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किस्सा कचरे का

मानव अपने शुरुआती समय में न के बराबर कूड़ा-कचरा पैदा करता था क्योंकि उस समय के इंसानों की जरूरतें भी आज के मुकाबले बहुत कम थीं 

By Sorit Gupto

On: Thursday 13 December 2018
 
किस्सा कचरे का
तारिक अजीज / सीएसई तारिक अजीज / सीएसई

इस कहानी का एक अहम किरदार है एक छोटी-सी बाल्टी की जो हम सबके घरों में अक्सर किसी अंधेरे कोने में या घर के बाहर पड़ी होती है। यह हमारे कूड़े-कचरे की बाल्टी है जो अक्सर सब्जी के छिलकों, आटे के चोकर, बासी खाने, गीली चाय की पत्ती और तमाम अटरम-शटरम से भरी होती है। बाल्टी के अंदर भरे इस कचरे को हर सुबह कोई कूड़ा-वाला गाड़ी में भरकर ले जाता है। मगर कचरा आज केवल कूड़े की बाल्टी में ही नहीं बल्कि हर जगह मिलेगा।

आज जिधर देखो उधर कूड़ा-कचरे का ढेर पड़ा मिलेगा। गली-नुक्कड़, शहर, गांव से लेकर तालाब पोखरों और नदियां भी आज कूड़े से पटी पड़ी हैं। किसी से पूछो तो जवाब मिलता है कि इसमें हैरानी की क्या बात है?

यह तो बहुत नेचुरल है। पर अगर हम यही सवाल प्रकृति से पूछें तो बिलबुल ही अलग जवाब मिलेगा। प्रकृति से पूछो तो वह कहेगी, “कचरा? भला वह क्या होता है? मेरे लिए कुछ भी कचरा नहीं होता।”

प्रकृति के पास एक जादुई छड़ी होती है जिसे खाद्य-श्रृंखला कहते हैं। एक शाकाहारी जीव पेड़-पौधे-घास फूस खाता है। उसे एक मांसाहारी जीव खाता है। मांसाहारी जीव जब मर जाता है तब छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़े उसे खा जाते हैं। आखिर में हर चीज फिर से मिट्टी में बदल जाती है जिसमें से फिर कोई नया पौधा पनपता है।

हमारे आसपास ही देख लो। हम स्कूल में टिफिन को खाने के बाद अकसर बाकी बचे हुए खाने को फेंक देते हैं, जिसे कोई कौवा झपटकर अपने चोंच में दबाकर उड़ जाता है। इसी तरह सब्जी मंडी में फेंकी गई हरी सब्जी को मवेशी खा लेते हैं। मरे हुए पशु-पक्षी-जीव भी मिट्टी में बदल जाते हैं।

मगर हम इंसान प्रकृति की इस जादुई छड़ी यानी खाद्य शृंखला को तबाह कर रहे हैं। आज हम दुकान, बाजार से जब सामान लाते हैं तो साथ में लाते हैं प्लास्टिक की कई सारी पन्नियां, गत्ते के डिब्बे और जाने क्या-क्या।

इन्ही डिब्बों, गत्तों, खाली हो चुकी तेल-शेम्पू की बोतलों और प्याज-आलू-लौकी और दूसरी सब्जियों के छिलकों को हम कूड़े की बाल्टी में डालते रहते हैं। यही वह कूड़ा है जो हमने पैदा किया है। पर यह तो पूरी कहानी का बस एक छोटा-सा हिस्सा भर है। कूड़े की कहानी तो इतनी बड़ी है कि हमारे शहर का कूड़े का बड़ा-सा पहाड़ उसके सामने बौना है।

