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ग्रामीण भारत में आज भी महिलाओं के लिए लग्जरी है बाथरूम

आखिर स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत क्यों नहीं आता बाथरूम, क्या टॉयलेट की तरह बाथरूम का मुद्दा स्वच्छता से जुड़ा नहीं है  

By Meghna Mukherjee, Lalit Maurya

On: Tuesday 05 November 2019
 
ग्रामीण इलाकों में नहाने के लिए बाथरूम न होने के कारण महिलाओं उन्हें नजदीकी तालाब, कुएं, नलकूपों और नदियों में पूरे कपड़े पहनकर नहाना पड़ता है (विकास चौधरी)
ग्रामीण इलाकों में नहाने के लिए बाथरूम न होने के कारण महिलाओं उन्हें नजदीकी तालाब, कुएं, नलकूपों और नदियों में पूरे कपड़े पहनकर नहाना पड़ता है (विकास चौधरी) ग्रामीण इलाकों में नहाने के लिए बाथरूम न होने के कारण महिलाओं उन्हें नजदीकी तालाब, कुएं, नलकूपों और नदियों में पूरे कपड़े पहनकर नहाना पड़ता है (विकास चौधरी)

आज आजादी के 72 साल बाद, जब दुनिया में महिलाएं चांद पर जाने लगी है और नित नयी ऊंचाईयां छू रही है, वहां आज भी इस देश में बसने वाली लाखों महिलाओं को रोज यह सोंचना पड़ता है कि कल वो कहां नहायेंगी । भले ही भारत ने 10 करोड़ शौचालयों  निर्माण करके कीर्तिमान बना लिया हो, पर क्या महिलाओं के लिए बाथरूम का निर्माण स्वच्छता और नारी के सम्मान से जुड़ा मुद्दा नहीं है ? और यदि है तो हमारे नीति निर्माताओं का ध्यान उस ओर क्यों नहीं जाता? आखिर और कब तक नारियों को इसके लिए संघर्ष करना होगा ? भारत में आज भी ग्रामीण महिलाओं के लिए बाथरूम एक लक्जरी हैं, उन्हें कभी भी इसकी आवश्यकता महसूस ही नहीं होती । क्योंकि सालों से चली आ रही प्रथा, पैसे की कमी और अन्य जरुरी मुद्दों ने उन्हें सुरक्षित स्थान पर स्नान करने जैसी बात पर विचार करने की अनुमति ही नहीं दी है । हालांकि देश में कुछ गैर-सरकारी संगठन हैं जिन्होंने बाथरूम और शौचालय का निर्माण करके इस दिशा में ठोस प्रयास किए हैं । लेकिन संख्या में वो कुछ गिने चुने ही हैं, उन्हें हम सिर्फ अपवाद ही कह सकते हैं । भारतीय समाज में बाथरूम कभी भी प्राथमिक मुद्दा रहा ही नहीं, न ही महिलाओं ने कभी इस पर तबज्जो दी।

लेकिन झारखण्ड के गुमला जिले में बसे तेलया गांव की महिलाओं के मन में उनकी प्राथमिकताएं स्पष्ट थीं। उन्होंने न केवल बाथरूम के महत्व को महसूस किया बल्कि उसे अपने दैनिक जीवन के एक अभिन्न पहलू के रूप में भी माना। यह ऐसी महिलाएं थीं जिन्होंने फैसला किया और हर घर के लिए एक अलग बाथरूम बनाने की मांग की। और उनकी इस मांग को एक स्थानीय एनजीओ 'प्रदान' के सामने रखा गया, जिसने न केवल उन्हें प्रोत्साहित किया बल्कि उसको पूरा करने में उनका भरसक सहयोग भी किया । यह सब तब शुरू हुआ जब स्थानीय एनजीओ 'प्रदान' द्वारा महिलाओं को विकास से जुडी अपनी आवश्यकता को व्यक्त करने के लिए कहा गया, जिससे उनका जीवनस्तर सुधर सके, पर वो खेत से जुडी हुई नहीं होने चाहिए । महिलाओं ने आपसी सहमति के बाद सुझाव दिया कि शौचालय के साथ-साथ यदि बाथरूम और नहाने के लिए पानी की व्यवस्था हो जाये तो वो उनके जीवन में बदलाव ला सकता है । यह सुझाव 'प्रदान' के सदस्यों द्वारा सकारात्मक रूप से लिया गया । उन्होंने गांव की करीब 30 महिलाओं के साथ ओडिशा के लखनपुर का दौरा किया, जहां स्वयं सेवी संस्था 'ग्राम विकास' ने बड़े पैमाने पर काम किया है । उन्होंने वहां शौचालय के साथ-साथ बाथरूम का भी निर्माण किया है, जिसमें पानी का कनेक्शन भी दिया गया है। इसी की प्रेरणा पर तेलया गांव की महिलाओं ने भी तय किया कि वह भी अपने गांव में शौचालय के साथ बाथरूम का भी निर्माण करेंगी ।

आसान नहीं थी बाथरूम बनाने की डगर

हालांकि, इन महिलाओं की अपने सपने को सच करने की यात्रा किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है, जो कि अनेक बाधाओं से भरी थी । इसके विषय में गांव स्तर की प्रतिनिधि आरती देवी ने विलेजस्क्वायर को बताया कि 'हमारी कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है । इसमें किसी भी सुपर हिट फिल्म की तरह ट्विस्ट हैं ।'' तो चलिए जानते हैं कि आखिर उनकी बाथरूम की मांग में ब्लॉकबस्टर फिल्म जैसा क्या है। 

