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निर्मल और स्वच्छ भारत अभियान की पोल खोलता एक गांव!

21 साल के दौरान पहले निर्मल भारत और फिर स्वच्छ भारत अभियान के दौरान इस गांव में केवल चार शौचालय बने, लेकिन कागजों में इसे ओडीएफ घोषित किया जा चुका है

By Anil Ashwani Sharma, Manish Chandra Mishra

On: Wednesday 04 March 2020
 
फाइल फोटो: विकास चौधरी
फाइल फोटो: विकास चौधरी फाइल फोटो: विकास चौधरी

मध्य प्रदेशऔर उत्तर प्रदेश के सीमा पर बसे रीवा जिले के एक गांव पकरा की कहानी अनोखी है। क्यों कि इस गांव को पिछले 21 सालों में निर्मल और स्वच्छ भारत अभियान के तहत दो-दो बार खुले में शौच मुक्त गांव यानी ओपीएफ घोषित किया जा चुका है। पहली बार इस गांव को 2009 में निर्मल ग्राम घोषित किया गया था और अब पिछले साल 2 अक्टूबर 2019 को खुले में शौच मुक्त गांव का दर्जा मिला है। इस गांव में पिछले 21 सालों में केवल चार शौचालय बने। इनमें दो तो एक ही घर के दो लोगों ने अपने पैसे से बनवाया।

इनमें एक पकरा गांव निवासी रामशिरोमणी पांडे ने डाउन टू अर्थ को बताया कि पिछले 21 सालों में हमारे गांव में केवल चार शौचायलों का निर्माण हुआ। इसमें दो निजी स्तर पर व दो इन दो अभियानों के दम पर। उन्होंने बताया कि जब मैं दस-बारह साल का था तो निर्मल भारत अभियान शुरू हुआ और कहा गया है कि इस अभियान के बाद हमारा गांव खुले में शौच से मुक्त हो जाएगा। यानी हर घर में शौचालय की व्यवस्था हो जाएगी। यह अभियान चलता रहा लेकिन उस दौर में हमारे गांव में केवल एक शौचालय बना और वह भी स्वयं का पैसा खर्च कर मेरे चाचा गोपी प्रसाद पांडे ने बनवाया। 

2014 में जब स्वच्छ भारत अभियान चला और जिस गति से इस अभियान का प्रचार-प्रसार हुआ उससे इस गांव के लोगों को लगा कि अब तो हमारा गांव ओडीएफ अवश्य हो जाएगा। इस संबंध में गांव के ही एक अन्य ग्रामीण रमेश कुमार ने बताया कि हालंकि यह बात बार-बार कचोटते रहती थी कि इस नए अभियान में नया क्या है। यह तो हम पिछले सोलह सालों से सुनते आ रहे हैं कि हमारा गांव ओडीएफ होने वाला है। लेकिन अब तक तो न हुआ। उन्होंने कहा कि हां इस अभियान की जब खूबिया गांव-घर की दिवारों पर प्रचारित की गईं  तो लगा अरे भाई यह बात तो पहले वाले अभियान में भी कहीं जाती रही हैं। ऐसे में यह कैसे नया अभियान हुआ। बस इतना ही अंतर दिखा कि इसका नया नामकरण हुआ और यह पहले के मुकाबले अधिक बड़े फिल्मी स्टोरों द्वारा प्रचारित किया जा रहा है।

खैर दो अक्टूबर 2014 को  स्वच्छ भारत अभियान शुरू हुआ और कहा गया कि पांच साल बाद यानी दो अक्टूबर, 2019 को हमारा गांव ही नहीं देश भर के सभी गांवों में शौचालय बन जाएगा। लेकिन आखिर ये तारीखें भी धीरे-धीरे बीत गईं। रामशिरोमणि कहते हैं कि अब उस अभियान को पूरे हुए पांच माह से से अधिक होने को आया और अभी भी हमारे गांव में जिसकी आबादी लगभग दस हजार से अधिक है, खुले में ही शौच को जा रहे हैं। आखिर कैसे न जाएं। आखिर पिछले 21 सालों में हमारे गांव में कुल मिलाकर चार शौचालय बने। दोनों अभियानों को यदि जोड़ दूं तो उनसे दो शौचायल बने और दो व्यक्तिआधारित बने। एक मेरे चाचा ने बनवाया और दूसरा मैं जब पैसा कमाने लगा तब बनवाया। लेकिन देखने वाली बात यह है कि जब तीन साल पहले मैंने अपने पैसे से शौचालय अपने घर में बनवाया तब अभियान का काम देख रहे सरकारी कर्मचारियों ने मेरे घर आकर मेरे काम की तारीफ की और कहा कि आप एक फार्म भर दिजिए, जिससे आपको इस शौचालय के लिए 12,000 रुपए मिल जाएंगे। मैंने भर दिया लेकिन आज तलक वह पैसा मेरे एकाउंट में नहीं आया। इससे मुझे कोई गिला-शिकवा नहीं है। शिकायत है तो मुझे अपने जन प्रतिनिधियों से जो पिछले 21 सालों में हमारे गांव को दो-दो बार शौच मुक्त गांव घोषित कर चुके हैं। और इस बात की मुझे पूरी संभावना है कि भविष्य में जब  कोई तीसरा अभियान शुरू होगा तब भी हमारा गांव शौच मुक्त घोषित हो जाएगा।

