गंगा बेसिन में घट रही है जलीय पौधों की विविधता

तालाबों और झीलों में बढ़ता प्रदूषण जलीय पौधों की विविधता में बड़ा बदलाव ला रहा है और देशी प्रजातियों के लिए खतरा पैदा कर रहा है

On: Tuesday 24 August 2021
 
उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में स्थित समसपुर आर्द्रभूमि में जलीय पौधों की विविधता का एक दृश्य (फोटो: दिव्या दुबे)

वेंकटेश दत्ता, दिव्या दुबे

दुनियाभर में कई मीठे जल वाली आर्द्रभूमि (वेटलैंड्स), झीलें और नदियां मानवीय गतिविधियों से गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो रही हैं और स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र की तुलना में बहुत तेजी से घट रही हैं। मीठे पानी के प्राकृतिक आवास के विनाश के बाद, आक्रामक प्रजातियों का प्रवेश देसी पौधों के जैव समुदायों और उनके पारिस्थितिक तंत्र के लिए सबसे बड़े वैश्विक खतरों में से एक माना जाता है। मीठे पानी की झीलों में बढ़ता प्रदूषण बायोटा (जलीय जीवजंतु) पर भारी दबाव डाल रहा है। जलीय पौधों की मूल प्रजातियां हमारे मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के उचित पारिस्थितिक कार्यों में मदद करती हैं।

खतरे जो प्राकृतिक आवासों को बाधित करते हैं
  • बांधों का निर्माण और जल डायवर्सन सिस्टम
  • मानव उपयोग के लिए अत्यधिक जल निकासी
  • कृषि और शहरी क्षेत्रों से अपवाह
  • घरेलू स्रोतों से अशोधित सीवेज
  • विकास के लिए वेटलैंड्स की निकासी और अतिक्रमण
  • अत्यधिक दोहन और प्रदूषण
  • विदेशी प्रजातियों का आक्रमण

पर्यावरण विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अंतरराष्ट्रीय जर्नल टाइटल एंड जर्नल में प्रकाशित एक शोध पत्र में हमने पाया है कि कई आक्रामक प्रजातियां झीलों और आर्द्रभूमि की देसी प्रजातियों के लिए अत्यधिक खतरा पैदा कर रही हैं। नाइट्रेट और फॉस्फेट के परिणामस्वरूप आक्रामक प्रजातियों की प्रचुरता बढ़ रही है जो झीलों की सतह को पूरी तरह से आच्छादित करती है। यह प्राकृतिक प्रकाश संश्लेषण को प्रभावित करता है जो पानी के अंदर भोजन चक्र को पूरी तरह से परेशान कर सकता है। अन्य प्रदूषकों के साथ उच्च फॉस्फेट और नाइट्रेट के परिणामस्वरूप झीलों में पोषक तत्व संवर्धन या यूट्रोफिकेशन होता है, जिससे जलीय पौधों की अत्यधिक वृद्धि होती है। यह देखा गया है कि अत्यधिक शैवाल, अन्य जलीय पौधों और जानवरों को नष्ट कर देते हैं। शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में चयनित झीलों में पौधों की जलीय विविधता और पानी की गुणवत्ता के बीच संबंध का आकलन किया गया।