कचरा और मानव सभ्यता

मानव अपने शुरुआती समय में न के बराबर कूड़ा-कचरा पैदा करता था क्योंकि उस समय के इंसानों की जरूरतें भी आज के मुकाबले बहुत कम थीं। आज हम अपने घरों में एक दिन में जितना कूड़ा पैदा करते हैं उसे देखकर आज से हजारों साल पहले गुफाओं में रहने वाले हमारे पूर्वजों की बात दूर महज दो-तीन सौ साल पहले के हमारे पूर्वज भी चौंक जाएं। ज्यादा दूर इतिहास में जाने की जरूरत नहीं है, आज से महज बीस-तीस साल पहले न तो प्लास्टिक के खिलौने थे और न ही कम्प्यूटर- मोबाइल फोन और न ही इतनी ज्यादा कारें, स्कूटर और मोटर साइकिलें थीं। कितने अच्छे थे वे दिन! न तो ट्रैफिक का इतना धुआं होता था और न ही ट्रैफिक की पें-पें-पों-पों। जैसे-जैसे हमारी जरूरतें बढ़ीं, उसी तेजी से हम कूड़ा भी पैदा करते गए।

बेशक हम इंसान अपने को सबसे अक्लमंद मान कर अपने मुंह मियां मिट्ठू बनते फिरें पर सच तो यह है कि कूड़ा-कचरा तो केवल हम इंसान ही पैदा करते हैं।

प्रकृति में हम इंसानों के विपरीत दूसरे जीव-जानवर बिलकुल भी कूड़ा-कचरा पैदा नहीं करते। पेड़-पौधे के क्या कहने, वह तो ऑक्सीजन को अपने कचरे के रूप में निकलते हैं! वहीं दूसरी ओर पशुओं का गोबर और लीद खाद बन जाती है और मरे हुए पशुओं का शरीर भी मिट्टी बन जाता है।

देखा जाए तो हमारे चारों ओर फैले कूड़े-कचरे के लिए हमारी आधुनिक सोच काफी हद तक जिम्मेदार है।

एक स्टिकर और एक महामंत्र

यह 1930 की बात है। वह महामंदी का दौर था। एक ओर दुनिया भर में हजारों कारखाने बंद थे, वहीं दूसरी ओर सड़कों पर लाखों लोग बेरोजगार और भूखे घूम रहे थे। बड़े-बड़े अर्थशास्त्री अपने सिर के बाल नोच रहे थे पर उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था कि आखिर क्या किया जाए कि कारखाने फिर से चालू हों, लोगों को रोजगार मिले जिससे लोग सामान खरीदें। उन्हीं दिनों एक अमेरिकी अर्थशास्त्री बर्नार्ड लंडन ने “प्लांड-ओबसोलसेंस” का सुझाव दिया। जिसका सार यह था कि चीजों को योजनाबद्ध तरीके से कबाड़ में बदल दो। उन्होंने कहा कि बेरोजगारी और महामंदी की समस्या इसलिए है क्योंकि सामान बहुत टिकाऊ बनाए जा रहे हैं। मसलन एक घड़ी अगर टिकाऊ बनाई जाए जो दस-बीस साल तक चलती रहे तो कोई दूसरी घड़ी क्यों खरीदने लगा?

लंडन साहब ने समझाया कि अगर एक घटिया घड़ी बनाई जाए जो थोड़े दिन चलकर खराब हो जाए तो लोग मन मारकर दूसरी घड़ी खरीदेंगे। इससे घड़ी के कारखाने भी ज्यादा चलेंगे और घड़ी की दुकानें भी खरीदारों से भरी होंगी।

पहले पहल लोगों ने इस सुझाव की निंदा की, थोड़ी न नुकुर की क्योंकि जानबूझकर घटिया माल बनाने का लंडन साहब का यह सुझाव लोगों को बहुत अटपटा लगा। उन दिनों उत्पादों की लंबी आयु पर जोर दिया जाता था। उदाहरण के लिए उन्हीं दिनों बनाया गया एक बल्ब 1901 से अमेरिका के कैलिफोर्निया शहर के दमकल दफ्तर में आज भी बेधड़क जल रहा है।

