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ई-वेस्ट: हमारे घरेलू गैजेट जहर बन कर वापस घर आ रहे हैं

सीपीसीबी रिपोर्ट के मुताबिक, पूरे देश में पैदा होने वाले लाखों टन ई-वेस्ट कचरे का महज 3 से 10 फीसदी ही इकठ्ठा किया जाता है

By Shashi Shekhar

On: Monday 18 January 2021
 
File Photo: Sayantan Bera
File Photo: Sayantan Bera File Photo: Sayantan Bera

हम अपने घरों में जिन इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स सामानों को इस्तेमाल के बाद फेंक देते है, उसमें से 21 प्रकार के इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स सामानों को ई-वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स 2016 के तहत अधिसूचित किया गया है। लेकिन, ई-वेस्ट (ई-कचरा) का उचित तरीके से कलेक्शन न करने और अवैज्ञानिक तरीके से इसका निपटान किए जाने की वजह से पानी, मिट्टी और हवा जहरीले होते जा रहे हैं। इसे ले कर देश की शीर्ष पर्यावरण निकाय नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने बार-बार चिंता जताई है। लेकिन, देश के करीब सभी राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (35 एसपीसीबी/पीसीसीएस) की समीक्षा रिपोर्ट भी मौजूदा समस्या का समाधान देती नहीं दिख रही है. 

उपरोक्त तथ्य नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में 18 दिसंबर 2020 को जमा किए गए एक रिपोर्ट से सामने आए है। दरअसल, शैलेश सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार मामले में एनजीटी ने सीपीसीबी से जवाब दाखिल करने को कहा था. मामला दिल्ली और इसके आसपास गैर-कानूनी तरीके से चल रहे 5000 ई-वेस्ट रिसाइक्लिंग यूनिट्स को लेकर था।   

दिसंबर, 2020 की सीपीसीबी की इस रिपोर्ट के मुताबिक, 2017-18 और 18-19 के लिए ई-कचरा कलेक्शन का लक्ष्य क्रमश: 35422 टन और 154242 टन था। लेकिन वास्तविक कलेक्शन 2017-18 में जहां 25325 टन था, वहीं 2018-19 में यह 78281 टन रहा। ये अलग बात है कि 2019-20 में भारत ने 1014961 टन ई-कचरा पैदा किया था। यानी, वास्तविक ई-कचरा उत्पादन, ई-कचरा कलेक्शन लक्ष्य और वास्तविक कलेक्शन के बीच ये भारी अंतर देश में ई-कचरा से बढते खतरे को साबित करता है। 

गौरतलब है कि ई-वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स 2016 के मुताबिक इलेक्ट्रॉनिक्स गैजेट बनाने वाले निर्माताओं को ही अंतत: ई-वेस्ट कचरा का कलेक्शन करना होता है। देश में करीब 1630 ऐसे निर्माताओं को ईपीआर (एक्स्टेंडेड प्रोड्यूसर रेस्पॉंसिबिलिटी) ऑथराइजेशन भी दिया गया है, जिनकी क्षमता 7 लाख टन से अधिक ई-वेस्ट प्रोसेसिंग की है। लेकिन, ई-वेस्ट कलेक्शन से संबंधित डेटा कुछ और ही कहानी बताते हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि ईपीआर ऑथराइजेशन प्राप्त निर्माता अपने दायित्व का निर्वहन नहीं कर रहे है. सीपीसीबी ने ऐसे 292 निर्माताओं को गलत तरीके से कलेक्शन सेंटर चलाने की वजह से चेतावनी भी दी थी।

गैर कानूनी रिसाइकलर्स/डिस्मैंटलर्स  

जाहिर है, जिस देश में हर साल 10 लाख टन से भी ज्यादा ई-कचरा पैदा होता हो, वहां बडे पैमाने पर गै-कानूनी ढंग से चलने वाले रिसाइकलर्स/डिस्मैंटलर्स /कलेक्शन सेंटर्स भी होंगे। अकेले दिल्ली और इसके आसपास के इलाके में 5 हजार से अधिक रिसाइकलर्स/डिस्मैंटलर्स काम कर रहे है, जो एनसीआर क्षेत्र में प्रदूषण की एक मुख्य वजह है। इनमें से ज्यादातर अवैज्ञानिक तरीके से कचरा कलेक्शन और निपटान का काम खुले में करते है, जो अंतत: मिट्टी, पानी और हवा को जहरीला बनाते है।

कितने कारगर एसपीसीबी? 

राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी) की समीक्षा रिपोर्ट को देखने से पता चलता है कि पूरे देश में ई-वेस्ट निपटान के लिए बने नियमों का सख्ती से पालन तक नहीं हो पा रहा है। सीपीसीबी को 35 प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से मिली सूचना लगभग एक ही कहानी कहती है। उदाहरण के लिए दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) ने वित्त वर्ष 2019-20 के चौथे तिमाही और 2020-21 के पहले और दूसरे तिमाही में 9 ई-वेस्ट कलेक्शन सेंटर का मुआयना किया, जो 56 प्रोड्यूसर से संबंधित थे. इनमें से कोई भी कलेक्शन सेंटर ई-वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स का पालन नहीं कर रहा था। इसके अलावा, नन-ईपीआरए प्रोड्यूसर्स की पहचान के लिए भी तब तक कोई एक्शन नहीं लिया जा सका था। हालांकि, अनौपचारिक ढंग से चल रहे रिसाइकलर्स/डिस्मैंटलर्स /कलेक्शन सेंटर्स के खिलाफ जरूर कार्रवाई शुरु की गई है। लेकिन, सीपीसीबी का अब भी मानना है कि इस दिशा में दिल्ली को बहुत काम करने की जरूरत है। 

दूसरी तरफ, दिल्ली की सीमा से सटे और उत्तर प्रदेश के तहत आने वाले लोनी में भी सैकडों अनौपचारिक रिसाइकलर्स/डिस्मैंटलर्स /कलेक्शन सेंटर्स चल रहे हैं। ये रिसाइकलर्स/डिस्मैंटलर्स /कलेक्शन सेंटर्स शायद ही ई-वेस्ट मैनेजमेंट नियमों का पालन करते है। तय जगह से कम जगह (शेड) में अधिक से अधिक कचरे का निपटान, खुले में ई-वेस्ट को जलाना आदि जैसे काम यहां किए जाते है, जो सीधे-सीधे प्रदूषण फैलाने का काम करते है।

वैसे तो उत्तर प्रदेश पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (यूपीपीसीबी) ने अपनी रिपोर्ट में सीपीसीबी को सूचित किया है कि वे लोनी क्षेत्रे के ऐसे अनौपचारिक रिसाइकलर्स/डिस्मैंटलर्स /कलेक्शन सेंटर्स के खिलाफ कार्रवाई कर रहे है और अब तक (2020-21 के पहले और दूसरे तिमाही तक) 120 भट्टी ध्वस्त कर चुके है और 12 के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा चुकी है. गाजियाबाद जिला प्रशासन ने 6.86 टन ई-वेस्ट जब्त किया है और 4 गैर-कानूनी यूनिट पर ताला लगा दिया गया है. लेकिन, अभी भी सीपीसीसीबी ने यूपीपीसीबी को अपनी निगरानी प्रक्रिया तेज करने को कहा है। इन 35 राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के जवाब से साफ है कि ये बोर्ड डिसमैंटलर्स/रीसाइकलर्स की क्षमता को ले कर सीपीसीबी द्वारा सुझाए गए गाइडलाइंस का पूरे तरीके से पालन नहीं कर रहे हैं।          

बहरहाल, यह स्थिति सिर्फ दिल्ली या उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ही नहीं है। नन-ईपीआरए प्रोड्यूसर्स के खिलाफ अभी भी ज्यादातर राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड कोई कारगर कदम नहीं उठा सके है। इससे पता चलता है कि ई-वेस्ट कलेक्शन को ले कर तय जिम्मेदारी से भाग रहे इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोड्यूसर्स, ई-वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स को ले कर कितने लापरवाह है। ये लापरवाही इससे भी पता चलती है कि 10 लाख टन सालाना ई-वेस्ट पैदा करने वाले देश में महज 3 से 10 फीसदी ई-वेस्ट का कलेक्शन ही सालाना हो पाता है।