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क्लीन सिटी-1: कचरे से चली बस, प्लास्टिक से बना डीजल, इंदौर ऐसे बना सबसे साफ शहर

देश में लगातार तीसरी बार सबसे साफ शहर का दर्जा पाने वाले इंदौर शहर में आखिर ऐसा क्या हो रहा है कि इसे स्वच्छता में सर्वोत्तम माना जाता है? 

By Sonia Henam, Manish Chandra Mishra

On: Saturday 30 November 2019
 

फोटो : मनीष चंद्र मिश्रइंदौर शहर ने स्वच्छ सर्वेक्षण में एक के बाद एक तीन साल तक लगातार देश के सबसे साफ शहर का खिताब हासिल किया है। इसकी शुरुआत शहर से डस्टबिन के हटाए जाने और हर एक घर से कचरा इकट्ठा कर उसके निस्तारण से हुई। वर्ष 2016 में इस शहर में पूरे 85 वार्ड में हर घर से कचरा उठाया जाने लगा था। हालांकि, वर्ष 2019 आते-आते इंदौर ने कचरे को जमा करने से लेकर उसके समुचित इस्तेमाल की एक ऐसी व्यवस्था विकसित कर ली है कि कई शहर कचरे के प्रबंधन को यहां से सीख सकते हैं। तकरीबन 275 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले और 27 लाख की आबादी वाले इस शहर से रोजाना 1,150 टन कचरा निकलता है जिसमें से आधा कचरा जैविक होता है। हर तरह के कचरे को दोबारा प्रयोग में लाने के लिए शहर में बीते कुछ वर्षों में कई सफल प्रयोग हुए हैं। डाउन टू अर्थ के इस लेख में पेश हैं इंदौर शहर की सबसे साफ बनने की कहानी।

सौ प्रतिशत कचरे का वर्गीकरण

स्वच्छ भारत मिशन के सलाहकार असद वारसी के मुताबिक इस वक्त शहर के हर घर से कचरे-कचरे को जमा किया जाता है। कचरा जमा कर इसे इकट्ठा करने के बाद इंदौर नगर निगम का असली काम शुरू होता है। इंदौर नगर निगम के सलाहकार जावेद वारसी जामी बताते हैं कि कचरा इकट्ठा करते समय ही इसे गीला कचरा और सूखा कचरे के रूप में अलग- अलग रखा जाता है। कचरा इकट्ठा करने वाले वाहन के चालक गौतम कनेरिया बताते हैं कि शुरुआत में 80 प्रतिशत लोग गीला, सूखा कचरा एक साथ ही रखते थे, लेकिन काफी अनुरोध के बाद अब हमें लोगों के घर से ही कचरा अलग-अलग मिलने लगा है। कचरा ठीक से अपने गंतव्य तक पहुंचे इसके लिए हर गाड़ी में व्हीकल ट्रैकिंग सिस्टम लगा हुआ है। शहर में 8000 से अधिक सफाईमित्र भी हैं, जो कचरा इकट्ठा करने के साथ सड़कों की सफाई भी करते हैं।

400 लीटर पानी से रात को होती सड़कों की धुलाई

इंदौर में आमतौर पर सड़के साफ और चमकती हुई दिखती है। इसकी वजह सफाई के काम में लगी मशीनें हैं जो हर रात करीब 800 किलोमीटर सड़क, डिवाइडर और फुटपाथ की सफाई करती हैं। इस काम में 400 लीटर पानी लगता है। वारसी बताते हैं कि इसमें लगने वाला अधिकतर पानी रिसाइकल किया हुआ होता है। इंदौर नगर निगम के मुताबिक सड़कों की धुलाई के बाद सांस के साथ जाने वाले धुल के कणों की मात्रा 76 माइक्रोग्राम तक कम हो गई है जो कि वर्ष 2014 में 142 माइक्रोग्राम थी। इससे पर्यावरण का स्तर सुधरा है।

थैला और बरतन बैंक ने घटाया कचरा

वारसी कहते हैं कि इंदौर में बीते कुछ वर्षों से थैला बैंक और बरतन बैंक शुरू हुआ, जिसकी मदद से आम लोग कागज और जूट के बने थैले और किसी बड़े आयोजन के लिए स्टील के बरतन ले सकते हैं। इस तरह से कचरे की मात्रा में लगातार कमी आई। शहर में पॉलीथिन पर पाबंदी भी है और लोगों को अपना थैला लेकर चलने के लिए प्रोत्साहित किया गया।