पर धीरे-धीरे लंडन साहब के “प्लांड ओबसोलसेंस” के सुझाव को सभी ने मान लिया और आज उसी का यह नतीजा है कि बहुत अच्छी क्वॉलिटी का बल्ब भी साल-दो साल बाद टांय-टांय फुस्स हो जाता है। खैर लंडन साहब का अनुमान सही निकला क्योंकि घटिया और कम टिकाऊ उत्पादों के चलते अब लोग ज्यादा खरीदारी करने लगे थे।

लंडन साहब के “प्लांड-ओबसोलसेंस” ने दुकानदारों को एक स्टिकर दिया, “फैशन के दौर में गारंटी की इच्छा ना करें” और हम खरीदारों को मिला एक महामंत्र, “शॉपिंग”! त्योहारों का मौसम हो तो शॉपिंग, त्योहार न हो तो शॉपिंग, गर्मी आ रही है तो शॉपिंग और गर्मी जा रही हो तो शॉपिंग। जिस तेजी से हम नई चीजें खरीदते जाते हैं, उसी तेजी से हम पुरानी चीजों को कबाड़ में भी बदलते जाते हैं। हमने आज लंदन साहब के सुझाव को अक्षरशः मान लिया है कि अधिक खरीदारी में ही समझदारी है।

कूड़े के पहाड़

पर किसी ने यह नहीं सोचा कि पुरानी बेकार हो गई चीजों का क्या होगा? पहले तो इन बेकार चीजों ने हमारे घरों के अंधेरे कोनों पर कब्जा किया फिर छत, बालकनी पर कब्जा जमाते हुए सीढ़ियों के नीचे की जगह घेर ली। जब हम अपने ही द्वारा बनाए कबाड़ से घिर गए तब इससे बचने का हमने एक बहुत ही आसान तरीका ढूंढ निकाला जो इस सोच पर आधारित था कि अपना सिरदर्द दूसरे के मत्थे जड़ दो। सो हमने अपने कूड़े-कबाड़ से शहर के बाहर किसी गांव, किसी दूसरे के खेत में कूड़े का पहाड़ खड़ा कर दिया। अमीर देशों ने अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के गरीब देशों को ही अपने कूड़ेदान के रूप में तब्दील कर दिया।

उदाहरण के लिए पश्चिम अफ्रीकी देश के घाना को ही ले लो। घाना में स्थित अगबोगब्लोशी,जो कभी हरे-भरे पेड़ों से ढका था, आज हजारों-लाखों की तादाद में फेंके गए पुराने कंप्यूटर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान से पटा हुआ है। पिछले कई वर्षों से दुनिया भर के अमीर देश अपना इलेक्ट्रॉनिक कूड़ा घाना भेज रहे हैं। दुनिया के अमीर और प्रभावशाली लोग बड़ी मात्रा में वस्तुओं का उपभोग कर आराम की जिंदगी बिता रहे हैं और दूसरी तरफ इन्ही अमीर लोगों द्वारा पैदा किए गए कूड़े के नीचे किसी गरीब देश की एक बड़ी आबादी गुजर-बसर करने को मजबूर है। पर मजे की बात यह है कि बेशक हम अपने कूड़े को अपनी आंखों से दूर भेज रहे हैं पर उसे अपनी जिंदगी से दूर करने से कोसों दूर हैं।

क्या है इसका समाधान?

कूड़े का समाधान केवल उसी के पास हो सकता है जो खुद कूड़ा नहीं पैदा करता और इसके लिए प्रकृति से अच्छा सलाहकार भला और कौन हो सकता है? प्रकृति से पूछो तो शायद वह कहेगी, “यह तो बहुत आसान है। घर की सब्जी, बासी खाने को मवेशियों को डाल दो या कम्पोस्ट खाद बना दो, कांच-लोहे को रिसाइकिल के लिए भेज दो जितना हो सके चीजों का भरपूर उपयोग करो। प्रकृति का कण-कण काम का है। कूड़ा तुम मानवों ने पैदा किया है, प्रकृति में कुछ भी कचरा नहीं होता।”