उनके सामने सबसे बड़ा मुद्दा बाथरूम के लिए सुरक्षित जल कनेक्शन उपलब्ध करना था। इसके लिए भूमिगत पाइप लाइन का निर्माण करता था जो धारा को पानी की टंकी से जोड़ सके और एक पानी की टंकी, और एक पंप / बिजलीघर भी बनाया जाना था, जोकि पानी की टंकी में पानी पंप करेगा। आरती देवी याद करते हुए बताती हैं कि "हालांकि यह काम जितना आसान लग रहा था उतना था नहीं क्योंकि पानी के टैंक का निर्माण पहाड़ी की चोटी करना था। जिसके लिए हमें पानी, सीमेंट और अन्य सामग्री को ले कर पहाड़ी पर चढ़ना था। जबकि पुरुष पंप हाउस में काम करने जाते थे। चूंकि हमें मानसून से पहले काम यह पूरा करना था, इसलिए हम सुबह जल्दी करीब साढ़े चार बजे उठ जाते और जल्दी-जल्दी अपने घरों का काम निपटाकर, दोपहर तक अपने तय कार्यों में लगे रहते थे । ” समस्याएं यहीं खत्म नहीं हुईं। जैसे ही हम एक समस्या को हल करते, एक और सामने आ जाती थी। बेहतर निर्माण और लागत को कम करने के लिए 'प्रदान' के सदस्यों के साथ यह फैसला लिया गया कि वह पानी की टंकी के लिए ईंटों का निर्माण खुद करेंगे। 

इसके लिए गांव के पुरुषों द्वारा ईंट बनाने के लिए लकड़ी काट कर इकट्ठी की गयी। हमने मिश्रण को सांचों में डाला और सूखने के लिए खेतों में रख दिया। लेकिन उस रात आयी आंधी और बारिश ने हमारे सारे प्रयासों को बर्बाद कर दिया, निराश मन से आरती देवी ने बताया "अपने सारे प्रयास व्यर्थ हो जाने से ग्रामीणों ने भी उम्मीद खो दी थी । निराश होकर उन्होंने 'प्रदान' के सदस्यों के साथ चर्चा करके अन्य निर्माण सामग्री के साथ ईंटों को खरीदने का फैसला किया । हालांकि हमें जल्द ही समझ में आ गया कि यह रास्ता भी आसान नहीं है । 'प्रदान' के सदस्यों ने जब धन के लिए ब्लॉक कार्यालय से संपर्क किया तो उन्होंने शौचालय और बाथरूम के निर्माण के लिए भुगतान से इंकार कर दिया गया क्योंकि कागजों पर उस गांव  के हर घर में स्वच्छ भारत अभियान के तहत एक शौचालय का निर्माण हो चुका था। साथ ही स्नान के लिए एक अलग बाथरूम का निर्माण स्वीकृत नहीं था। हमें यह जानकर और निराशा हुई कि जिला कार्यालय में नियुक्त एक महिला अधिकारी भी बाथरूम की आवश्यकता को नहीं समझ सकती । हालांकि बहुत मान मनुहार के बाद, अधिकारी इस शर्त पर राशि वितरित करने के लिए राजी हो गयी कि इसे ऋण के रूप में माना जाएगा। साथ ही महिलाओं को निर्मित शौचालयों की फोटो लेने और उन्हें जिला कार्यालय भेजने का भी निर्देश दिया गया ।

जिला कार्यालय से मिले ऋण के अलावा, प्रत्येक घर ने इसके निर्माण के लिए 13000 रूपये इकट्ठे किये । साथ ही तेलया गांव में काम करने वाली महिलाओं के स्वयं सहायता समूह ने भी यह सुनिश्चित किया कि ऋण की अदायगी समय पर की जाए। यह भी तय किया गया कि ब्लॉक कार्यालय को तस्वीरें तब भेजी जाएंगी जब टॉयलेट और बाथरूम दोनों का निर्माण हो जाएगा, क्योंकि अधिकारियों के अनुसार अकेले टॉयलेट का निर्माण किया जाएगा। महिला प्रभारी ने भी हमें शौचालय की तस्वीरें क्लिक करने और  भेजने के लिए कहा था। बाथरूम में उनकी कोई रुचि नहीं थी । लेकिन हमने तय किया है कि जब तक दोनों संरचनाएं नहीं बन जाती तब तक हम उन्हें कोई फोटो नहीं भेजेंगे।"

अभी दूर है मंजिल 

इन सभी बाधाओं के बावजूद, महिलाएं अपने एक अलग बाथरूम के सपने को सच करने में कामयाब हुई थीं। ऋण की कुल राशि भी अगले दो वर्षों में चुका दी गई । तेलया गांव की सभी बहादुर महिलाओं के सामूहिक प्रयास ने इस गांव को पूरे गुमला जिले में एक आदर्श गांव बना दिया है । सच में यह महिलाएं अपने निर्णय और दृढ़ संकल्प के लिए प्रशंसा की हकदार हैं। पर इस पर विचार करना जरुरी है कि इस देश में तेलया जैसे न जाने कितने गांव और वहां रहने वाली महिलाएं आज भी खुले में नहाने को मजबूर हैं । क्या स्वच्छ भारत के दायरे में सिर्फ शौचालय ही आते हैं और क्या शौचालय बनाने से ही भारत स्वच्छ और बीमारी मुक्त हो जायेगा और नारियों को उनका सम्मान मिल जायेगा । अब देखना यह है कि कब देश के नीति निर्माताओं की नींद खुलेगी और सरकार कब इस दिशा में ठोस प्रयास करेगी और कब तक भारत की ग्रामीण महिलाएं एक सुरक्षित बाथरूम की आवश्यकता को पहचानेगी । उम्मीद है इन सब में बहुत देर नहीं होगी और जल्द ही सच में एक स्वच्छ और सुरक्षित भारत का सपना पूरा हो जाएगा।