हमारा यह अध्ययन इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एनवायरमेंट साइंस एंड टेक्नोलॉजी में प्रकाशित हुआ है। इसमें यह समझने के लिए किया गया था कि ट्राफिक (झीलों के पोषक तत्वों को बताने वाली अवस्था) अवस्था में वृद्धि और मानव-प्रेरित हस्तक्षेपों ने झीलों में जलीय पौधों की विविधता को कैसे प्रभावित किया है। (देखें, खतरे में जलीय पौधे) रायबरेली रोड के पास है बतमऊ झील, गोमती नगर स्थित कठौता झील और रामसर साइट समसपुर वेटलैंड्स को चुना गया जो रायबरेली के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित छह झीलों का संयोजन है। पोषक तत्वों की लोडिंग को समझने के लिए चयनित झीलों के प्रमुख जल गुणवत्ता मापदंडों का आकलन किया गया। यह देखा गया कि पोषक तत्वों के भार में परिवर्तन और मानव जनित हस्तक्षेप के परिणामस्वरूप जलीय पौधों की सामुदायिक संरचना में परिवर्तन हो रहा है। झीलों की ट्रॉफिक अवस्था को तीन मुख्य मापदंडों का उपयोग करके मापा गया- कुल फास्फोरस, क्लोरोफिल ए और गहराई। जलमग्न, तैरते और उभरते मैक्रोफाइट्स प्रजातियों की समृद्धि को उनके बायोमास के अनुरूप निर्धारित की गई। मैक्रोफाइटिक विविधता पर प्रदूषण के प्रभाव को मापने के लिए, प्रजातियों की समृद्धि, शैनन-वीनर इंडेक्स व महत्व सूचकांक जैसे विविधता सूचकांकों का आकलन किया गया। कुल फास्फोरस में वृद्धि के साथ, जलमग्न मैक्रोफाइट्स की प्रजातियों की समृद्धि में उल्लेखनीय गिरावट हुई, जबकि फ्लोटिंग मैक्रोफाइट्स की प्रजातियों की समृद्धि में वृद्धि हुई।

प्रतिकूल प्रभाव

लखनऊ की कठौता और हैबतमऊ झीलें मेसोट्रोफिक अवस्था में पाई गईं, जबकि समसपुरआर्द्रभूमि जो रायबरेली में एक रामसर स्थल है, अल्पपोषी या ओलिगोट्रोफिक स्थिति में पाई गई। यह देखा गया कि झील की पोषी स्थिति के साथ-साथ मानव जनित हस्तक्षेपों ने विभिन्न मैक्रोफाइट्स के प्रभुत्व, संरचना और विविधता को प्रभावित किया। झीलों में मानव-प्रेरित दबावों से प्रतिकूल प्रभाव प्रत्यक्ष रूप से दिखता है जैसा कि कठौता झील में देखा गया था जिसमें कीटनाशकों का प्रयोग कर सिंघाड़े (ट्रैपा) की खेती और मछली पकड़ने का काम किया गया जिससे अन्य जलीय जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इसकी तुलना में, ऑलिगोट्रॉफिक समसपुर झील कम मानव जनित हस्तक्षेपों के कारण प्रजाति विविधता और समृद्धि दिखाती है। यहां मेसोट्रोफिक कठौता और हैबतमऊ झीलों की तुलना में निवास स्थान की विविधता और प्रजातियों की समृद्धि दिखती है। मेसोट्रोफिक और यूट्रोफिक झीलों की तुलना में ओलिगोट्रोफिक झीलों में उच्च विविधता का प्रमाण स्पष्ट रूप से दिखता है।

मेसोट्रोफिक झीलों में, जलमग्न मैक्रोफाइट्स के कब्जे वाले क्षेत्र अधिक हो सकते हैं और उनकी उपस्थिति का झीलों की समग्र संरचना और जटिलता पर बहुत प्रभाव पड़ता है। तीन झीलों में, शहरी क्षेत्र में कठौता और हैबतमऊ झीलों में उच्च फास्फेट स्तर और मानव जनित हस्तक्षेपों के कारण सबसे कम प्रजातियों की विविधता और प्रजातियों की समृद्धि को दर्शाता है, कठौता में प्रजातियों की समानता अधिकतम है, क्योंकि मुक्त-तैरने वाले पौधों की अत्यधिक वृद्धि हुई है। शोध में यह पाया गया कि अशोधित सीवेज मुख्य रूप से उच्च फास्फोरस और नाइट्रेट लोडिंग, जैविक समरूपीकरण का कारण बनने वाली आक्रामक प्रजातियां के लिए जिम्मेदार हैं। भविष्य में देसी प्रजातियों के लिए यह खतरा पैदा कर सकता है।