रमेश कहते हैं कि यह गांव कोई दूर-दराज या बीहड़ जंगलों में नहीं बसा है। बल्कि मध्य  प्रदेश और उत्तर प्रदेश के दो बड़े जिलों प्रयागराज और रीवा के बीच एक राष्ट्रीय राजमार्ग से मात्र दो किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ है। और यह गांव कोई आदिवासी गांव भी नहीं है। ऐसे में यह एक बड़ा उठता है कि जब यह गांव शहर से या सरकार की पहुंच में है तब  इसके हालात ऐसे हैं तो देश के दूर बसे गांवों में इन दोनों अभियानों के माध्यम से बनने वाले शौचालयों की कल्पना आसानी से की जा सकती है।

यहां ध्यान देने की बात है कि मध्य प्रदेश में ओडीएफ की हकीकत जमीन पर कुछ भी दिखती हो लेकिन सरकारी दावों में मध्यप्रदेश 100 फीसदी खुले से शौच से मुक्त हो चुका है। सरकारी आंकड़े के मुताबिक मध्यप्रदेश में ग्रामीण इलाकों 2 अक्टूबर 2014 के बाद से 66,03,469 शौचालयों का निर्माण किया गया है, जो कि पहले की तुलना से 69.34 प्रतिशत अधिक है। केवल वर्ष 2019-20 में 2,94,428 शौचालयों का निर्माण किया गया। इस तरह प्रदेश के सभी 51 जिले ओडीएफ हैं जिनमें पंचायतों की संख्या 22,839 है और इन पंचायतों में 50,228 गांव शामिल हैं।

हालांकि, स्वच्छ भारत मिशन की वेबसाइट http://sbmodf.in/ के मुताबिक मध्यप्रदेश के 9 शहरी निकाय अभी भी ओडीएफ होने से बचे है। वेबसाइट पर मौजूद आंकड़ों के मुताबिक मध्यप्रदेश के 383 शहरी स्थानीय निकायों में से 9 अब तक खुले में शौच से मुक्त नहीं हो पाए हैं। 374 स्थानीय निकायों को खुले में शौच से मुक्ति का प्रमाणपत्र दिया गया है। इन नौ शहरी स्थानीय निकायों में तीन लाख से अधिक की आबादी वाला मुरैना शहर भी शामिल है। इसके अलावा आलमपुर, बडोनी, कोटार, भानपुरा, निवारी, सुनसेर आदि स्थान शामिल हैं।

हालांकि प्रदेश सरकार का दावा है कि राज्य के सभी नगरीय निकाय ओडीएफ घोषित हो चुके हैं। मध्यप्रदेश के 271 नगर निकायों को ओडीएफ प्लस और 108 को ओडीएफ प्लस प्लस प्रमाणपत्र मिला है। प्रदेश के सभी 383 निकायों को खुले में शौच से मुक्ति का प्रमाण मिला है। इंदौर और उज्जैन को इस क्षेत्र में 7 स्टार स्टेटस मिल चुका है। प्रदेश के 17 शहर ओडीएफ प्लस और 4 निकाय ओडीएफ प्लस-प्लस घोषित हो चुके हैं। ये शहर इंदौर, उज्जैन, खरगोन और शाहगंज हैं। गौरतलब है कि देश में 7 शहर ओडीएफ प्लस-प्लस घोषित किये गए हैं। इनमें से 4 मध्यप्रदेश के और 3 छत्तीसगढ़ के हैं। यह सर्वे क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा किया गया है। शेष शहरों का भी सर्वे किया जा रहा है।

मध्यप्रदेश में हाल ही में शौचालय के निर्माण को लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है। सत्तारूढ़ दल कांग्रेस के नेताओं ने पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर आरोप लगाया कि जांच में 4.5 लाख शौचालय जो 2012 से 2018 के बीच बनाए गए थे, वो जमीन पर मिले ही नहीं। इन शौचालयों को सिर्फ कागजों पर दर्शाया गया लेकिन जब जियो टैगिंग के सहारे इसे जमीन पर तलाशा गया तो ये गायब मिले। गायब शौचायलों की कीमत 540 करोड़ आंकी जा रही है।