प्लास्टिक कचरे से डीजल-पेट्रोल और सड़क, सीमेंट फैक्ट्री तक पहुंचा ईंधन

इंदौर ने सब्जी मंडी में बचने वाले कचरे से बायो-सीएनजी गैस बनाने की प्रक्रिया शुरू की है। यह प्लांट इस तरह के कचरे से इतना सीएनजी बना लेता है कि शहर में 20 सीएनजी बसों को रोजाना ईंधन दिया जा सकता है। नगर निगम ने सार्थक और बैसिक्स जैसे गैर सरकारी संस्थाओं का साथ लेकर शहर के 700 कचरा उठाने वाले लोगों से संपर्क किया। उन्हें प्रशिक्षण और पहचान पत्र देकर कचरों के वर्गीकरण का काम सौंपा। वे कचरे को प्लास्टिक, कागज, इलेक्ट्रॉनिक कचरा, शीशा और धातु के मुताबिक अलग-अलग करते हैं। नगर निगम के द्वारा स्थापित वर्गीकरण वाले केंद्र में कचरा इकट्ठा करने और उसके वर्गीकरण की व्यवस्था के साथ फटका और इगलू मशीनें हैं, जिससे यह काम आसान हो जाता है। कचरे के प्रकार के मुताबिक इसे महीन टुकड़ों में काटने की व्यवस्था भी इस केंद्र में है।

जावेद वारसी जामी बताते हैं कि हर रोज प्लास्टिक के 100-100 किलो के ब्लॉक नीमच स्थित सीमेंट प्लांट में भेजे जाते हैं, जहां इसका उपयोग ईंधन के तौर पर होता है। कुछ उन्नत किस्म के प्लास्टिक के टुकड़े मध्यप्रदेश ग्रामीण सड़क विकास प्राधिकरण को भी दिए जाते हैं, जिससे अच्छी सड़कें बनाई जा रही है। इस केंद्र में रोज 45,000 किलो प्लास्टिक को दोबारा उपयोग लायक बनाया जा रहा है। इतना ही नहीं, इसी केंद्र पर प्लास्टिक से डीजल बनाने की पद्धति भी विकसित की जा रही है और 3000 लीटर कच्चे तेल से 2600 लीटर डीजल और 180 लीटर पेट्रोल भी बनाया जा रहा है।

तेजी से बढ़ रहे 'जीरो वेस्ट' कॉलोनी, स्रोत पर ही निपटान की कोशिश

इंदौर के परमाणु नगर कॉलोनी में 65 ऐसे घर हैं जो कचरे को ठिकाने लगाने के लिए कई नई पहल कर रहे हैं। ऐसे घरों से निकलने वाला कचरा पहले गीला और सूखा कचरे के रूप में छांटा जाता है। सूखे कचरे को एक जगह इकट्ठा कर रिसाइकलिंग के लिए बेच दिया जाता है और गीले कचरे को आपसी सहभागिता के साथ खाद बनाने की प्रक्रिया में डाला जाता है। कॉलोनी के भीतर ही कंपोस्टिंग के जरिए गीले कचरे से खाद बनता है।

Credit: Sonia Henamखाद बनाने के काम में शहर के 29000 और भी घर लगे हुए हैं। इंदौर नगर निगम ने घरों में खाद बनाने पर जोर दिया है और इस तरह 150 टन कचरा रोजाना कम करने का लक्ष्य रखा है। नगर निगम घरों को पचास फीसदी सब्सिडी के साथ कंपोस्टिंग यूनिट प्रदान कर रहा है।

गैर सरकारी संगठन स्वाहा के जरिए मोबाइल कंपोस्टर की स्थापना भी की गई है। इस उपकरण के जरिए व्यवसायिक इलाकों से कचरे को इकट्ठा कर गाड़ी में लगे कंपोस्टर के जरिए खाद में बदला जाता है। स्वाहा आठ से 10 टन तक कचरा इकट्ठा कर रोज इसे खाद में बदल रहा है। इन उपकरणों का उपयोग व्यवसायिक इलाकों के अलावा बड़े रहवास और होटल में भी हो रहा है।

वारसी कहते हैं कि इंदौर का लक्ष्य आने वाले समय में इस तरह के प्रयासों को आगे और भी बढ़ावा देना है। कचरा इकट्ठा कर एक जगह लाने में परिवहन का एक बड़ा खर्चा है, लेकिन उस कचरे को श्रोत के पास ही निपटान करने से यह खर्च कम किया जा सकता है। इंदौर नगर निगम हर वर्ष 10 प्रतिशत की दर से कचरा निस्तारण पर खर्च में कमी करना चाह रहा है।

इंदौर को साफ रखने की लगातार हो रही कोशिश को लेकर इंदौर नगर निगम के अपर आयुक्त रजनीश कसेरा मानचे हैं कि कचरे का समुचित निस्तारण अबाध रूप से चलता रहे, इसके लिए इसकी सतत निगरानी, चल रहे प्रोजेक्ट के प्रति हमारा दृढ़ निश्चय और सबसे जरूरी लोगों की इस सफाई अभियान में भागीदारी सुनिश्चित करना जरूरी है।