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गंगा पुनरुद्धार के लिए 3000 करोड़ रुपए का ऋण देगा विश्वबैंक

इस 3,000 करोड़ रुपए में से 2,858 करोड़ रुपए ऋण के रूप में और 142 करोड़ रुपए प्रस्तावित गारंटी के रूप में होंगे। 

By Lalit Maurya

On: Wednesday 08 July 2020
 

गंगा को बचाने और उसके पुनरोद्धार के लिए वर्ल्ड बैंक करीब 3000 करोड़ रुपए (40 करोड़ डॉलर) का ऋण देगा| विश्व बैंक द्वारा दिया जा रहा यह ऋण नमामि गंगे परियोजना के लिए दिया जाएगा| विश्वबैंक ने अपने बयान में कहा कि इस 3,000 करोड़ रुपए में से 2,858 करोड़ रुपए (38.1 करोड़ डॉलर) ऋण के रूप में और 142 करोड़ रुपए (1.9 करोड़ डॉलर) प्रस्तावित गारंटी के रूप में होंगे। इसके साथ ही विश्व बैंक ने यह भी कहा कि इस दूसरी राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन परियोजना (एसएनजीआरबीपी) से गंगा में प्रदूषण को कम करने और नदी बेसिन प्रबंधन में सुधार लाने में मदद मिलेगी। 2011 से ही विश्वबैंक गंगा पुनरोद्धार के प्रयासों में सरकार का समर्थन कर रहा है| यह ऋण 18.5 वर्षों के लिए दिया गया है जिसमें 5 वर्ष की मोहलत अवधि भी शामिल है|

गंगा न केवल आध्यात्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है बल्कि इसके महत्व का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि इसका नदी बेसिन 50 करोड़ से भी ज्यादा लोगों को आवास प्रदान करता है|  भारत का सतह पर मौजूद एक तिहाई जल इसी नदी बेसिन में है| जोकि देश का सबसे बड़ा सिंचित क्षेत्र भी है| जिससे देश की एक बड़ी आबादी को खाना और रोजगार मिलता है| यह बेसिन देश का करीब 40 फीसदी जीडीपी उत्पन्न करता है| पर जिस तरह से इस नदी का दोहन हो रहा है, उसका असर इसकी गुणवत्ता और जल के बहाव पर पड़ रहा है|

देश में इसी को ध्यान में रखकर नमामि गंगे परियोजना की स्थापना की गई थी| जिसका उद्देश्य गंगा को प्रदूषण मुक्त करना और उसके इकोसिस्टम में सुधार लाना था। नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा के महानिदेशक राजीव रंजन मिश्रा ने बताया कि विश्व बैंक की मदद से शुरू की गई पहली परियोजना से प्रदूषण को रोकने में जो मदद मिली थी| उसमें इस द्वितीय राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन परियोजना से गति मिलेगी| भारत में वर्ल्ड बैंक के कंट्री डायरेक्टर श्री जुनैद अहमद ने बताया कि, "नमामि गंगे परियोजना ने गंगा के पुनरोद्धार के लिए किये जा रहे प्रयासों को पुनर्जीवित किया है।"

“विश्व बैंक की पहली परियोजना की मदद से नदी के किनारे स्थित 20 सबसे प्रदूषित हॉटस्पॉटों में सीवेज के निर्माण में मदद मिली थी| अब इस दूसरी परियोजना के तहत इस काम को गंगा की सहायक नदियों तक बढ़ाने में मदद मिलेगी। मौजूदा राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन परियोजना के तहत अब तक गंगा के किनारे स्थित 20 शहरों में सीवेज ट्रीटमेंट के लिए बुनियादी ढांचे के विकास में मदद मिली है| जिसके अंतर्गत 1,275 एमएलडी सीवेज ट्रीटमेंट की व्यवस्था की जा चुकी है| साथ ही 3,632 किमी का सीवेज नेटवर्क बनाया गया है|

कहां, कितना किया जाएगा खर्च

गौरतलब है कि गंगा प्रदूषण का एक बड़ा कारण आसपास के कस्बों और शहरों से निकला अपशिष्ट जल है| आंकड़ों के अनुसार गंगा में 80 फीसदी प्रदूषण घरों से निकलने वाले अपशिष्ट जल के कारण होता है| इनके ट्रीटमेंट की कोई व्यवस्था न होने के कारण इस गंदे पाने को ऐसे ही गंगा और उसकी सहायक नदियों में छोड़ दिया जाता है|

नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा के अनुसार इसमें से 1,134 करोड़ रुपये (15 करोड़ डॉलर) का उपयोग तीन नई हाइब्रिड एन्यूइटी मोड परियोजनाओं में किया जाएगा। यह राशि आगरा, मेरठ सहारनपुर (उत्तरप्रदेश) में गंगा की सहायक नदियों (यमुना और काली) पर खर्च की जाएगी। साथ ही 1200 करोड़ रुपए (16 करोड़ डॉलर) की राशि बक्सर, मुंगेर, बेगूसराय (बिहार) की मौजूदा डिजाइन, निर्माण, परिचालन और स्थानांतरण (डीबीओटी) परियोजनाओं एवं दीघा, कंकड़बाग-पटना तथा हावड़ा, बैली और बड़ानगर (पश्चिम बंगाल) की हाइब्रिड एन्यूइटी मोड परियोजनाओं पर खर्च की जाएगी। जबकि बाकि बचे 7.1 करोड़ डॉलर अन्य गतिविधियों पर खर्च किये जाएंगे|  

यह सुनिश्चित करने के लिए कि इस परियोजना के तहत निर्मित ढांचा प्रभावकारी ढंग से काम करता रहे और उसका प्रबंधन ठीक तरह से होता रहे, यह परियोजना मौजूदा एनजीआरबीपी के तहत शुरू किए गए सार्वजनिक-निजी भागीदारी वाले नए हाईब्रिड वार्षिकी मॉडल (एचएएम) के आधार पर शुरू की जाएगी| इस मॉडल के तहत सरकार निजी ऑपरेटरों को निर्माण अवधि के दौरान सीवेज ट्रीटमेंट संयंत्र बनाने के लिए लागत का 40 फीसदी भुगतान करेगी और शेष 60 फीसदी का भुगतान इन संयंत्रों के प्रदर्शन के आधार पर 15 वर्षों की अवधि में किया जाएगा| जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि ऑपरेटर संयंत्र का संचालन एवं रखरखाव ठीक तरह से कर रहे हैं|

1 डॉलर = 75.02 रुपए