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कूड़े-कचरे की डंपिंग से पहाड़ों पर त्रासदी को न्यौता

जैसे-जैसे संवेदनशील जगहों पर जोखिम के खेल खेलने का चलन बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इन ग्लेशियर्स और ऊंची चोटियों पर कचरे की मौजूदगी और उसके दुष्परिणामों का रुझान आना भी शुरू हो गया है।

By Vivek Mishra

On: Tuesday 27 August 2019
 

उत्तराखंड में सबसे ऊंची चोटियों और ग्लेशियर्स पर जमकर कचरा फेका जा रहा है। पर्यटक और उन्हें खाने-पिलाने व ठहराने की व्यवस्था देने वाले होटल -रेस्त्रां ही नहीं बल्कि कचरे का प्रबंधन और निस्तारण करने वाली एजेंसियां भी पहाड़ों पर कचरा फेंककर गंगा में अपना हाथ धो रही हैं। पर्यावरण के जानकारों का कहना है कि यह एक बड़ी त्रासदी को बुलावा देने जैसा है।

कचरे से पाटे जा रहे ग्लेशियर्स और ऊंची पर्वत चोटियां जीवन देने वाली नदियों और झरनों का अहम स्रोत हैं। हिमालय की गोद में बसे राज्यों में सात समंदर पार करके लोग कचरा फैलाने पहुंच रहे हैं। हाल ही में चमोली जिले के औली में 2505 मीटर की ऊंचाई पर बेहद उपजाऊ सतह और बर्फ की चादरों के बीच शादी मनाकर दक्षिण अफ्रीका लौट गए व्यवसायी अजय गुप्ता और अतुल गुप्ता का परिवार अपने पीछे 32,000 किलो का कचरा पहाड़ पर ही छोड़ गया है।

इसी साल के जुलाई महीने की बात है जब कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के नजदीक एक तेंदुआ पॉलीथीन में कूड़ा चबाता हुआ देखा गया। तस्वीरें खूब साझा की गईं और कुछ अखबारों में भी इसे जगह मिली। इन तस्वीरों पर वन अधिकारियों ने हैरानी भी जताई और टिप्पणी में कहा कि उन्होंने इससे पहले कभी ऐसा कुछ नहीं देखा था। इसी मुद्दे पर रामनगर के रहने वाले और पर्यावरण के जानकार एजी अंसारी कहते हैं कि संरक्षित वनों में कचरे की डंपिंग वन्यजीवों के जीवन को खतरे में डाल रही है। उनके मुताबिक भाखड़ा ब्रिज के पास हाथियों का संरक्षित कॉरीडोर है जहां कचरा ही कचरा फैला है।

उत्तरांखड की इस दुर्दशा पर रोक और कार्रवाई की उम्मीद से नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में गैर सरकारी संस्था फ्रैंड्स के शरद तिवारी और नैनीताल निवासी अजय सिंह रावत की ओर से याचिका दाखिल की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि नगर निगम हों या फिर अन्य एजेंसियां ठोस कचरा प्रबंधन कानून, 2016 और एनजीटी के आदेशों का पालन नहीं कर रही हैं। न सिर्फ पूरे राज्य में कचरे की डंपिंग गलत तरीके से की जा रही है बल्कि कचरे के निस्तारण पर भी काम नहीं किया जा रहा है।

याचिका के मुताबिक, राज्य का कुल क्षेत्र 53,483 वर्ग किलोमीटर है। इसमें से 86 फीसदी पर्वत है और 65 फीसदी क्षेत्र पर वन मौजूद हैं। राज्य के उत्तरी भाग में हिमालय की ऊंची चोटियां और ग्लेशियर्स मौजूद हैं। अब इन्हीं ग्लेशियर्स पर कूड़े-कचरे का खतरा मंडरा रहा है। याचिका में कहा गया है कि जैसे-जैसे संवेदनशील जगहों पर जोखिम के खेल खेलने का चलन बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इन ग्लेशियर्स और ऊंची चोटियों पर कचरे की मौजूदगी और उसके दुष्परिणामों का रुझान आना भी शुरू हो गया है।  

फ्रैंड्स संस्था के शरद तिवारी ने याचिका के जरिए आरोप लगाया है कि उत्तरकाशी के बाड़ाहाट में भागीरथी नदी के पास ही नगर निगम के जरिए 30 ट्रक कचरा डालने का मामला भी सामने आया था। वहीं, हाल ही में एक स्थानीय बरसाती नदी टेखला में भी कचरा डाला गया है। इस बीच उत्तरकाशी में नगर निगम रामलीला मैदान में कचरा डंप कर रहा था, हालांकि फिर से मैदान को साफ करने के आदेश के बाद कचरे को भागीरथी के पास ही डंप किया जा रहा है। इसी तरह रुद्रप्रयाग में भी अलकनंदा नदी के पास ही अवैध तरीके से कचरे की डंपिंग की जा रही है। यहां बडी़ संख्या में आने वाले पर्यटक भी कचरा फैलाते हैं।  

