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बरगी जलाशय से मछुआरों का पलायन शुरू

जलाशय में मछली पकड़ने का ठेका मछुआरों की सहकारी समिति की बजाय मत्स्य महासंघ को दे दिया है, इससे मछुआरों को आमदनी प्रभावित हो रही है

By Anil Ashwani Sharma

On: Friday 03 January 2020
 
बरगी जलाशय। फोटो: अनिल अश्विनी शर्मा
बरगी जलाशय। फोटो: अनिल अश्विनी शर्मा बरगी जलाशय। फोटो: अनिल अश्विनी शर्मा

नर्मदा घाटी परियोजना के अंतर्गत बने पहले बरगी बांध के जलाशय से लगभग ढाई दशक बाद 3500 मछुआरों के परिवार का पलायन शुरू हो गया है। कारण कि इस जलाशय को अब राज्य सरकार ने मत्स्य महासंघ को दे दिया है, जिसने यहां ठेकादारी प्रथा शुरू कर दी है। जबकि पूर्व में यह मछुआरों के मत्स्य फेडरेशन के पास था। इसके तहत इस जलाशय में कुल 54 मछुआरों की सहकारी समितियां मछली पालने और उसे बेचने का काम करती थीं।

अब चूंकि महासंघ के पास ठेका है तो वह मछुआरों को अच्छी मछली नहीं मिलती है क्योंकि वे मछली का बीज अच्छी किस्म का नहीं डालते। इस संबंध में मछुआरों के फेडरेशन के अध्यक्ष मुन्ना बर्मन ने डाउन टू अर्थ को बताया कि हमने इस जलाशय का अधिकार 1992 में लड़ी लड़ाई के बाद 1994 में पाया था और तब सामाजिक कार्यकर्ता स्वर्गीय बीडी शर्मा की अगुआई में इस क्षेत्र में कुल 54 सहकारी समितियों का गठन किया गया था। हर समिति में एक दर्जन से लेकर सौ तक मछुआर शामिल थे। तब सरकार ने इन समितियों को अगले पांच सालों के लिए जलाशय दे दिया। यह सिलसिला 2005 तक चला। इसके बाद सरकार ने इस जलाशय को ठेके पर देने के लिए निविदा जारी करना शुरू कर दिया। ऐसे में यह जलाशय ठेकेदारों के पास चला गया। ये लोग मछुआरों को केवल मजदूरी ही दिया करते हैं। ठेकेदारी में मछुआरों को मजदूरी तो मिलती है, लेकिन जलाशय में मछलियां कम मिलती है।

बर्मन ने बताया कि असल में फेडरेशन 2001 तक ही चला। इसके बाद पुनर्वास आयोजन समिति की बैठक हुई, जिसमें फेडरेशन की अवधि बढ़ाने की मांग की गई। इसके बाद 2001 से 2005 तक के लिए जलाशय पर फेडरेशन के अधिकार की अवधि बढ़ाई गई। उस वक्त दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे। लेकिन मत्स्य महासंघ के अधिकारियों ने कोर्ट से इस आदेश पर स्थगनादेश ले लिया। बाद में कोर्ट ने उनके हक में फैसला सुनाया। उन्होंने जलाशय के टेंडर जारी किए। तभी से ठेकेदारी प्रथा चल रही है। मछली का बीज सरकार की तरफ से डाला जाता है। वो बहुत कम बीज डालती है, जिस वजह से मछली का उत्पादन घटता जा रहा है, इसका असर मछुआरों की मजदूरी पर पड़ रहा है। ऐसे में, अब उनके पास पलायन के अलावा कोई चारा नहीं बच रहा है। 

ध्यान रहे कि एक समय बरगी जलाशय काफी प्रसिद्ध था। यहां मछलियों के उम्दा बीज डाले जाते थे। उस जलाशय से तीन टन से 15-16 टन मछलियां रोज पकड़ी जाती थीं, जिसे दिल्ली, हावड़ा, नागपुर आदि मार्केट में बेचते थे। पहले फेडरेशन था तो बढ़िया बीज डाले जाते थे, लेकिन अब सरकार डालती है, जो अच्छी नहीं होती है। जैसे ही जलाशय फेडरेशन के हाथ से ठेकेदारों के पास गया, जलाशय में औसत बीज डाला जाने लगा और इसका हश्र यह हो यह रहा है कि मछुआरों को अपना परिवार पालना मुहाल हो रहा है।