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भारत समेत दुनिया भर की दो तिहाई नदियों के लिए बड़ा खतरा हैं बांध

जर्नल नेचर में प्रकाशित अध्ययन से पता चला है कि लगभग दो-तिहाई नदियों को बांधों, तटबंधों, जलाशयों एवं मनुष्य द्वारा निर्मित अन्य ढांचों ने गंभीर नुकसान पहुंचाया है।

By Lalit Maurya

On: Wednesday 15 May 2019
 

नदियां सिर्फ जल का स्रोत ही नहीं अपितु ये जीवन का आधार भी है, यही कारण है कि हजारों वर्षों से अनेक सभ्यताएं इन नदियों की गोद में ही फली-फूली और समृद्ध होती आयी हैं। आज दुनिया के अरबों लोग अपनी पानी, भोजन और सिंचाई की आवश्यकता के लिए काफी हद तक नदियों पर ही निर्भर हैं | लेकिन गंगा से लेकर यांग्त्ज़ी तक अधिकांश बड़ी नदियां आज या तो हमारे द्वारा बांध अथवा तटबंध बनाकर बांट दी गयी है या फिर वो इतनी प्रदूषित हो चुकी हैं कि यदि उनको बचाने के लिए तुरंत कार्रवाई नहीं की गयी तो उनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा ।

हाल ही में जर्नल नेचर में प्रकाशित अध्ययन से पता चला है कि दुनिया की सबसे लंबी नदियों में से लगभग दो-तिहाई नदियों को बांधों, तटबंधों, जलाशयों एवं मनुष्य द्वारा निर्मित अन्य संरचनाओं ने गंभीर नुक्सान पहुंचाया है। आज दुनिया में ऐसी नदियां नाम के लिए ही बची हैं जिन्हे हमारी महत्वाकांक्षा ने नुक्सान न पहुंचाया हो, और जो बची हैं वो भी काफी हद तक सिर्फ आर्कटिक, अमेज़न और कांगो बेसिन जैसे दूरस्थ एवं निर्जन स्थानों तक ही सीमित हैं, जहां अभी तक मनुष्य की पहुंच सीमित है।

शोधकर्ताओं ने उपग्रह से प्राप्त नवीनतम डेटा और कंप्यूटर मॉडलिंग के जरिये विश्व भर में नदियों की 120 लाख किलोमीटर कनेक्टिविटी का अध्ययन करने के पश्चात अपना पहला वैश्विक मूल्यांकन प्रस्तुत किया है जो कि विस्तार से इन जलमार्गों पर मनुष्य के पड़ रहे प्रभावों को दिखाता है। अपने अध्ययन में उन्होंने पाया कि 91 नदियां जिनकी लम्बाई 1,000 किलोमीटर से अधिक लंबी थी, उनमे से सिर्फ 21 नदियां ही अपने उद्गम से लेकर समुद्र के बीच सीधा संबंध बनाए रखने में सफल रही हैं, जबकि बाकी बची 70  नदियां अपने मार्ग में ही कहीं खो जाती हैं। वही दूसरी और सबसे लंबी 242 नदियों में से एक-तिहाई (लगभग 37 प्रतिशत) नदियां आज भी अविरल बह रही हैं। जबकि दो-तिहाई नदियां का मार्ग अवरुद्ध हो चुका है। अध्ययन बताता है कि अब सिर्फ 23 फीसदी नदियां ही बिना किसी रुकावट के मुक्त रूप से समुद्रों से मिलती हैं | कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है की इसका सीधा प्रभाव पृथ्वी की जैव विविधता पर पड़ रहा है। इस शोध के प्रमुख शोधकर्ता और मैकगिल यूनिवर्सिटी में भूगोल विभाग के प्रमुख गुंथर ग्रिल के अनुसार, "दुनिया भर की नदियां भूमिगत जल, जमीन और और वायुमंडल के साथ मिलकर एक जटिल किन्तु महत्वपूर्ण नेटवर्क का निर्माण करती हैं। नदियों की अविरलता मनुष्यों और पर्यावरण दोनों के ही लिए समान रूप से महत्वपूर्ण हैं, परन्तु दुनिया भर में आर्थिक विकास की होड़ इन्हें तेजी से दुर्लभ बना रही है।"

क्या सिर्फ बड़े बांध ही हैं इन नदियों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार

शोधकर्ताओं का मानना है कि बांध और उससे जुड़े जलाशय नदी के अवरोध का सबसे बड़ा कारण हैं। अनुमान के अनुसार दुनिया भर में नदियां पर बने 28 लाख बांधों में से 60,000 बड़े बांध हैं, जिनकी ऊंचाई 15 मीटर या उससे अधिक है। जो सीधे तौर पर न केवल नदियां के मार्ग को अवरोधित कर रहें हैं, बल्कि नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र पर भी उनका दुष्प्रभाव पड़ रहा है | वहीं जल-विद्युत बनाने के लिए 3,700 से भी अधिक बड़े बांधो को बनाने की योजना पर काम चल रहा है, जो की निर्माण के विभिन्न चरणों में हैं ।

इसी सप्ताह जैव विविधता के लिए बनाये गए संयुक्त राष्ट्र के पैनल ने मनुष्य के प्रकृति पर पड़ रहे विनाशकारी प्रभाव और उसकी स्थिति पर एक मूल्यांकन रिपोर्ट जारी की है । जिसमें कहा गया है कि विश्व की 50 प्रतिशत नदियां मनुष्य की गतिविधियों के कारण गिरावट का सामना कर रही हैं, जिसके भविष्य में विनाशकारी और गंभीर प्रभाव सामने आएंगे। दुनिया में 10 में से 8 सबसे अधिक प्लास्टिक-प्रदूषित नदियां एशिया में हैं | संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी आंकड़े दर्शाते हैं हमारे द्वारा 80 प्रतिशत से अधिक अपशिष्ट जल बिना किसी निपटारन के नदियों या समुद्र में बहा दिया जाता है, वह भी नदियों के विनाश का प्रमुख कारण है | शोधकर्ताओं ने इनके साथ-साथ जलवायु परिवर्तन को भी नदियों के लिए एक बड़ा खतरा माना है, उनके अनुसार बढ़ते तापमान से नदियों के प्रवाह का पैटर्न, पानी की गुणवत्ता एवं जैव विविधता प्रभावित हो रही है।