काफिनी, मैकटोली, मिलाम, नामिक, पिंडारी, रालम, सुंदरढ़ूंगा, यह सारे नाम कुमाऊं क्षेत्र में मौजूद ग्लेशियर्स के हैं। इसी तरह गढ़वाल में बांडेर पुंच ग्लेशियर, चोरबारी बामक ग्लेशियर, डोकरियानी, डूनागिरी, गंगोत्री, खाटलिंग, नंदा देवी ग्लेशियर्स, सतोपनथ और भागीरथी-खर्क ग्लेशियर और तिपरा बामक ग्लेशियर प्रमुख हैं। वहीं, बर्फ से ढ़के रहने वाले कुछ प्रमुख ग्लेशियर्स में नंदा देवी की चोटी (7816 मीटर), चौखंबा (7138 मीटर), त्रिशूल (7120 मीटर), सतोपंथ (7075 मीटर), केदारनाथ (6962 मीटर), पंचाचुली  चोटी (6905 मीटर), थालायसागर (6904 मीटर), चंगाबंग (6866 मीटर), नंदा कोट (6861 मीटर) और भागीरथी (6856 मीटर) की ऊंचाई पर स्थित है।

याची अजय सिंह रावत और शरद तिवारी के मुताबिक मुक्तेशवर इलाके में पॉलीथीन बैग, प्लास्टिक बोतल, पानी की बोतलें, शराब की बोतलें, दवाओं का कचरा, निर्माण और धवस्तीकरण का कचरा वन भूमि की ढ़लानों पर यहां-वहां पड़ा रहता है। कुछ क्षेत्रों में इस कचरे को एकत्र करके जला दिया जाता है। सरकार की ओर से इस कचरे के परविहन की कोई व्यवस्था नहीं है। न्यूनतम तापमान और बर्फ की वजह से यह कचरा जल्दी गलता (डी-कंपोज) नहीं है। वहीं, समय-समय पर होने वाली बारिश इस कचरे को बहाकर ले जाती है और राज्यों के इधर-उधर इलाकों और पहाड़ी राज्यों में फेंक देती है। इसके चलते समस्या और विकराल होती जा रही है।

राज्यसभा में 08 मार्च, 2018 को केंद्रीय शहरी एवं आवास विकास मंत्रालय की ओर से जवाब में कहा गया है कि देशभर में उत्तराखंड ठोस कचरे के प्रसंस्करण के मामले में सबसे फिसड्डी है। प्रतिदिन राज्य में 1,406 टन कचरा निकलता है लेकिन कचरे का प्रंस्सकरण शून्य है। वहीं, याचिका के मुताबिक एक दूसरे जवाब में केंद्र सरकार की ओर से कहा गया है कि उत्तराखंड की शहरी आबादी में कुल 92 नगर निकाय हैं। प्रतिदिन 1400 टन कचरा निकलता है और ज्यादातर कचरे का उपचार नहीं किया जाता।

बरसात के समय पहाड़ से मैदान की तरफ नदियों को जब रफ्तार मिलती है तो पहले वे खूब सारे खनिज और उपजाऊ तत्वों को बहाकर लाती थीं लेकिन बीते छह महीनों में कई मामले ऐसे आए हैं जिनके बाद नदियों का नया नामकरण हुआ है। हिमाचल के अश्विनी खड्ड में बहने वाली नदी को प्लास्टिक की नदी कहा गया। इसके बाद सोलन में सतलुज नदी का भी यही हाल रहा। हाल ही में हेमकुंड गंगा के पास लक्ष्मण गंगा के स्रोत में भी प्लास्टिक का भयावह दृश्य बाहर आया है।

याचिका के तथ्य और इस समस्या को ठीक करने के लिए एडवोकेट राजीव दत्ता व आकाश वशिष्ठ ने एनजीटी में दलीलें रखीं। उन्होंने कहा कि इन कचरों की वजह से जंगलों में आग लगने की घटनाएं भी सामने आती हैं। ऐसे में इनपर नियंत्रण बहुत ही जरूरी है। एनजीटी ने ठोस कचरे का मामला देख रहे राज्य के मुख्य सचिव को ही आदेश दिया है कि वे इन तथ्यों पर संज्ञान लेकर उचित कदम उठाएं।

एनजीटी की तरफ से मामले को संज्ञान लेने और उचित कदम उठाने का यह आदेश पहली बार नहीं आया है। 22 दिसम्बर, 2016 को एनजीटी ने पूरे देश में कूड़ा-कचरा प्रबंधन करने का आदेश दिया था। दो वर्ष से ज्यादा वक्त बीत गया है, आज तक संज्ञान नहीं लिया जा सका है। इस बार भी राज्य को ही चेतना है।