिया के जरिए नील नदी पर बनाए जा रहे बांध के कारण पानी की कमी के अंदेशे के चलते मिस्त्र ने कड़ा ऐतराज जताया है।

By Anil Ashwani Sharma

On: Thursday 29 October 2020
 
Photo: Getty Images

नदियों पर बने बांधों के पानी और उससे पैदा होने वाली बिजली को लेकर पूरी दुनिया में घमासान मचा हुआ है। विशेष कर उन महाद्वीपों में अधिक जहां आज भी लाखों-करोड़ों लोग अंधेरे में ही जीवन गुजारने पर मजबूर हैं। दुनिया की सबसे लंबी नदी का दर्जा पाई नील नदी पर ही इथियोपिया बांध का  निर्माण कर रहा है और क्योंकि उस अकेले देश में 65 प्रतिशत आबादी( साढ़े छह करोड़ लोग) आज भी बिजली के बिना ही जीवन यापन कर रहे हैं। ऐसे में इस बांध से इन लोगों की जिंदगी में उजाला आएगा लेकिन इसके निर्माण के बाद मिस्र और सूडान ने भारी विरोध जताया है। कारण कि इससे उनके देश में पानी की मात्रा कम हो जाएगी। यहां तक कि मिस्र ने तो अपने यहां चावल की खेती पर भी प्रतिबंध लगा दिया है क्योंकि इस फसल के कारण पानी की बहुत अधिक जरूरत पड़ती है। लेकिन इन सभी मामलों में एक ही बात सामान है और वह पानी का बराबर वितरण या पानी से बनने वाली बिजली का वितरण और वह कैसे हो?

नील नदी पर बन रहे बांध को लेकर इथियोपिया, सूडान और मिस्र के बीच तनाव अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया है। इथियोपिया की 65 प्रतिशत आबादी बिजली की कमी होने की वजह से अंधेरे में जिंदगी गुजार रही है। ध्यान रहे कि यह देश सालों से गरीबी और बिजली की कमी से जूझ रहा है। वहीं, मिस्र अपना अस्तित्व ही नील नदी से समझता है। मिस्र की जनता नील नदी को पूजती है। कई सालों से मिस्र नील नदी पर अपना अधिकार जमाता रहा है जबकि नील नदी का बेसिन (जहां से नदी को पानी मिलता है ) इथियोपिया से है। नील नदी का 85 प्रतिशत पानी इथियोपिया से निकलता है, इसलिए यह देश चाहता है की क्यों ना नदी का सबसे ज्यादा फायदा उन्हें ही मिले। इसलिए इथियोपिया ने नदी पर विशाल पनबिजली योजना शुरू की, जिससे देश अंधेरे और गरीबी से मुक्त हो। इसी के चलते इथियोपियन रेनेसांस डैम प्रोजेक्ट (जीआरईडी ) शुरू किया गया है, लेकिन यह मिस्र को कतई मंजूर नहीं है।

इथियोपियाई लोगों को पता है कि मिस्र में बहने वाले पानी का 90 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा इथियोपिया के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में उत्पन्न होता है। जब यह बाँध बनकर पूरा हो जाएगा तो दुनिया का 10 वां सबसे बड़ा बांध होगा और इसमें 13 टर्बाइन होंगे जो 5 गीगावाट बिजली का उत्पादन कर सकते हैं। तीनों देशों (इथियोपिया, सूडान और मिस्र) के बीच समझौता करने के लिए बातचीत अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की मौजूदकी में हुई। यह जगजाहिर है कि मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल सिसी अमेरिका के पसंदीदा तानाशाह हैं।

अमेरिका के स्टेट डिपार्टमेंट के एक प्रवक्ता ने विदेश विभाग के प्रोटोकॉल के अनुसार नाम न छापने की शर्त पर एक बयान में कहा कि उसने इथियोपिया से सुरक्षा और विकास सहायता में  264 डॉलर मिलियन की राशि वापस ले ली है। क्योंकि इथियोपिया ने सूडान और मिस्र से के साथ बिना किसी समझौते के बांध बनाने का एकतरफा फैसला लिया। विश्लेषकों का कहना है कि अदीस अबाबा ( इथियोपिया की राजधानी ) पर वाशिंगटन और काहिरा का बहुत कम लिवरेज (उधार ली गई पूंजी) है। इस बीच इथियोपिया के राजनेताओं, व्यापारी और अधिकारियों ने बांध पर काव्यात्मक प्रचार किया। यहां तक कि प्रधानमंत्री के प्रवक्ता ने इसके बारे में एक कविता भी लिखी है।