भारत में और विशेष रूप से गंगा बेसिन में, जलग्रहण भूमि के उपयोग में परिवर्तन के साथ, मानवजनित गतिविधियों के कारण पोषक तत्वों से भरपूर अपवाह तालाबों, झीलों और नदियों में पहुंच रहे हैं और मीठे जल की विशिष्ट पारिस्थितिक-जल विज्ञान की स्थिति को बदल रहे हैं। ट्रैपा नटान, एजोला फ्लिक्युलोइड्स, आईकोर्निआ क्रैसिप्स, सेराटोफिलम डेमर्सम सहित आक्रामक जलीय पौधों के कारण देसी पौधों के हैबिटैट में काफी परिवर्तन आ रहा है। पोटामोगेटन क्रिस्पस, मायरियोफिलम एक्वाटिकम और टायफा एंगुस्टिफोलिया गंगा बेसिन के ऊष्णकटिबंधीय शहरी झीलों में व्यापक रूप से बढ़ रहे हैं। विदेशी आक्रामक प्रजातियों का प्रभुत्व झीलों में देसी मैक्रोफाइट्स की विविधता को प्रभावित करता है। मानवजनित हस्तक्षेप के साथ-साथ बढ़ते प्रदूषण से फ्लोटिंग मैक्रोफाइट्स का आक्रमण भी होता है जिससे झीलों की मूल जैव विविधता में गिरावट आती है।

उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में स्थित समसपुर वेटलैंड्स में जलीय पौधों की विविधता का “फ्लोटिंग क्वाड्रेंट” से अध्ययन किया गया (फोटो: दिव्या दुबे)

मेसोट्रोफिक झीलों में यूट्रोफिकेशन की वजह से मैक्रोफाइट्स की देसी प्रजातियों की समृद्धि में कमी देखा गया है। ऐसी स्थिति तब होती है जब मैक्रोफाइट्स अपने अतिवृद्धि के कारण तालाबों और झीलों के लिए समस्याग्रस्त हो जाते हैं। अध्ययन से पता चला है कि झील में बढ़ते पोषक तत्वों के साथ, आक्रामक मैक्रोफाइट्स के फैलने की प्रवृत्ति होती है, जिनकी पत्तियां अक्सर पानी की सतह को कवर करती हैं। प्रदूषण के प्रभाव को समझने के लिए मैक्रोफाइटिक विविधता और पोषक तत्वों से भरपूर झीलों की पोषी अवस्था के बीच संबंधों की समझ बहुत जरूरी है जिससे भविष्य में इससे निपटा जा सके। गंगा बेसिन में कई झीलों और तालाबों पर अतिक्रमण किया जा रहा है, जिसमें नई बस्तियां अपने तरल और ठोस कचरे को उनमें बहा रही हैं। खतरों की एक से अधिक श्रेणियों के मद्देनजर, अक्सर पौधों की प्रजातियां या जैव विविधता में गिरावट आती है। वास्तविक खतरा मानव गतिविधियों द्वारा लाए गए परिवर्तनों के संयुक्त या सहकार्यात्मक प्रभाव का परिणाम है। वेटलैंड्स में कम पानी जाने की वजह से, मीठे पानी के बायोटा पर भारी असर पड़ा है जिससे जलीय पौधों और जानवरों की कई प्रजातियां लुप्तप्राय हो गई हैं।

प्रदूषण भार और मानवजनित हस्तक्षेप मैक्रोफाइट्स की संरचना को बदल सकते हैं जो पारिस्थितिक तंत्र प्रक्रियाओं और मीठे पानी की जैव विविधता को प्रभावित कर सकते हैं। हमें सुरक्षित आर्द्रभूमि क्षेत्रों को सख्ती से संरक्षित करने और मानव उपयोग के लिए जल निकासी को नियमित करने की आवश्यकता है। इसके अलावा नगरीय विस्तार के कारण झीलों और नदियों के अतिक्रमण को नगर निगम के अधिकारियों को रोकना चाहिए। पानी में प्रदूषण को बेअसर करने की प्राकृतिक क्षमता होती है, लेकिन जब प्रदूषण अनियंत्रित हो जाता है, तो पानी अपने आप को खुद साफ करने की क्षमता खो देता है। इसलिए, आसपास के जलीय वातावरण में प्रदूषण निर्वहन की नियमित निगरानी और नियंत्रण की आवश्यकता है।

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