इथियोपिया की 28 वर्षीय मंत्री फिलसन आब्दी कहती हैं की जिन माताओं ने बच्चे को अंधेरे में जन्म दिया है, वे लड़कियां जो स्कूल जाने के बजाय आग जलाने के लिए लकड़ी बिनती हैं। ऐसे में हम सबने बांध और बिजली के लिए कई सालों से इंतजार कर रहे हैं। वहीं, मिस्र और सूडान को डर है की बांध बनने की वजह से पानी घट जाएगा। मिस्र को अंदाजा है की इथियोपिया का बांध बनने के बाद 36 प्रतिशत पानी घाट सकता है। मोहम्मद अब्देलखेल ने देखा कि नील के डेल्टा में हजारों मील की दूरी पर सहारा रेगिस्तान के किनारे खेतों में चावल की खेती बहुत अधिक होती है। चावल ने उन्हें समृद्धि दी थी। लेकिन जलवायु परिवर्तन और जनसंख्या वृद्धि की वजह से बढ़ते पानी के संकट ने चावल की फसल का  जीवन चक्र को ही बदल दिया।

दो साल पहले यानी 2018 में मिस्र ने 3 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी बचाने के प्रयास में चावल उत्पादन के लिए उपयोग किए जाने वाले क्षेत्र को 1.76 मिलियन एकड़ से  750,000 तक घटा दिया। लेकिन अब जैसे ही बांध भर जाता है तो किसानों को डर है कि जिस चावल से वह समृद्ध हुए हैं, वहीं खतरे में पड़ जाएगा। देश में चावल की खेती काफी हद तक प्रतिबंधित है। किसानों का कहना है की सिंचाई मंत्रालय के अधिकारियों ने एक नियम लागू किया है जो किसानों को नहरों के पानी के लिए चार दिनों तक सीमित करता है। 

मिस्र की कृषि निर्यात परिषद की चावल समिति के प्रमुख मुस्तफा अल नागगरी का कहना है कि वर्तमान चावल उत्पादन प्रतिबंध मुख्य रूप से पानी की बढ़ती मांग को पूरा करने और राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों को पूरा करने की आवश्यकता को देखते हुए लिया गया फैसला है। वहीं दूसरी ओर मिस्र के राजनेता और विशेषज्ञ इस संकट की के लिए पूरी तरह से इथियोपिया को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। इन सभी ने अदीस अबाबा पर अपने जलाशय को भरने के लिए लाखों मिस्रवासियों को अंधेरे और गरीबी में धकेलने का आरोप  लगाया। वहीं मिस्र के विशेषज्ञों का कहना है कि यह हमारा अधिकार है, कोई भी इस तरह से मिस्र से व्यावहार नहीं कर सकता है। इस संबंध में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के  हाइड्रोलॉजिस्ट केविन व्हीलर ने कहा, यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि इथियोपिया में सूखे के दौरान और उसके बाद वह कितना पानी छोड़ेगा। सूखे की शुरुआत के दौरान इथियोपिया यह तय करेगा कि क्या उसी दर से पानी छोड़े और बिजली पैदा करना जारी रखे या जलाशय को लंबे समय तक ऊर्जा उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए भरा जाए।

इथियोपिया के प्रधान मंत्री अबी अहमद ने इस साल यूएन महासभा में अपने भाषण में मिस्र की चिंताओं को स्वीकार करते हुए कहा, मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि इन दोनों देशों को नुकसान पहुंचाने का हमारा कोई इरादा नहीं है। हम जो अनिवार्य रूप से कर रहे हैं वह ऊर्जा के सबसे स्वच्छ स्रोतों में से हमारी बिजली की माँगों को पूरा करना है। हम अंधेरे में 65 मिलियन से अधिक लोगों को और अधिक दिनों तक नहीं रख सकते।
काहिरा में संयुक्त राष्ट्र के एक अधिकारी, जिन्होंने नाम न छापने की शर्त पर इस संवेदनशील मुद्दे के बारे में कहा था कि इस बांध ने मिस्र में बिगड़ती जल-संकट की स्थिति ने अब तक प्रभावित नहीं किया है, लेकिन अगले साल स्थिति इससे एकदम अलग हो सकती है।

व्हीलर ने कहा कि एक बड़ा बांध लगभग निश्चित रूप से बिजली की किल्लत से निजात दिलाएगा। यही नहीं बांध का लाभ सूडान, केन्या और जिबूती में भी इसी तरह की समस्याओं को खत्म करने में मदद करेगी, क्योंकि ये सभी इथियोपिया के ग्रिड से जुड़े हुए हैं और आने वाले सालों में इसी से बिजली का आयात करना शुरू कर देंगे। इसके अलावा अभी भी दुनिया भर में 840 मिलियन से अधिक लोगों के पास बिजली की कमी है, जिसमें ज्यादातर इथियोपियाई और लगभग सभी अफ्रीकी देश शामिल हैं। लेकिन नई वितरण लाइनों का निर्माण कम से कम उतना ही महंगा होगा जितना कि बांध और उसके निर्माण में खर्च आता है।